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“कुंवारा बाप”

साहित्य में आज हम कोसी टाइम्स पर पढ़ेंगे अभय कुमार भारती की कहानी "कुंवारा बाप"

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अभय कुमार भारती
अभय कुमार भारती

सितम्बर माह का आखिरी सप्ताह बीत रहा था। बरसात के दिन थे। मौसम भींगा-भींगा था। आसमान काली घटाओं से ढंका था। रह-रह कर बूंदा -बूंदी हो रही थी। गली-कूची, नाली सड़क, सभी जगह कादो-कीचड़ का साम्राज्य। बरसाती पानी का जोर। गंदले पानी में छपर-छपर कर कौन बाहर निकले? कौन कादो -कीचड़ में खुद को साने?
यही सोचकर बेवजह घर से बाहर निकलना मुनासिब नहीं समझा और बूढ़े काहिल की तरह दिन भर बिस्तर पर ही दुबका पड़ा रहा।
अभी शाम के पांच भी नहीं बजे थे। मगर अंधेरे ने आसपास की धरती- सरंग को अपने आगोश में इस कदर ले लिया था कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। सवेरे ही घरों में ढिबरी जल गई। भला ढिबरी की मद्धिम रोशनी इस घने स्याह अंधेरे के आवरण को कैसे फाड़ सकती ? सो तीन हिस्से से ज्यादा अंधेरा ही छाया रहा। ऐसा घना अंधेरा कि दस हाथ की दूरी पर खड़ा आदमी भी नहीं पहचाना जाता। दूर से वह काला कलूटा भूत ही नजर आता।
लोग जैसे-तैसे अपने काम निपटा रहे थे। करीब सात बजे होंगे कि अचानक फिर से बारिश शुरू हो गयी। हौले -हौले हवा का झोंका चलने लगा। कनिया नक्षत्र चल रहा था। इसलिए ठंड ने असर दिखाना शुरू कर दिया था।
मैं चादर ओढ़े बिस्तर पर पड़ा वर्षा की इस आपाधापी को बड़ा ही कौतूहल हो देख रहा था और उसके मनोभावों को पढ़ने की कोशिश कर रहा था। इसी बीच मेघों ने अपनी रणभेरी बजा दी। आसमान का कलेजा दहल उठा। आवाज इतनी तेज थी कि लगा कानों के पर्दे ही चटक गये हो। डर के मारे तूफानों ने भी शोर मचाना शुरू कर दिया। ऐसे में मौसम की बेमानी का क्या कहना! चारो तरफ शोर। जबरदस्त चीख -पुकार ।देखते ही देखते मूसलाधार बारिश शुरू हो गयी,मानो प्रकृति फिर से दहाड़ मार कर रो पड़ी हो।जोरों की बारिश। लगातार वहीं क्रम –। बादलों का गरजना, बिजली का चमकना,तूफानों का शोर, उफनती बारिश घनघोर।
देखते ही देखते धरती पर पानी का रेला चल पड़ा । नाली को पाटने के बाद पानी सड़कों पर बहने लगा था।उबड़-खाबड़ गड्ढों को तालाब बनाने लगा था।
आखिर इस बलखाते मचलते मौसम ने मुझे बिस्तर से उठा ही दिया और मैं बिस्तर से उठकर दरवाजे पर आ गया और कुर्सी लगाकर मौसम के इस मनभावन नजारों को एकटक देखने लगा। कैद करने लगा उसे कौतूहल भरी आंखों में।
सड़क पर पानी लगभग घुटनों तक आ गया था और बढ़ता ही जा रहा था। मुझे इस तरह बैठा देख, इस नजारे को देखने के लिए बहुत से लोग अपने घरों से बाहर निकल आये थे। इसे लेकर आपस में बहस भी होने लगी थी। लोग तरह-तरह की आशंका व्यक्त कर रहे थे।
आखिर पानी ने एक मोड़ ले ही लिया। पता नहीं उसे कौन सी शरारत सूझी!अपनी मर्यादा को भंग कर वह सीधे रास्ते से ना जाकर किनारे को तोड़ते- मरोड़ते निकट के आंगन में घुस गया। लोग हाय तौबा मचाने लगे। लोगों के इस शोरगुल को सुनकर मैं एक अनजानी आशंका से कांप उठा।मगर हकीकत मालूम होने पर दिल को थोड़ी राहत मिली। पानी किसी की देहरी को पार करने लगा था,सो इससे वह घबरा गया और वह हाय तौबा मचाने लग गया।

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सड़क के पानी को अंदर जाने से रोकने के लिए उसने मिट्टी ला-लाकर बांध बांध कर उसे ऊंचा कर दिया,ताकि पानी सीधे रास्ते आगे बढ़ जाय!
