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आधुनिक समाज शिल्पियों की सफल कथा

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प्रसून लतांत
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आमतौर पर समाज के सतह पर होने वाले राजनीतिक परिवर्तन लोगों को सहज दिख जाते हैं लेकिन रचनात्मक कार्यों के जरिए समाज के अंतिम तहों में धीरे—धीरे होनेवाले परिवर्तन लोगों की नजरों से ओझल ही रहते हैं। समाज के अंतिम तहों में होने वाले परिवर्तन शुरुआती दौर में भले छोटे हों लेकिन यही क्रम निरंतर जारी रहता है तो उसका स्वरूप व्यापक भी हो जाता है जो केवल किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं रहते। वे आगे चलकर मिसाल बन जाते हैं और अन्य क्षेत्रों के लिए भी अनुकरणीय हो जाते हैं। ऐसे सद्प्रयासों के अनेक उदाहरण हैं, जिनके प्रभाव आज भी बरकरार हैं। हमारी नजर उस पर नहीं रहती। हम तात्कालिक घटनाओं और सतही परिवर्तनों पर ज्यादा ध्यान देने के अभ्यस्त हो गए हैं।


राष्ट्रपिता महात्मा गांधी राजनीतिक गतिविधियों में संलग्न होते हुए भी रचनात्मक कार्यक्रमों को कहीं ज्यादा महत्व देते थे। वे इसे स्वराज्य, स्वाबलंबन, स्वतंत्रता और मानवीय व हार्दिक मूल्यों के विकास की कुंजी मानते थे। उनके द्वारा सुझाए गए रचनात्मक कार्यों के असर का आज भी आकलन कर सकते हैं, उनके हुए दूरगामी नतीजों का भी अंदाजा लगाया जा सकता है। इन सब बातों को बारीकी से समझने और समझ कर उन्हें कार्य रूप देने में हाल ही में प्रकाशित डॉ. प्रमोद कुमार की पुस्तक “बापू के पद्चिन्हों पर आधुनिक भारत के गुमनाम समाज शिल्पी ” बहुत उपयोगी है। हिंदी में पहली बार गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक गांधी के विचारों के प्रचार—प्रसार में सहायक तो होगी ही, इसी के साथ खासतौर से स्वास्थ्य, स्वच्छता, भारतीय समाज निर्माण, पर्यावरण संरक्षण, कृषि सुधार व शिक्षा की व्यवहारिक पद्धति और वंचितों की बदतर जिंदगी को बेहतर बनाने की आकांक्षा रखने वाले नए समाज शिल्पियों के लिए कारगर मार्गदर्शक की तरह ही लगी। यह पुस्तक पाठकों को बेहतर भारत के निर्माण में कूद पड़ने की प्रेरणा देने में कामयाब रहेगी।
देश के समक्ष मौजूद चुनौतियों के समाधान और समाज के सभी वर्गों के सर्वांगीण विकास के लिए महात्मा गांधी ने अपने समय में कुछ रचनात्मक गतिविधियां शुरू करने पर जोर दिया था। ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने 1941 में “रचनात्मक कार्यक्रम : उसका रहस्य और स्थान” नाम से एक पुस्तक की रचना की। इस पुस्तक में उन्होंने 13 रचनात्मक गतिविधियों की शिनाख्त कीं। फिर बाद में उन्होंने इसमें पांच अन्य और गतिविधियों को भी जोड़ दिया। इस प्रकार 18 रचनात्मक कार्यक्रमों को संचालित करने की अपील की गई। डॉ. प्रमोद कुमार की पुस्तक “बापू के पद्चिन्हों पर आधुनिक भारत के गुमनाम समाज शिल्पी’’ में पाठकों को आधुनिक भारत में चालीस चुनिंदा गुमनाम समाज शिल्पियों और रचनात्मक कार्यों के तहत उनके निरंतर प्रयासों से समाज और व्यक्ति के जीवन में आए परिवर्तनों से परिचित कराती है। महात्मा गांधी ने 1920 में जिस आदर्श समाज व्यवस्था की कल्पना की थी, वह आज भी गुमनाम समाज शिल्पियों के माध्यम से देश में अनेक स्थानों पर साकार होती दिखाई देती है। उल्लेखनीय यह है कि ये सभी गतिविधियां समाज पोषित हैं और इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू उन लोगों की मानसिकता में आया सकारात्मक बदलाव है, जिसके लिए ये शुरू की गई थीं अर्थात् अनेक स्थानों पर अब सेवित ही अन्य वंचित समाज बंधुओं को सक्षम बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इसके अलावा इस पुस्तक में यह भी बताने की कोशिश की गई है कि देश में बहुत से स्थानों पर लोगों ने अपने विकास के लिए सिर्फ सरकारी एजेंसियों के भरोसे बैठे रहने की प्रवृति त्याग कर अपना भाग्य खुद से बदलने का प्रयास किया है।
