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जीवन एक वरदान है इसे वरदान की तरह जिये

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युग की वर्तमान विषमताओं को दूर करने और नव निर्माण की उदीयमान प्रवृत्तियों को बढ़ाने के लिए साधु वर्ग का योग सबसे अधिक हो सकता है ।यह सुअवसर नर-नारायण की सक्रिय पूजा-उपासना में ही लगाया जाना चाहिए । मानवीय सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन में लगाया गया , श्रम , समय एवं मनोयोग इतना बड़ा तप है , जिसकी तुलना और किसी अन्य पुण्य से नहीं हो सकती ।

उक्त बातें आचार्य अभय दास जी ने कही। वे मधेपुरा,पूर्णिया और भागलपुर जिले के बीच सीमा पर अवस्थित मानव सेवाश्रम मुक्त स्वरूप  आश्रम मुक्तनगर में आयोजित आठ दिवसीय विश्व चेतना लोककल्याण अभियान के अन्तर्गत धर्म और राजनीति आदर्श आचार संहिता संज्ञात महासम्मेलन को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हमारा दावा है कि यदि आज भी धर्मतंत्र से जुड़े लोग लोकेषणा , वित्तेषणा और अहं को छोड़कर संगठित प्रयास करें , तो देखते-देखते समाज बदलता चला जाएगा ।अगर ये धर्माचार्य एकता औए संगठन की शक्ति से समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने में अपनी प्रतिभा और सम्मान का सदुपयोग करते , दुष्प्रवृत्तियों से जन-जन को मुक्ति दिलाते , परिवारों को कलह और विघटन से बचाते , धर्म के सच्चे मर्म को जानकर सही रास्ते पर चलते , समाज की सेवा को ही ईश्वर की सेवा समझते तो क्या देश में नशेबाजी रह सकती थी , दहेज का दानव बहन , बेटियों को निगल सकता था , धूमधाम की शादियों में धन की बरबादी हो सकती थी , जातिवाद , प्रांतवाद , भाषावाद , नारी का अपमान , जनसंख्या वृद्धि की समस्याएँ समाज में रह सकती थीं।लेकिन तथाकथित धर्माचार्य स्वयं भ्रम में पड़े हुए हैं और दूसरों को भी धर्म के नाम पर भ्रम में डालते रहते हैं ।आचार्य अरविन्द प्रकाश ने कहा कि  धर्म का रास्ता इतना आसान नहीं है ! अपने दोष दुर्गुणों को छोड़ना पड़ता है , पवित्र जीवन जीना पड़ता है , समाज की सेवा करनी पड़ती है ।यही धर्म का सच्चा मार्ग है । अस्सी लाख की साधु-सेना यदि इस काम पर जुट पड़े तो समाज में स्वर्गीय परिस्थितियाँ उत्पन्न करना बिल्कुल भी कठिन काम नहीं है।

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स्वामी सुधीर नारायण गोस्वामी ने कहा कि जीवन एक वरदान है इसे वरदान की तरह जिये। हम सुख भोगने के लिए इस संसार में आए हैं। दुःखों से हमें घृणा है। पर सुख के सही स्वरूप को भी तो समझना चाहिए। इन्द्रियों के बहकावे में आकर जीवन-पथ से भटक जाना मनुष्य जैसे बुद्धिमान प्राणी के लिए श्रेयस्कर नहीं लगता। इससे हमारी शक्तियाँ पतित होती हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए तपस्वी संत श्री योगेश ज्ञान स्वरूप जी ने कहा कि अशक्त होकर भी क्या कभी सुख की कल्पना की जा सकती है ।भौतिक शक्तियों से सम्पन्न व्यक्ति का इतना सम्मान होता है कि सभी लोग उसके लिये छटपटाते हैं फिर आध्यात्मिक शक्तियों की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। देवताओं को सभी नत मस्तक होते हैं क्योंकि उनके पास शक्ति का अक्षय-कोष माना जाता है। हम अपने देवत्व को जागृत करें तो वैसी ही शक्ति की प्राप्ति हमें भी हो सकती है। तब हम सच्चे सुख की अनुभूति भी कर सकेंगे और हमारा मनुष्य का जीवन सार्थक होगा। उन्होने कहा कि हमें असुरों की तरह नहीं देवताओं की तरह जीना चाहिये। देवत्व ही इस जीवन का सर्वोत्तम वरदान है हमें इस जीवन को वरदान की तरह ही जीना चाहिए।

उन्होने कहा कि हमारा संकल्प समाज को नई दिशा देने का है। हम जो संकल्प लेते हैं उसे पूरा करते हैं। कोसी नदी के विजय घाट में पक्का पुल बनाने का हमने संकल्प लिया और पूरा किया। इसके लिये हमने आंदोलन किया और जेल गया लेकिन हमने समाज के लिये जो संकल्प लिया वो पूरा हुआ। कार्यक्रम में स्वामी बिंदेश्वरी दास,साध्वी वंदना भारतीय ने कई भक्ति गीत को प्रस्तुत किया। आये हुये संतों को ढोलबज्जा के मुखिया राजकुमार उर्फ मुन्ना मंडल ने माला पहना कर स्वागत किया। आठ दिवसीय कार्यक्रम मे शांति नगर,मिल्की,लुरीदास टोला,ठोलबज्जा गाँव के ग्रामीणों द्वारा श्रद्धालुंओ और संतों के बीच भंडारा दिया।

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