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“क्या है करवा चौथ व्रत का एतिहसिक और धार्मिक महत्व”

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संजय कुमार सुमन

करवा चौथ की कहानी का बहुत महत्व हैं। करवा चौथ के दिन सुहागन स्त्रियां अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं। कुछ स्त्रियां इस व्रत को निर्जल भी रखती हैं। करवा चौथ के दिन सुहागन स्त्रियां पूरे दिन बिना जल ग्रहण किए व्रत रखती हैं और शाम के समय में चंद्रमा के दर्शन करके और चंद्र देव की पूजा करने के बाद व्रत खोलती हैं। इस त्योहार को पूरे भारत में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। विशेषकर उत्तर भारत के जाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में तो इस पर्व को बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। करवा चौथ के दिन कथा सुनने को विशेष महत्व दिया जाता है। इसके बाद चांद का देखकर पूजा की जाती है और व्रत खोला जाता है।इस दिन भगवान शिव,माता पार्वती और भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है और करवाचौथ व्रत की कथा सुनी जाती है। शास्त्रों के अनुसार विवाह के 12 वर्ष से 16 वर्ष तक इस व्रत को किया जाता है लेकिन कुछ महिलाएं इस व्रत को जीवनभर रखती हैं। इस व्रत को पति की लंबी उम्र के लिए विशेष माना जाता है। इस व्रत से अधिक श्रेष्ठ कोई उपवास नही है।

शास्त्रों के अनुसार करवा चौथ का करने से न केवल पति की उम्र लंबी होती है। बल्कि वैवाहिक जीवन भी सुखी रहता है।हर एक त्योहार के मनाने के पीछे एक ठोस वजह और कहानी होती है।महिलाओं के द्वारा पति के कल्याण के लिए रखे जाने वाले पर्व ‘करवा चौथ’की भी अपनी एक कहानी है,जिसे स्त्रियाँ कथा के रूप में व्रत के दिन सुनती है।वैसे तो करवा चौथ की कई कहानियां है परन्तु सबका मूल एक ही है।कहा जाता है की करवा चौथ के दिन व्रत कथा का पढ़ा जाना काफी महत्व रखता है।यह प्रथा सदियों से चली आ रही है और सभी वैवाहित महिलाएं इसका पूर्ण रूप से पालन करती है।पुराणों में हर व्रत या त्योहार से जुड़ी कहानियां होती हैं।

पुराणों के अनुसार करवा नाम की एक पतिव्रता धोबिन अपने पति के साथ तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित गांव में रहती थी। उसका पति बूढ़ा और निर्बल था।एक दिन जब वह नदी के किनारे कपड़े धो रहा था तभी अचानक एक मगरमच्छ वहां आया, और धोबी के पैर अपने दांतों में दबाकर यमलोक की ओर ले जाने लगा। वृद्ध पति यह देख घबराया और जब उससे कुछ कहते नहीं बना तो वह करवा..! करवा..! कहकर अपनी पत्नी को पुकारने लगा।पति की पुकार सुनकर धोबिन करवा वहां पहुंची, तो मगरमच्छ उसके पति को यमलोक पहुंचाने ही वाला था। तब करवा ने मगर को कच्चे धागे से बांध दिया और मगरमच्छ को लेकर यमराज के द्वार पहुंची।उसने यमराज से अपने पति की रक्षा करने की गुहार लगाई और साथ ही यह भी कहा की मगरमच्छ को उसके इस कार्य के लिए कठिन से कठिन दंड देने का आग्रह किया और बोली- हे भगवन्! मगरमच्छ ने मेरे पति के पैर पकड़ लिए है। आप मगरमच्छ को इस अपराध के दंड-स्वरूप नरक भेज दें।करवा की पुकार सुन यमराज ने कहा- अभी मगर की आयु शेष है,मैं उसे अभी यमलोक नहीं भेज सकता। इस पर करवा ने कहा- अगर आपने मेरे पति को बचाने में मेरी सहायता नहीं कि तो मैं आपको श्राप दूंगी और नष्ट कर दूंगी।
करवा का साहस देख यमराज भी डर गए और मगर को यमपुरी भेज दिया। साथ ही करवा के पति को दीर्घायु होने का वरदान दिया।तब से कार्तिक कृष्ण की चतुर्थी को करवा चौथ व्रत का प्रचलन में आया। जिसे इस आधुनिक युग में भी महिलाएं अपने पूरी भक्ति भाव के साथ करती है और भगवान से अपनी पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं।