मैं इस अनहोनी और भयावह दृश्य को ज्यादा देर तक नहीं देख सका और चुपचाप बिस्तर पर आकर लेट गया। बारिश होती रही और मैं इस नजारे को देख अपने मन के उठते-गिरते विचारों में तालमेल बिठाने लग गया। इसी बीच पता नहीं कब मेरी आँखें लग गयी और मैं नींद के आगोश में खो गया।
सुबह मेरी आँखें करीब छह बजे खुली। वर्षा अभी भी हो रही थी। मगर वर्षा का वह वेग नहीं था,काफी थम चुका था।बस रह रह कर टिप-टिप पानी बरस रहा था।हल्की-हल्की बूंदा-बूंदी हो रही थी।
बहुत से लोग बाहर निकल कर आपस में बतिया रहे थे। तरह-तरह की बातें। मैं भी कुछ सुनूँ! मन में यह जिज्ञासा लिये बाहर निकल कर उस जमावड़े में शामिल हो गया। सुनने लगा कान तेज कर उन सबकी बातें।
मन्नू बता रहा था कि उसके खेत में मिट्टी नजर ही नहीं आ रही है। खेत में ठेहुना भर पानी छा गया है। बुद्धू का पंचकठिया भुट्टा पानी में उब -डूब कर रहा है। कोई कह रहा था कि जलधर के पिछवाड़े की दीवार गिर गयी है। चेथरु के ऐंगना में पानी घुस गया है।
अभी बातचीत चल ही रही थी कि अचानक एक अजनबी साइकिल दौड़ाते हुए आया और लोगों को गप करते देख हठात रुक गया। पता चला वह दुलरू का साला था। एक दो लोग उसे जानते थे।
गणेश बाबू ने उसे रोकते हुए टोका : – “क्या हाल है उधर का ? कैसी बारिश हुई है ? ”
बेचारा यह सवाल सुनकर बड़ा ही गमगीन हो गया और रोनी सूरत बनाकर बोला -” क्या बताएं मालिक! हमलोगों का हाल तो बेहाल हो गया है।सारी लगी लगाई फसल तबाह हो गयी है।”
अभी वह अपनी राम कहानी सुना ही रह था कि चन्दनवां हड़बड़ाते हुए आया
और बीच में ही बोल पड़ा –” आपलोगों को कुछ मालूम है कि नहीं ! ख़ुसूरपुर का डैम टूट गया है।कंथिया तक पानी आ गया है। पूरा इलाका डूबा हुआ है। कहीं एक घर भी नहीं बचा है। सब सब्लाय! कंथिया से दसरुखी तक खाली पानी ही पानी। कहीं-कहीं तो पानी आधा आम गाछ तक चढ़ गया है। कितना मरा, कितना बहा, इसका कोय हिसाब नहीं।”
मैंने अभी तक कभी बाढ़ देखा ही नहीं था। मेरा मन बाढ़ देखने को मचलने लगा। मैंने कुछ साथियों का दल बनाया । रामू ,कारू, भोला, और घुट्टन। वैसे तो वह इलाका हमारे इलाके से काफी दूर था, लेकिन इस बलवती इच्छा के आगे वह कम ही नजर आया।
हमने साइकिल उठाई और चल पड़ा बाढ़ को देखने। कह नहीं सकता! बाढ़ के मनोहारी दृश्य को देखने गया था, या बाढ़ की विभीषिका से रूबरू होने । लगभग ग्यारह बजे हमलोग कंथिया आ गये। बाप रे– ! ये क्या ? पानी तो जैसे दहाड़ मार निगलने आ रहा है। इस विनाशकारी दृश्य को देख मेरा कलेजा कांप उठा। धार क्या उमड़ी थी, जैसे कोई शेर दहाड़ रहा हो।फन उठाये कोई विषधर डंसने आ रहा हो!
