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काउंसलिंग कर मेडिकल कॉलेज में दीपक लोगों को कर देते हैं ठीक

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मधेपुरा/ जन नायक कर्पुरी ठाकुर मेडिकल कॉलेज एंड अस्पताल आज कोविड अस्पताल बन गया है जहाँ न केवल मधेपुरा बल्कि समूचे कोसी सिमांचल सहित बिहार के अन्य क्षेत्रों से भी मरीज यहाँ इलाज को आते है.ऐसे में यहाँ के कर्मियों की जिम्मेदारी बहुत अधिक  बढ़ गयी है. मरीज के भर्ती से लेकर उनके छुट्टी पर गेट से सकुशल निकालने तक में यहाँ के कर्मियों का बड़ा रोल है. ऐसे में यहाँ एक ऐसी संस्था के कर्मी कार्यरत है जो दिन रात 24 घंटे उम्मीद से ज्यादा काम कर रहे है और डंटे रहते है. मै बात कर रहा हूँ संजीवनी की जिसके कर्मी निबंधन काउंटर से लेकर कंट्रोल रूम तक 24 घंटे सँभालते है.

संजीवनी के सुपरवाइजर दीपक कुमार बताते है कि मेडिकल कॉलेज में जैसे ही कोई मरीज आते है सबसे पहला उसका रजिस्ट्रेशन होता है जहाँ बिना किसी लापरवाही के संजीवनी के लडके मौजूद रहते है जो लोगों का तुरंत निबंधन कर चिकित्सक के पास भे देते है जहाँ से उसका इलाज हो पाता है. कोविड स्पेशल रजिस्ट्रेशन के लिए भी बिल्डिंग संख्या चार में सीढ़ी के पास एक छोटी सी कोठरी में 24 घंटे निबंधन के लिए बैठे रहते है .इसी तरह सबसे बड़ी जिम्मेदारी वाली काम कंट्रोल रूम की जहाँ कॉल सेंटर पर लोग तैनात है जहाँ समूचे बिहार सहित आम कॉल के आने पर उसे निपटाया जाता है.कहाँ क्या परेशानी है यहीं सब आता है जिसके बाद यहीं से उसे आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजा जाता है.

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वो बताते है कि कण्ट्रोल रूम की भूमिका इसलिए भी बड़ी है कि उन्हें तमाम लोगों के साथ साथ बेड की उपलब्धता, ऑक्सीजन की उपलब्धता ,पिछले 24 घंटे में क्या कुछ हुआ हर कुछ अपडेट रखना पड़ता है. मेडिकल कॉलेज में कार्यरत संजीवनी  के सुपरवाइजर दीपक कुमार का काम तो बस टीम के कर्मियों का मोनिटर करना है लेकिन ये एक बड़ा काम यहाँ कर रहे है. दीपक बताते है कि यहाँ कई बार ऐसी स्थिति होती है कि जो लोग ठीक भी हो गये है वो भी घर नही जाना चाहते है. कहते हैं कि वो शंका में रहता है कि कहीं घर पर कुछ हो गया तो फिर क्या करेंगे ? ऐसे में दीपक उनको काउंसलिंग करते है, समझाते है, कहानी सुनाते है फिर उसे घर भेजवाते है और फोन पर सम्पर्क में रहते है लेकिन वो बताते है जिसे डॉक्टर ठीक कर देते है घर जाने बोल देते है तो उसे कोई परेशानी आती ही नही है बस लोगों को थोडा शक हो जाता है तो उसको काउंसलिंग से दूर किया जाता है.

वो बताते है कि लोग यहाँ आने के साथ ऑक्सीजन की खोज करते है जबकि उनका ऑक्सीजन लेवल नब्बे बानबे से उपर है.ऐसे मौके पर फिर दीपक उसको समझाते है बिना ऑक्सीजन  वाले बेड पर भर्ती करवाते है और उसे इलाज में मदद कर ठीक होने के बाद घर भेजवाते है.वो बताते है कई बार लोगों को कहानी सुनाकर समझाना पड़ता है जिसके बाद वो समझते है और घर जाने के लिए तैयार हो जाते है. वो कहते है कई बार लोग ठीक होने के बाद भी घर नही जाना चाहते है वो कहीं किसी बरामदा पर लेट जाते है कि नही हमको तो यहाँ से जाना ही नही है ऐसे में उसे कहानी सुनाकर ,किसी मैग्जीन की सर्वे सुनकार मोटिवेट कर घर भेजना पड़ता है.वो बताते है कि चिकित्सक उसको स्वस्थ कर घर जाने बोलते है लेकिन वो बेड नही छोड़ना चाहता है. दीपक बताते है कि यहं लोग आते तो है लेकिन इलाज चिकित्सक को करना होता है लेकिन वो खुद चिकित्सक को अपने स्टाइल से इलाज करने बोल लग जाते है .उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि जरुरतमन्द लोग इलाज के लिए यहाँ जरुर आये लेकिन इलाज चिकित्सक को करने दे अपना कोई प्रेशर उन्हें न दे .चिकित्सक की बातों को गंभीरता से सुने और अमल में लाये .

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