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दूसरी कथा के अनुसार, एक साहूकार के सात लड़के और एक लड़की थी। सेठानी के सहित उसकी बहुओं और बेटी ने करवा चौथ का व्रत रखा था। रात्रि को साहकार के लड़के भोजन करने लगे तो उन्होंने अपनी बहन से भोजन के लिए कहा। इस पर बहन ने बताया कि उसका आज उसका व्रत है और वह खाना चंद्रमा को अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है। सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जाती और वह दूर पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। जो ऐसा प्रतीत होता है जैसे चतुर्थी का चांद हो। उसे देख कर करवा उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ जाती है। जैसे ही वह पहला टुकड़ा मुंह में डालती है उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और तीसरा टुकड़ा मुंह में डालती है तभी उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। वह बेहद दुखी हो जाती है।उसकी भाभी सच्चाई बताती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं। इस पर करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं करेगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है।

एक साल बाद फिर चौथ का दिन आता है, तो वह व्रत रखती है और शाम को सुहागिनों से अनुरोध करती है कि ‘यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो’ लेकिन हर कोई मना कर देती है। आखिर में एक सुहागिन उसकी बात मान लेती है। इस तरह से उसका व्रत पूरा होता है और उसके सुहाग को नये जीवन का आर्शिवाद मिलता है। इसी कथा को कुछ अलग तरह से सभी व्रत करने वाली महिलाएं पढ़ती और सुनती हैं।

तीसरी कथा के अनुसार,एक अन्धी बुढिया थी जिसका एक लड़का और लड़के की बहु थी ।वो बहुत गरीब था।वह अन्धी बुढिया नित्यप्रति गणेश जी की पूजा किया करती थी। गणेश जी साक्षात् सन्मुख आकर कहते थे कि बुढिया भाई तू जो चाहे सो मांग ले। बुढिया कहती है, मुझे मांगना नहीं आता तो कैसे और क्या मांगू। तब गणेश जी बोले कि अपने बहु बेटे से पूछकर मांग ले। तब बुढिया ने अपने पुत्र और वधु से पूछा तो बेटा बोला कि धन मांग ले और बहु ने कहाँ की पोता मांग लें। तब बुढिया ने सोचा कि बेटा यह तो अपने-अपने मतलब की बातें कर रहे है। अतः इस बुढिया ने पड़ोसियों से पूछा तो, पड़ोसियों ने कहा कि बुधिया तेरी थोड़ी सी जिंदगी है। क्यूँ मांगे धन और पोता, तू तो केवल अपने नेत्र मांग ले जिससे तेरी शेष जिंदगी सुख से व्यतीत हो जाए। उस बुढिया ने बेटे और बहु तथा पडौसियों की बातें सुनकर घर में जाकर सोचा, जिसमे बेटा बहु और मेरा सबका ही भला हो वह भी मांग लूँ और अपने मतलब की चीज़ भी मांग लूँ। जब दुसरे दिन श्री गणेश जी आये और बोले, बोल बुढिया क्या मांगती है। हमारा वचन है जो तू मांगेगी सो ही पायेगी।गणेश जी के वचन सुनकर बुढिया बोली, हे गणराज! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे नौ करोड़ की माया दें, निरोगी काया दें, अमर सुहाग दें, आँखों में प्रकाश दें, नाती पोते दें, और समस्त परिवार को सुख दें, और अंत में मोक्ष दें। बुढिया की बात सुनकर गणेश जी बोले बुढिया माँ तूने तो मुझे ठग लिया ।खैर जो कुछ तूने मांग लिया वह सभी तुझे मिलेगा। यूँ कहकर गणेश जी अंतर्ध्यान हो गये। हे गणेश जी! जैसे बुढिया माँ को मांगे अनुसार आपने सब कुछ दिया वैसे ही सबको देना और हमको भी देने की कृपा करना।

 

 

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