हमलोग जिस तट पर खड़े थे। वहां आसपास के कई लोग मौजूद थे। कुछ तो बाढ़ की विभीषिका में अपनी जान पर खेल येन केन प्रकारेण लोगों की जान बचाने और उनकी भरसक मदद करने की जुगत में लगे थे, वहीं कुछ लोग महज बाढ़ के मनुहारी दृश्य का लुत्फ उठाने में लगे थे।
अभी कुछ ही पल बीते होंगे कि वहां का दृश्य ही बदल गया।
पानी की उस उमड़ती धार में एक इंसानी चेहरा बहता नजर आया। उसे देखते ही लोगों में हाहाकार मच गया। एक अजीब तरह का शोरगुल शुरू हो गया। उसे देखते ही कुछ उत्साही युवकों ने कमर कसी और चल पड़े मौत की धाराओं से खेलने। उस समय उन्हें अपनी जान की परवाह नहीं थी। बस सिर पर एक ही धुन सवार थी कि जहां तक हो सके अपनी कूबत पर बाढ़ में फंसे लोगों की जान बचाना। उसकी हर संभव मदद करना।
जब उन युवकों को आगे बढ़ते देखा तो मेरी आत्मा चीत्कार कर बैठी। दिल ने जवाब दिया –” मुझे भी कुछ करना चाहिए। ”
फिर क्या था,अंतर्मन की ललकार सुनने के साथ उन साहसी युवकों की भावनाओं की कद्र करते हुए मैं भी उस जंग में कूद पड़ा।हालांकि मेरे कुछ साथियों ने मुझे रोकने की भरसक कोशिश की। कहा – “क्यों बेकार की जान देने जा रहे हो। जान क्या इतनी सस्ती है,जो लुटाने पर तुले हो। एक तो वो मरे ही जा रहे हैं। ऊपर से तुम क्यों मरने की जिद ठान रहे हो। अगर तुम्हें कुछ हो गया तो तुम्हारे घर वाले को हम क्या जवाब देंगे?बिना मतलब का हम पर लांछन लग जायेगा! तुमपर जो कहर टूटेगा सो टूटेगा ही, हम भी उससे नहीं बच पाएंगे!अपना नहीं तो कम से कम हम लोगों का तो ख्याल करो।”
कुछ देर तो उन सबकी बातों को गौर से सुनता रहा।फिर उसे बेदर्दी से झटक दिया। परवाह नहीं की। और फिर मैं अपने मन पर आ गया। झट मैने पैंतरा बदला और छूटते ही बोला : -” घबराओं नहीं! मुझे कुछ नहीं होगा। और अगर मुझे कुछ हो भी गया तो तुमलोगों पर कोई आंच नहीं आएगी। कहो तो लिखकर दे दूं।”
मैंने उन सब को आश्वस्त तो कर दिया, मगर वे लोग मेरे जवाब से संतुष्ट नहीं हुए।बुरा सा मुंह बनाते हुए अपने में भिनभिनाये- ” अरे जाओ, जाओ! बहुत हो गया। जब मरने पर तुले ही हो तो तुम्हें कौन रोक सकता है?
