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गणतंत्र दिवस विशेष : जनता के सेवक जनता के बारे में सोचेंगे तभी गर्व से खुद को घोषित कर पाएंगे गणतंत्र

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संजय कुमार सुमन

कल हम  सभी 71वें गणतंत्र दिवस के मौके पर तिरंगे झंडे को सलामी देंगे । क्योंकि गणतन्त्र दिवस भारत का एक राष्ट्रीय पर्व है जो प्रति वर्ष 26 जनवरी को मनाया जाता है। इसी दिन सन् 1950 को भारत सरकार अधिनियम 1935 को हटा भारत का संविधान लागू किया गया था।एक स्वतंत्र गणराज्य बनने और देश में कानून का राज स्थापित करने के लिए, 26 नवम्बर 1949 को भारतीय संविधान सभा द्वारा इस संविधान को अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को इसे एक लोकतांत्रिक सरकार प्रणाली के साथ लागू किया गया था।

26 जनवरी को इसलिए चुना गया था क्योंकि 1930 में इसी दिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आई० एन० सी०) ने भारत को पूर्ण स्वराज घोषित किया था। गणतंत्र दिवस पर राष्ट्र अपने महानायकों को स्मरण करता है । हजारों-लाखों लोगों की कुर्बानियों के बाद देश को आजादी मिली फिर राष्ट्र गणतंत्र बना । स्वतंत्रता हमें भीख में नहीं मिली । कइयों ने इसके लिए अपनी जान गँवायी ।

हमारे देश में कदम-कदम पर शौर्य का इतिहास अंकित है। किसी ने सच ही कहा है- ‘कण-कण में सोया शहीद, पत्थर-पत्थर इतिहास है।’ ऐसे ही अनेक देशभक्तों की शहादत का परिणाम है, हमारा गणतांत्रिक देश भारत। ये किसी शासक की कोई निजी संपत्ति नहीं होती है।  इसमें राष्ट्र का मुखिया वंशानुगत नहीं होता है। सीधे तौर पर या परोक्ष रूप से जनता द्वारा निर्वाचित या नियुक्त किया जाता है और मुखिया ऐसा हो जो जनता के सुख- दुख को समझते हुए देश की कमान संभाल सके । इसलिए भारत एक गणतंत्र देश है । आधुनिक अर्थों में गणतंत्र का मतलब सरकार के उस रूप से है जहां राष्ट्र का मुखिया राजा नहीं होता है।   मगर यह भी कड़वी सच्चाई  है कि हमारे देश का सैद्धांतिक रूप से तैयार संविधान आज तक व्यावहारिक रूप में पूरे तरीके से कामयाब नहीं हो पाया है।  हमारा यहां दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान है।  हमारे संविधान में देश के हर एक शख्स को अपने अधिकार दिए गये हैं।  जिसकी बदौलत हर नागरिक पूरी आजादी के साथ अपनी जिंदगी जी सकता है लेकिन फिर भी आज ये शर्म से कहना पड़ रहा है कि कुछ लोगों के पास सारे अधिकार होते हुए भी उन अधिकारों से जीवन जीने का अधिकार नहीं है।  देश में अभी भी अपराध, भष्टाचार, हिंसा, आंतकवाद, जैसी चीज़ों के सामने आम नागरिक घुटने टेक देता है।  भले ही इनसे लड़ने की कोशिश जारी है लेकिन अभी भी हम कामयाबी से कोसो दूर हैं।

हमारा संविधान धर्मनिरपेक्ष की बात पर जोर देते हुए एक समानता की बात करते हुए एक ऐसे समाज के निर्माण की बात करता है जिसमें सब समान हों, सब को अपना अपना हक मिले लेकिन वहीं हमारा देश आए दिन रोज नए मजहबी दंगों में जलता और सुलगता रहता है।  आज भी भूख गरीबी से हमारे अपने तड़पते बिलखते।  हमें सड़कों पर मिल जाएंगे । आज भी फुटपाथ पर गरीब मुफलिस जनता के तौर पर गणतंत्र ठिठुरता मिल जाएगा । महिलाएं देश के दिल दिल्ली तक में सुरक्षित नहीं है। लडकियों को दुष्कर्म कर आज भी जिंदा जला दिया जाता है।  दोषियों को सजा देने की बजाय हमारा संविधान तमाशा देखता रह जाता है।

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व्यापार के इरादे से भारत आए अंग्रेजों ने धीरे-धीरे अपनी कूटनीति चालों से यहां के राजाओं व सामंतों पर अपना अधिकार कर लिया। आजादी की पहली अलख मंगल पांडेय ने 1857 में जगाई थी। लेकिन संचार संसाधनों की कमी के कारण यह आग ज्वाला न बन सकी, लेकिन इस चिंगारी की आग कभी बुझी ही नहीं।

