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आपदा के प्रभाव को कम करने के लिए मनोविज्ञान

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                       आपदा के प्रभाव को कम करने के लिए मनोविज्ञान

आज कोरोना वायरस के कारण पूरे संसार में हाहाकार मचा हुआ है। संसार के कुछ देश को छोड़कर करीब-करीब सभी देश इस आपदा को भुलाने को मजबूर है। हर  देश अपने – अपने नागरिकों के जान की चिंता में डूबा हुआ है तथा दवाई आदि के इजाज में लगे हैं। हमारा देश भारत भी इस संक्रमण से अछूता ना रहा है। दिन-ब -दिन संक्रमित व्यक्तियों की संख्या बढ़ती जा रही है और उसी में से कुछ काल के गाल में समाने को विवश हो रहे हैं। आज देश की सारी शक्तियां इससे निपटने में लगे हुए हैं। ऐसा लगता है कि जनजीवन थम सा गया है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि यह कोई साधारण आपदा नहीं है तभी तो हमारा देश लॉकडाउन झेल रहा है। सामान्तया देखा जाता है कि आपदा के समय आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था चरमरा जाती है। जिसका आकलन आम व्यक्ति भी आसानी से कर लेते हैं, परंतु एक गंभीर अति और भी होती है जिसका अति से तुलना नहीं किया जा सकता है। वह है ‘संवेगात्मक अति’

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण में संवेगात्मक अति का हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर बड़ा ही गंभीर असर होता है। अतः कोरोना त्रासदी लोगों में धन-जन शिक्षा आदि की गंभीर चिंता उत्पन्न कर दी है। इस स्थिति में अवसाद में जाने से बचने के लिए मनोवैज्ञानिक सलाह फायदेमंद हो सकता है। मनोविज्ञान कहता है कि जहाँ चिंता होगी विषाद की स्थिति उत्पन्न होना स्वाभाविक है। विषाद की स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस अवस्था में व्यक्ति नकारात्मक सोच से घिर जाता है। मनुष्य भावना से प्रेरित होता है। अपने से अपनों को बिछुड़ने का गम भावनात्मक दर्द पैदा करता है। बार-बार बुरे विचारों का मन में आने के कारण निंदा विकृति जैसा मानसिक रोग से मनुष्य ग्रसित हो जाता है। जो सेहत के लिए अत्यंत ही दुखदाई होती है। निंदा विकृति असंतुलित रक्तचाप के लिए उत्तरदाई होता है। असंतुलित रक्तचाप मनुष्य को हृदयाघात पहुंचा देता है।वर्तमान स्थिति ऐसी बन गई है कि अगर हम ‘कोरोना’ के चपेट में आने से बच भी गए तो मानसिक रूप से अस्वस्थ होना निश्चित है।

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अगर उपरोक्त विकृति से बच गए और कोरोना का कहार ठंडा भी पड़ जाए फिर भी इस आपदा के उपरांत तनाव विकृति में मानव का जाना तय है । क्योंकि आज देश में राजा हो या भिखारी सभी चिंता से ग्रसित है। इस मानसिक बीमारी से बचने के लिए मनोवैज्ञानिक सलाह सार्थक है। मनुष्य को अपनी दिनचर्या में परिवर्तन लाने की जरूरत है। अभी भारतीय लोकडॉन की अवस्था में है। अतः घर में बंद रहकर नित्य व्यायाम, योग या प्राणायाम आदि का सहारा लिया जा सकता है। घरेलू कार्य में जमकर हाथ बटावें घर के माहौल में लगभग डूब सा जाएं । अगर आप पठन-पाठन में शौक रखते हैं तो घर में रखे पुराने , नए पुस्तक का अध्ययन करें तथा विभिन्न विषयों से संबंधित लेख आदि भी लिखकर अपने को व्यस्त रख सकते हैं। अपने परिवार के बीच आगे की विभिन्न कार्यों के संपादन आदि से जुड़े मुद्दे पर गहन बातचीत तथा कार्य योजना तैयार करें। घर में छोटे बच्चों को पुरानी कहानियां सुनाकर आप अपनी भय और चिंता से मुक्ति पा सकते हैं। अपने आप को मूल्य पैसा से कुछ समय के लिए ध्यान बिल्कुल हटा लें। नए सिरे से अपने सोच को विकसित करें। जैसे आप शुन्य बिंदु से ऊपर उठ रहे हों और अपने जीवन का पुनर्गठन कर रहे हों।

कहने का तात्पर्य है कि अपने को इस तरह व्यस्त रखें कि अनावश्यक रूप से सोशल मीडिया पर आए भ्रामक खबर पढ़ने और विश्लेषण करने का समय ही ना बचे। इस तकनीक से आप अपने शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सकते हैं। जिससे किसी प्रकार भी वायरस आपके शरीर में आसानी से प्रवेश नहीं कर सकेगा। बांकी चिकित्सक, स्वास्थ्य मंत्रालय या WHO द्वारा जारी बचाव के निर्देशों जैसे बार-बार हाथ धोना, चेहरे को मास्क आदि से ढकना, अपने घर और खुद को बार-बार सैनिटाइज करना, अनावश्यक घर से बाहर ना निकलना, भीड़भाड़ से बचना, सामाजिक दूरी बनाना आदि का शत-प्रतिशत पालन करें। हाथ धोने आदि की क्रिया को बार-बार करने को याद रखने के लिए प्रसिद्ध शरीर क्रिया शास्त्री ‘पैवलव’ महोदय के अनुकूल सिद्धांत के आधार पर अपने घर में भी इस ऐसे आईडिया को विकसित किया जा सकता है कि घर घुसते ही या खाना खाने के पूर्व हाथ देने हेतु संकेत शब्द सुनाई पड़ जाए। इन सभी तकनीक का इस्तेमाल कर मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहा सकता हैं और आपदा के प्रभाव का असर कम किया जा सकता हैं ।

 

डॉ आनंद कुमार सिंह ( सहायक प्राचार्य )
स्नातकोत्तर मनोविज्ञान विभाग BNMU मधेपुरा

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