महात्मा गांधी का स्पष्ट मानना था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर लेना प्रत्येक नागरिक के लिए गरिमायुक्त जीवन की गारंटी नहीं है। इसके लिए समाज की शक्ति को जागृत करना पड़ेगा और कुछ लोगों को अपने व्यक्तिगत अरमानों की समाज हित में बलि देनी होगी। इस सोच को हकीकत में बदलने की कोशिश के लिए महात्मा गांधी ने खुद भी अनथक प्रयत्न किया और अन्य को भी करने को प्रेरित किया। महात्मा गांधी की हत्या के बाद उनके प्रयासों में शिथिलता आई। इसका सबसे बड़ा कारण यह रहा कि देश में हमारे शासकों ने ऐसा जनमानस बनाने पर जोर लगाया, जिससे लोगों में यह धारणा स्थापित हो गई कि जो भी काम करना है वह सरकार करेगी। नतीजा सरकार पर निर्भरता बढ़ती गई है, जो आज बहुत बड़ी समस्या बन गई है। महात्मा गांधी इस सोच के सख्त खिलाफ थे। वे समाज के जरिए ही समाज में परिवर्तन के आकांक्षी थे। गांधीजी की हत्या के बाद रचनात्मक कार्यक्रमों का प्रवाह उनकी बनाई संस्थाओं तक सीमित रह गया लेकिन इसी के साथ बगैर कोई प्रचार के समाज में कुछ व्यक्तियों और संस्थाओं ने अपने—अपने स्तर पर परिवर्तन का वैसा ही माहौल बनाने का प्रयास किया जैसा गांधी जी चाहते थे। ऐसे लोगों और संस्थाओं को राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादातर देशवासी नहीं जानते और वे इससे भी अनजान रहते हैं कि उनके प्रयासों से असंख्य लोगों में क्या कुछ सार्थक बदलाव आया। कुछ लोग बिना कोई ठोस काम किए देश—दुनिया से पुरस्कार और प्रसिद्धि बटोर लेते हैं, लेकिन परिवर्तन के इन पुरोधाओं की न तो जनसंचार माध्यम सुध लेते हैं और न ही सरकारें। लेकिन उनके प्रयासों से व्यक्तियों के जीवन में और उनके समाज में अंधेरा छंट रहा है। गुमनाम समाज शिल्पियों के बारे में डॉ. प्रमोद कुमार ने पुस्तक लिख कर अपने पाठकों को बेहतर मानवीय प्रयास शुरू करने का सूत्र दे दिया है,क्योंकि समाज में बहुत से ऐसे लोग होते हैं जिनके मन में मानवता के लिए भरपूर जज्बा होता है पर उनको दिशा का ज्ञान नहीं होता। वे यह तय नहीं कर पाते कि शुरुआत कैसे करें। असमंजस में फंसे अनेक नव समाज शिल्पियों के लिए यह पुस्तक हर हाल में बहुत सहायक सिद्ध होगी। लेखक ने अपनी पुस्तक में केवल आधुनिक समाज शिल्पियों के कामकाज का खालिश ब्योरा नहीं दिया बल्कि देश की मौजूदा विभिन्न समस्याओं के जिक्र के साथ उनके कार्यों के महत्व को भी रेखांकित करने का प्रयास किया है।
डॉ. प्रमोद कुमार ने अपनी पुस्तक में जिन गुमनाम समाज—शिल्पियों के कार्य, उनकी प्रेरणा, उनकी कठिनाइयां और उनकी कामया बियों का बहुत बारीकी से चित्रण किया है,इनमे कुछ ने अकेले प्रयास शुरू किया लेकिन आज उनके साथ कारवां है। महाराष्ट्र के गिरीश प्रभूणे को जन्मजात अपराधी कही जाने वाली घुमंतू जनजातियों के एक लाख से अधिक लोगों के जीवन को स्थायित्व दिलाने में कामयाबी मिली। लातूर के संजय काबले ने अपने शहर के कचरा बिनने वाले 800 से अधिक लोगों को स्वाभिमानपूर्वक जीवन जीने योग्य बना दिया। महाराष्ट्र के ही अहमदनगर जिले में डॉ. गिरीश कुलकर्णी ने वेश्यावृत्ति में फंसी 900 से अधिक महिलाओं को बदनाम गलियों से बाहर निकाला और उन्हें सम्मानजनक कार्यों से