प्रतिवर्ष 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाते समय जब हमें संविधान और हमारी स्वाधीनता की याद आती है। स्वाधीन भारत में कुछ ने मंत्री, कुछ ने प्रधानमंत्री, कुछ एमपी, एमएलए या अन्य पदों का सुख भोगा। उनके बेटे बेटियों को स्वाधीनता सेनानी पेंशन का हकदार माना गया जो आजादी में योगदान को भुनाते रहे। कुछ ने तो मरने के बाद भी पचासों एकड़ जमीन पर कब्जा कर रखा है, कितने ही भवन और पार्कों पर नाम दर्ज हैं और कितनी ही योजनाएं उनके नाम पर चलती हैं। दूसरी तरफ वे हैं जिन्होंने सर्वस्व समर्पित किया देश के लिए लेकिन उन्हें कोई याद तक नहीं करता। गणतंत्र भारत में विनोबा भावे और जयप्रकाश जैसे स्वतंत्रता सेनानियों ने भले ही सत्ता को तिलांजलि दी लेकिन दूसरों ने कई पीिढ़यों तक खूब सत्ता सुख भोगा है, फिर भी उन्हें त्यागी और बलिदानी कहा जाता है।

साठ के दशक में इन्दिरा गांधी ने मोरारजी के खिलाफ चुनाव लड़कर प्रधानमंत्री का पद हासिल किया था। आगे चलकर 1975 में यह पद बचाने के लिए देश में आपातकाल भी लागू किया था। उसके बाद तो इस पद के लिए अनेक बार संघर्ष हुए, आज भी हो रहे हैं। क्या सत्ता लोलुप लोगों को त्यागी और बलिदानी कहना चाहिए। याद कीजिए रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, विनायक दामोदर सावरकर, अरविन्द घोष, मंगल पांडे, चन्द्रसिंह गढ़वाली, चाफेकर बन्धु, गोपाल कृष्ण गोखले, बाल गंगाधर तिलक, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू, रामप्रसाद बिस्मिल, अश्ाफाक़ उल्ला खान, राजेन्द्र लाहिड़ी, खुदीराम बोस, बटुकेश्वर दत्त, हेमू कलानी, विपिन चन्द्र पाल, ऊधम सिंह सहित लिस्ट बहुत लम्बी है। इनके नाम पर कितने भवन, भूमि और योजनाएं हैं। इनका जयकारा भी यदाकदा ही लगता है। नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को अंग्रेजी हुकूमत में बड़ा ओहदा मिल सकता था क्योंकि वह आईसीएस की परीक्षा पास कर चुके थे। दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने, देश के नौजवानों के चहेते रहे, देश और विदेश में रहकर आजादी की लड़ाई लड़ी और अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। कांग्रेस के नेताओं जवाहर लाल नेहरू आदि ने उनके साथ काम करने से मना कर दिया तब वह पार्टी छोड़कर काबुल चले गए और भारतीय राष्ट्रीय सेना बनाई और आजादी का द्वार खटखटा दिया। आजाद भारत के नेता उनके जीवन से जुड़े दस्तावेज भी सार्वजनिक नहीं करना चाहते थे।

आजादी की लड़ाई में क्या उनका योगदान किसी से कम था जो उन्हें याद तक नहीं किया जाता। विनायक दामोदर सावरकर ने अंग्रेजों के घर में रहकर अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। आज भी लंदन के इंडिया हाउस में लिखा है भारत का देशभक्त दामोदर सावरकर यहां रहा था। वह 1857 की लड़ाई को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मानते थे, भारत विभाजन के खिलाफ थे, जाति प्रथा के बहुत खिलाफ थे, बन्दी बनाकर भारत लाया जा रहा था तो अथाह सागर में कूद कर निकल गए थे और उन्हें आजादी की लड़ाई में भाग लेने के लिए 50 साल की कैद हुई थी। अंडमान निकोबार जेल में अधिकांश जीवन बीता और 1966 में उन्होंने शरीर त्याग दिया। जीवन में या मरणोपरान्त उन्हें क्या मिला, कोई उनका नाम तक नहीं लेता। बिरसा मुंडा ने छापामार युद्ध के जरिए अंग्रेजों से लोहा लिया था। अंग्रेजों ने उनकी सेना पर रात के अंधेरे में हमला करके उन्हें हिरासत में लिया और फांसी की सजा दी। उनका एक चित्र लोकसभा की गैलरी में लगा है लेकिन देश के अधिकांश लोग उन्हें नहीं जानते। इसी प्रकार चाफेकर बन्धुओं का नाम भी लोगों के ध्यान में कम ही आता है। पूना के निकट एक गाँव के दामोदर हरि, वासुदेव हरि और बालकृष्ण हरि तीनों बलिदानी भाइयों ने मिलकर पूना के प्लेग कमिश्नर रैंड को मौत के घट उतार दिया था क्योंकि वह जश्न मना रहा था जब भारत के लोग प्लेग से मर रहे थे। भारतवासियों में देशभक्ति की चिनगारी फूंकने वालों की जरूरत है।

हम जानते है कि वोट भीडतंत्र से तो मिल सकता है लेकिन लोकतंत्र से नहीं ।हमारे सिस्टम में लगातार सुधार की गुंजाइश है।एक आंदोलन की जरूरत है। जागरूक समाज की जरूरत है। गरीब, वंचितों के बारे में सोचने की जरूरत है। हिंदुस्तान में असल गणतंत्र तभी हो पाएगा जब हर नागरिक अपना कर्त्तव्य निभाएगा, सरकारें, ब्यूरोक्रेट्स, जनता के सेवक जनता के बारे में सोचेंगे तभी हम लोग सिर उठाकर गर्व से कह पाएंगे और स्वयं को गणतंत्र घोषित कर सकेंगे।

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