कहा जाता है न जब सिर पर काल का भूत सवार होता है तो उसकी मति मार दी जाती है। उसे अच्छा- बुरा कुछ नहीं सूझता है।”
इस तरह तंज कसने के साथ उनलोगों ने गुस्से से मुंह फेर लिया।
मैंने उनकी बातों को कोई तरजीह नहीं दी और अनसुनी कर आगे बढ़ गया।
धीरे-धीरे पानी में उतरने लगा। किनारे में पानी घुटने तक ही था, कुछ और आगे बढ़ा तो पानी कमर तक आ गया। बड़ी मुश्किल हो रही थी आगे बढ़ने में।मगर मैं रुका नहीं, बढ़ता ही गया। पानी की तेज लहर हमें आगे बढ़ने नहीं दे रही थी। लगता है वह अपने साथ बहाकर ही दम लेगी,लेकिन हमने हिम्मत नहीं हारी। उसके आगे घुटने नहीं टेके। उससे लड़ते-जूझते
उसकी तेज धारों को चीरते आगे बढ़ गया। जब पानी गर्दन को पार करने लगा। तब हमने अपने पैतरे बदले और खड़ा होकर चलने की बजाय तैरकर आगे बढ़ने लगे। आखिर वहां तक हम पहुंच ही गये, जहां वह इंसानी चेहरा तैरता हुआ नजर आया।करीब जा कर देखा। पच्चीस-छब्बीस वर्ष का एक जवान मूर्च्छित होकर पानी की धार में बहा जा रहा था। जान कुछ बांकी है। इस उम्मीद में समय गंवाना उचित नहीं समझा और बिना देर किये उसे जैसे-तैसे खींचते बाहर तक ले आया। बाहर बहुत से लोग जुट आये थे। किनारे पहुंचते ही उसे कुछ लोगों ने अपने बाहुपाश में लपेट लिया। फिर उसे सूखे मोटे कम्बल पर लिटा दिया । पानी में रहने के कारण उसकी पूरी देह अकड़ गयी थी। हाथ-पांव कड़ा हो गया था। झट उसके बदन को सूखे कपड़े से पोछा गया। फिर पूरे बदन में गरम तेल की मालिश की गयी। गरम तेल की सेंक पड़ते ही उसकी मूर्च्छा टूटी और उसने कराहते ही आंखें खोल दी। तब हमने कुछ ग्रामीणों को उसे किसी डॉक्टर के यहां पहुंचा आने की नसीहत दे डाली।
इस क्रिया कलाप से निपटे अभी दम भी नहीं ले पाया था कि उसी तरह के एक दो चेहरे बहते नजर आये।
वैसे तो मेरा दम फूलने लगा था। देह ऐंठने लगी थी।एक-एक नस दुखने लगी थी। पोर-पोर में पीड़ा उभर आयी थी। हाथ पांव जवाब देने लगा था, लेकिन यह सोचकर कि जब सिर पर कफ़न बांध ही लिया तो फिर घबराना कैसा?”
हमने पुनः पानी की धार में पांव रख दिया और आगे बढ़ गया। काफी जद्दोजहद के बाद आखिरकार उन तक पहुंच ही गया।
मगर ये क्या! देखते ही मेरी आह निकल गयी। एक चटाई पर चादर-भोथरे से लिपटे तीन-तीन जनें। एक पुरुष,एक स्त्री और एक दुधमुंहा बच्चा। मानो तीनों एक ही परिवार के हैं।पति पत्नी और उनका दुधमुंहा बेटा।
तीनों गहन बेहोशी की मुद्रा में। शरीर में जरा भी हरकत नहीं ।चिर निंद्रा में लीन।बिल्कुल बेजान ।दृश्य रोंगटे खड़े कर देने वाला था। देखकर मैं गहन पीड़ा में डूब गया। रूह कांप उठी।एकबारगी आंखें छलछला आयी।कलेजा मुंह को आ गया। सोचने लगा। विधाता की भी क्या गजब की लीला है! इस दम्पति पर भी उन्हें दया नहीं आयी। सच पूछिए उस कारुणिक दृश्य को देखकर मेरे दिल का कोना-कोना रो पड़ा। फिर भी हमने हिम्मत नहीं हारी और दिल पर पत्थर रखकर चटाई को चादर भोथरे के साथ लपेटा और दो तीन हमसफर जवानों के सहयोग से उसे भी खींचते हुए किनारे तक ले आया। फिर सबके सहयोग से उसे बाहर निकाला।
बाहर तो लोगों का हुजूम जुटा ही था। हमारे हाव-भाव को देखकर उन्हें पता चल गया था कि चटाई में लिपटा आदमी जिंदा नहीं मरा हुआ है। फिर भी उसे एक नजर दिखने की लालसा में खोल दिया गया।
चटाई खुलते ही विधाता की करिश्मा का एक नजारा और देखने को मिला। वे दोनों पति-पत्नी तो मर चुके थे। मगर उससे चिपका वह दुधमुंहा बच्चा अभी तलक जिंदा था।
–” कितना गोरा चिट्टा मासूम बच्चा है? कलेजे से लगाने का मन करता है। मगर ठहरा बेचारा अभागा ही। अभी होश भी नहीं संभाला! दुनिया भी नहीं देखी कि उसकी दुनिया उजड़ गयी। जन्म लेते ही छिन गया उनके सिर से माता-पिता का साया। अनाथ हो गया बेचारा। मगर कुदरत के आगे किसका क्या वश चलता है?
