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टीकापटी क्षेत्र के क्रांतिकारियों की कहानी नक्षत्र मालाकार के बिना अधूरी

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स्वराज आश्रममें उनका नाम गरम दल के क्रांतिकारियों में शुमार था
अंग्रेज ही नहीं, बल्कि सामंती प्रवृति तथा चोर-डाकू उनके नाम से ही कांपते थे
गरम दल में आजाद दस्ता के नाम से एक कमिटी बनी थी, जिसके वे सदस्य थे
उनकी नीति थी कि भीख मांगकर आजादी हासिल नहीं करेंगे
उनकी पांच कहानी आज भी लोग चटकारे के साथ सुनते हैं

अभय कुमार सिंह@रूपौली,पूर्णिया 
कहा जाता है कि अंग्रेजी हुकूमत के हुक्मरानों द्वारा जब यहां आतंक एवं लोगों की आवाज को दबाया, कुचला जा रहा था, तब ही यहां के लोग आजादी के दिवाने हो गए थे तथा उत्तर बिहार का सबसे बडा क्रांतिकारी स्वराज आश्रम टीकापटी में स्थापित हो गया था । इस आश्रम में बापू के तथा सुभाशचंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रषेखर आजाद आदि के दिवाने थे तथा वे नरम दल एवं गरम दल में बंटे थे । इन क्रांतिकारियों में अगर महान क्रांतिकारी नक्षत्र मालाकार की चर्चा ना हो तो वह अधूरा माना जाएगा । नक्षत्र मालाकार मूल रूप से कटिहार जिला के बरारी में 1905 में हुआ था । वे शुरू से ही क्रांतिकारी मिजाज के थे तथा 20 वर्श की उम्र में ही क्रांतिकारियों के साथ हो गए थे । वे गरम दल के थे तथा उनका मानना था कि बिना प्रतिकार के कोई चीज हासिल नहीं किया जा सकता है, वे भीख मांगकर आजादी हासिल नहीं कर सकते । इसलिए वे हमेशा गोली-बंदूक की बात किया करते थे । वे चर्चा में तब आए थे, जब उन्हेांने अंग्रेजी कलक्टर को बीच धारा में काटकर बहा दिया था । आज भी टीकापटी पुल को कलक्टरी घाट ही कहा जाता है । 1942 की करो या मरो आंदोलन के समय 25 अगस्त 1942 को रूपौली में दारोगा को जलाने की घटना के बाद यहां अंग्रेजों का काफी अत्याचार षुरू हो गया था । अंग्रेजी सिपाही एवं बलूचीस्तानी फौज ने यहां के लोगों पर जो जूल्म ढाए थे, उसकी कहानी सुनकर आजभी लोग कांप उठते हैं । उसी दौरान कुरसेला से अंगे्रजी कलक्टर इसी टीकापटी घाट के रास्ते आनेवाले थे । यह खबर जैसे ही फैली, नक्षत्र मालाकार अपना दस्ता लेकर घाट पर पहूंच गए तथा एक अपाहिज बनकर किसी प्रकार उस कलक्टर की बैलगाडी पर सवार हो गए । पानी कम होने के कारण तब नदी में बैलगाडी आर-पार हो जाया करती थी, जैसे ही उनकी गाडी बीच धारा पहूंची, तब अचानक उन पर वार कर दिया तथा मार कर नदी में बहा दिया। अचानक हमले से उनके साथ चल रहे सुरक्षाकर्मी घबडाकर वहा से भाग खडे हुए थे । इसके बाद यहां के भौवा ड्योढी के जमींदार को जो सामंती प्रवृत्ति के थे तथा अंग्रेजों के साथ मिलकर यहां लोगों पर अत्याचार करते थे तथा लगान वसूली को लेकर वे किसानों पर काफी जूल्म ढाते थे। इसी को लेकर किसानों का समूह उनके पास पहूंचे थे । किसानों की गुहार पर उनहोंने टीकापटी के किसानों से वसूली कर लौट रहे जमींदार को तब भौवा जंगल हुआ करता था, जहां बाघ, हाथी सहित अनके जंगली जानवर रहते थे, जंगल के रास्ते में ही हाथी से जा रहे जमींदार को इनका दस्ता ने घेर लिया था तथा उन्हें उतारकर उनकी हत्या कर दी गई थी तथा षव को खटिया पर लादकर गांव भेज दिया था । तब से कोई भी व्यकित मालगुजारी वसूली करने नहीं आया ।

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शिक्षाविद मोहीचंद केशरी

इधर यहां के भैंसवारों द्वारा किसानों की फसलों को जबरन चरा दिया जाता था, चोर डाकू अंगे्रजों से मिलकर यहां काफी अत्या कत्याचार करते रहते थे, जिससे परेशान हो पीड़ितों  ने स्वराज आश्रम में जब इस बात की शिकायत की, तब उनके द्वारा एक बाघ के पंजे जैसा हाथ में पहननेवाला एक हथियार बनवाया तथा जो भी भैंसवारया चोर-डाकू पकडे जाते, उनका नाक-कान काट लिया जाता था, जिससे वह भी आतंक समापत हो गया । ठीक इसी तरह यहां पुलिस के दलाल भी बहुत थे, दलालों की वे बेदर्दी से हत्याकर देते थे ।

इस संबंध में यहां के शिक्षाविद मोहीचंद केशरी कहते हैं कि नक्षत्र मालाकार किसी की पीडा या किसी की दबंगई बर्दास्त नहीं करते थे । जब भी उन्हें यह पता चलता था कि कोई व्यकित किसी को प्रताडित कर रहा है, उसे वे छोडते नहीं थे । उनके नाम की चर्चा आज भी यहां के बूढे-बुजूर्गों की जुबान पर सुना जा सकता है। उनका निधन 1973 में हुआ । कुल मिलाकर नक्षत्र मालाकार जैसे क्रांतिकारियों के आक्रामक रूप का ही फल था कि यहां से अंग्रेजों को अपना राज समेटना पडा तथा भागना पडा । आज यहां की मुखिया शांति  देवी एवं ग्रामीणों के प्रयास से उन्हीं क्रांतिकारियों की याद में यहां अनेक कार्यक्रम होने जा रहा है । मुख्यमंत्री नीतीश कुमार यहां 10 नवंबर को आने वाले थे, परंतु रामजन्मभूमि पर फैसला आने को लेकर उनका आना स्थगित हो गया । फिर अगले एक-दो सप्ताह के अंदर आने की संभावना है । वे स्वयं उस स्वराज आश्रम, गांधीसदन को ऐतिहासिक धरोहर के रूप में गांधी सर्किट से जोडने जा रहे हैं । इसके अलावा टीकापटी को प्रखंड, डिग्री काॅलेज सहित अनेक तोहफा देनेवाले हैं ै ।

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