जोड़ा। राजस्थान के भरतपुर में डॉ. बीएम भारद्वाज ने गंदगी के ढेरों पर जिंदगी गुजारने वाले ग्यारह हजार से अधिक निराश्रित मानसिक रोगियों को स्वस्थ बनाकर उन्हें अपने बिछुड़े परिवार से मिलाया। हरिद्वार में आशीष गौतम ने हजारों कुष्ठ रोगियों का पुनर्वास किया। उज्जैन के अनिल डागर ने 24 सालों में 24000 से अधिक लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार किया है। महाराष्ट्र के धुले के युवक हर्षल ने अपने जिले में 1103 सरकारी स्कूलों का बिना सरकारी मदद के डिजिटलीकरण कर दिया। महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले की पांच सौ गृहणियों ने अपने आसपास की तीन हजार से अधिक जनजातीय बालिकाओं और करीब एक लाख अन्य लोगों के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया। सोलापुर की चंद्रिका चौहान ने पन्द्रह हजार महिलाओं को स्वाभिमान पूर्वक जीने लायक बनाया। उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के डॉ. राजपाल सिंह ने बिना संसाधनों के 42 अंतरराष्ट्रीय, 300 राष्ट्रीय और 3000 से अधिक राज्य स्तर के निशानेवाज तैयार कर पूरी दुनिया में मिसाल कायम कर दी। दिल्ली के डॉ. राजेन्द्र सिंह टोंक पिछले 12 सालों में साप्ताहिक स्वास्थ्य शिविर आयोजित कर छह लाख रोगियों का निशुल्क उपचार कर चुके हैं।
इसी तरह दिल्ली के एक व्यवसायी श्रवण गोयल ने गांवों से लोगों का पलायन को रोकने का अभियान चलाया, जो अब जन आंदोलन बनने की ओर अग्रसर है। राजस्थान के बीकानेर जिले के हदा गांव के लोग यातायात के लिए आधुनिक वाहन रहते हुए भी पर्यावरण संरक्षण के लिए अब बैलगाड़ी का प्रयोग करने लगे हैं। गुजरात के मनसुख भाई सुवागिया ने ग्रामवासियों के सहयोग से तीन हजार से अधिक चैक डेम बना दिया। इसी तरह डॉ. बीसी जैन, बासंती बहन, विजय जड़ धरी के प्रयत्न से समाज की मानसिकता में सकारात्मक बदलाव आए हैं। व्यक्तियों के अलावा विभिन्न संस्थानों ने भी सकारात्मक बदलाव के लिए अनूठे कार्यों को अंजाम दिया है। राजस्थान में “अपना संस्थान” हजारों परिं डे टांगकर लाखों पक्षियों को तपती धूप में मरने से बचाया है। दिल्ली की “दधीची देहदान समिति” ने अपने क्षेत्र में बेमिसाल कार्य किया है। बेंगलुरु की “सोकेयर” संस्था ने 300 से अधिक कैदियों के बच्चों को अपराधी बनने से बचाया है। लातूर शहरवासियों ने तो 2017 में ऐसी मिसाल कायम कर दी जो न केवल देश के लिए बल्कि दुनिया के विकासशील देशों के लिए प्रेरणादायक है। ग्रामवासियों ने सभी भेदभाव से ऊपर उठकर बगैर सरकारी सहयोग के 18 किलोमीटर लंबी नदी “माजरा”को पुनर्जीवित कर दिया।
लेखक ने इस पुस्तक के जरिए व्यक्तिगत,संस्थागत और संगठनात्मक स्तर पर रचनात्मक कार्यों के जरिए समाज परिवर्तन के लिए समर्पित गुमनाम आधुनिक समाज शिल्पियों के कार्यों और उनके कारण समाज में हुए सकारात्मक बदलाव को तथ्यों के साथ रोचक तरीके से पेश किया है। लेखक ने ऐसे ही गुमनाम पुरोधाओं को खोजकर सामने लाया है, जो वास्तव में गांधीजी के पद्चिन्हों का अनुसरण करते हुए स्वस्थ और समृद्ध भारत के निर्माण में अपना योगदान दे रहे हैं। पुस्तक का संपादन प्रकाशन भी उत्कृष्ट है और इसमें गांधी जी के कथनों की कसौटी पर भी गुमनाम समाज के शिल्पियों के कार्यों को आंकने की कोशिश की गई, जिससे उनके कार्य और गांधीजी के विचारों का संगम प्रदर्शित होता दिखता है। भाषा सहज है जो पुस्तक को पाठकों के लिए बोधगम्य बनाने में सफल है।
— प्रसून लतांत
मो. 9958103129
ईमेलः prasunlatant@gmail.com

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