वेदना की लहर में डूबते उतरते पल भर के लिए तो मैं काठ बनकर रह गया। मानो पूरे शरीर को लकवा मार गया हो। कुछ देर तक इसी तन्द्रा में बुझा-बुझा सा खोया रहा। तबतलक, जबतलक शोर गुल बढ़ नहीं गया।
दो लाशों के बीच एक जीवित नवजात शिशु मिलने की खबर सुनकर कर लोगों में हड़कंप मच गया। उसे देखने के लिए लोगों की भीड़ जुटने लगी। इन हजारों लोगों के बीच वह नन्हा सा बालक चीख-चीख कर अपनी स्थिति बयां कर रहा था, मगर किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि उसे सीने से लगा ले।अपने अंक में छिपा लें। तरह- तरह के रूढ़िग्रस्त संकीर्ण विचार और दकियानूसी कुंठित मानसिकता उनके बीच बाधक बन रहे थे। लोग तरह-तरह की प्रतिक्रिया जाहिर कर रहे थे। कुछ लोग कह रहे थे–“पता नहीं यह हिन्दू है कि मुसलमान। चमार है कि दुसाध। मालूम नहीं यह किसका बेटा है? किसी चोर-चोहाड़ का ! या किसी शराबी जुआड़ी का ! किसी एय्याश वेश्यागामी का भी तो हो सकता है! हो सकता है वह किसी बदचलन का ही हो! जैसे मां बाप होंगे, बच्चे तो वैसे ही होंगे। आखिर बच्चे के खून में उसके मां-बाप का ही खून मिला रहता है।”
इन्हीं संकीर्ण मानसिकता के चलते लोग उसके प्रति दुःख संवेदना तो प्रकट करते थे।आंसुओं से चेहरे तो भिंगो लेते थे, मगर उसे अपनाने कोई तैयार नहीं हो पाते थे।
किसी तरह उन लाशों के बीच से उस नवजात को अलग किया गया,और फिर लाशों के दाह संस्कार किये जाने की तैयारी की जाने लगी। वहीं के ग्रामीणों के सहयोग से पास के ही पर्पट पर दो बोझा लकड़ी के नीचे दबा उस दम्पति का दाह संस्कार कर दिया गया।
अब समस्या थी कि इस नवजात का क्या किया जाय? अपनाने को कोई तैयार ही नहीं था। सबके सामने जाति धर्म ऊंच नीच आदि के बंधन आड़े आ रहे थे।
कुछ लोग इसे अनाथालय भेजने के पक्ष में थे।मगर मुझे मालूम था कि अनाथालय में अपनों जैसी परवरिश नहीं हो सकती है। वहां सबकुछ तो मिल सकता है, लेकिन मां-बाप का प्यार नहीं मिल सकता है।
मैं नहीं चाहता था कि यह अनाथालय में पले और जिंदगी भर मां-बाप के प्यार के लिए तरसे।आह में तड़प कर जीवन गुजारे। मां का नहीं कम से कम बाप का प्यार तो मैं दे ही सकता हूँ। और चाहूं तो दोनों का प्यार दे सकता हूँ।
यही सोचकर मैंने एक ठोस निर्णय ले लिया और आगे बढ़कर कहा : -“यह बच्चा मुझे दे दीजिए। मैं इसका परवरिश करूँगा।”
लोग मेरी तरफ अविश्वास और अचरज से ताक रहे थे।”
