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दीपावली विशेष :- चायनीज दीप के आगे धुंधली रौशनी में टिमटिमाते मिट्टी के दीपक

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संजय कुमार सुमन/मधेपुरा

राष्ट्रहित का गला घोंट कर,
छेद न करना थाली में।
मिट्टी वाले दीये जलाना,
अब की बार दीवाली में।
देश के धन को देश में रखना,
नहीं बहाना नाली में।
मिट्टी वाले दीये जलाना,
अब की बार दीवाली में।
बने जो अपनी मिट्टी से,
वो दीये बिके बाजारों में।
ये गीत के बोल दीपावली को लेकर है।आधुनिकता की इस दौर में लोग पारंपरिक चीजों का इस्तेमाल भूलते जा रहे
हैं। उन्हें तेल के दीयों से ज्यादा चमकदार बिजली के तार लगने लगे हैं। ऐसी स्थिति में पुराने समय से चली आ रही मिट्टी के दीयों का कारोबार ठंडा होता जा रहा है। आज भी पुरानी परम्पराओं को जीवित रखने में मधेपुरा के कुंभकार समाज की अहम भूमिका है। पर्व को लेकर दीये बनने लगे हैं।

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कुंभकार समाज के अधिकांश युवा आज बदलते जीवन शैली के साथ अपनी परम्परा और सभ्यता को दरकिनार कर आधुनिकता का दामन पकड़ इस सामाजिक परम्परा से दूर होते जा रहे हैं। कभी प्रकाश पर्व के अलावा अन्य उत्सवों में दीये समेत मिट्टी के बने अन्य सामान बेचकर इनका परिवार आसानी से चलता था। आज वही लोग अपने जीवन के लिए रोशनी की तलाश कर रहे हैं। हालांकि इस समाज के बड़े-बुजुर्ग मिट्टी के दीये का वजूद बचाने के लिए आज भी संघर्ष कर रहे हैं। इस हुनर को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की कवायद भी की जा रही है। इन दीयों में न केवल हुनर को बरकरार रखने की क्षमता है बल्कि राष्ट्रभक्ति का संदेश भी। मिट्टी के दीये,कलश,ढकनी बेचने वाले दुकानदार बबलू कुमार पंडित,बिंदेश्वरी पण्डित,चन्देश्वरी पण्डित व राजकुमार पंडित का कहना है कि अब मिट्टी से बनी सामग्री की मांग कम हो गई है। इसलिए हमारे बच्चे इस काम को छोड़कर दूसरे राज्य में जाकर मजदूरी कर रहे हैं। इसके लिए सरकार व जनप्रतिनिधि भी जवाबदेह है। कभी कुटीर व परम्परागत रोजगार को बढ़ावा नहीं दिया गया और बाजार में चाइनीज सामान को बेचने की छूट दे दी गई। जिसके कारण पराम्परागत रोजगार दम तोड़ रहा है। हालांकि अब चाइनीज सामान के बहिष्कार की बात सुनकर उम्मीद की किरण जगी है। इस साल दस से पंद्रह हजार रूपया आमदनी की उम्मीद है। जिससे कुछ जगहों पर चाक की रफ्तार बढ़ गई है।

सीताराम पंडित,अरुण पंडित ने बताया कि हाल के वर्षों में मिट्टी के सामान की मांग में आई कमी के चलते कुम्हारों की रुचि लगातार इस पेशे में घटती जा रही है। पहले दीपावली के समय बड़ी संख्या में मिट्टी के दीपों का सामान का कारोबार होता था। लेकिन अब मिटटी के सामान दीयों का बाजार लगातार मंदा होता जा रहा है। अब चाइनीज इलेक्ट्रानिक लाइट, इलेक्ट्रानिक दीयों ,फूल झड़ी सामान ने मिटटी की वस्तुओं को अंधकार में धकेल दिया है। लोग चीन के बने लाइट,दीप,गणेश-लक्ष्मी की मूर्ति,खिलौने आदि को ज्यादा महत्व देने लगे हैं। इससे कुम्हार समाज के लोग निराश है और धीरे-धीरे इस पेशे से मुंह मोड़ते जा रहे है।वहीं ग्रामीणों का कहना है कि मिट्टी के दीये सिर्फ घरों में रोशनी ही नहीं बिखेरते,बल्कि इसमें देशभक्ति का संदेश भी छिपा है।बिजली के दीये व लडिय़ां सस्ता होने के कारण उसे लोग खरीद रहे हैं लेकिन इस वर्ष मिट्टी के दीये से दीपावली मनाई जाएगी और अन्य लोगों को इसके प्रति प्रेरित भी किया जाएगा।

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