उनकी आशंका को भांपते मैंने जोर देकर कहा :-” सोचते क्या हैं? मैं यकीन दिलाता हूं कि मैं इसे मां-बाप दोनों का प्यार दूंगा। ”
आखिर कार काफी तर्क-वितर्क कर मैं उस नवजात शिशु को उठा लिया।
समय काफी समय बीत चुका है। दिन तो कब के गुजर चुके थे। सांझ भी ढलने लगी थी। मेरे सभी साथी जा चुके थे।
मैंने साइकिल उठाई, और चल दिया। एक हाथ में बच्चे को सीने से लगाये और दूसरे हाथ से साइकिल संभालें धीरे-धीरे चहलकदमी करता आ रहा था। रास्ते भर सोचता आ रहा था कि पता नहीं इस हाल में मुझे देख लोग क्या सोचेंगे! क्या कहेंगे! मगर अगले पल ही इस आशंका को मन से निकाल फेंका यह सोचकर कि दुनिया वाले चाहे, जो सोचे, मगर मैं अपना निर्णय नहीं बदल सकता।और आगे बढ़ चला।
रास्ते में जिसने भी मुझे देखा,उसका मुंह खुला का खुला रह गया।आखिर रात के नौ बजते-बजते घर पहुंच ही गया।
लोग आंख लगाये मेरा ही इंतजार कर रहे थे। घर के लोग आशंकित थे कि पता नहीं किस घनचक्कर में पड़ गया है मन मतंगी।
मुझे इस हाल में देखा तो मां ने तो सिर ही पीट लिया। कहने लगी -” ये कहां से जापाल उठा लाये?क्या घर में कोई अनाथालय खोलोगे?
अपना तो बंदोबस्त हो नहीं सकता है! ऊपर से एक जापाल
उठा लाया है! कहां से खिलाओगे-
पिलाओगे! जरा भी ‘भेजा’ है कि नहीं। भगवान ने मति भी दी है कि नहीं।
क्या कहेंगे लोग,जरा इसका भी तो ख्याल करो!”
मां ने अपने दिल का भड़ांस निकालते हुए कहा।
मैनें मां की बातों का बुरा नहीं माना। मैंने उसे समझाया–” नहीं माँ! वैसी बात नहीं। इस बच्चे को भगवान ने हमारे लिये भेजा है।मैं इसका अच्छे से परवरिश करूंगा। इसे पढ़ा लिखाकर एक काबिल इंसान बनाऊंगा।” इसके साथ ही मैंने उन्हें पूरी राम कहानी सुना दी।
–“तो क्या तुम शादी नहीं करोगे। इसी के सहारे पूरी जिंदगी काट लोगे!मां ने प्रश्न भरी निगाहों से पूछा।
–“नहीं माँ! अब मैं शादी नहीं करूंगा। शादी तो लोग बच्चे के लिए ही करते हैं न!”
–” तो कुंवारे ही बाप बनोगे!” पुनः उसी लहजे में विस्मित होकर मां ने पूछा।
मैंने भी उसी लहजे में उत्तर दिया : “हां मां! मैं कुंवारा ही बाप बनूँगा।चूंकि मुझे डर है कि आने वाली मां इसे भरपूर प्यार नहीं दे सके। इसके साथ सौतेला व्यवहार करे! इसलिए मेरा कुंवारा बाप बनना ही बेहतर होगा।”
मां कुछ न बोली और मैं कपड़े बदलने लग गया।

अभय कुमार भारती

कुशवाहा टोला, लोदीपुर, भागलपुर
(बिहार)- 812001
मो.7634866545.

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