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आलेख : भाषा-विज्ञान की छतरी में परिवार – कमलेश कमल

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मनुष्य जीवन के एक बुनियादी पहलू के रूप में परिवार की महत्ता और उपादेयता सर्वकालिक तथा सार्वभौम है। प्रागैतिहासिक काल से आज तक परिवार का स्वरूप मनुष्य और उसकी चेतना के अनुसार भले ही बदलता रहा हो, पर इसकी उपस्थिति तो निर्विवाद है ही। यही कारण है कि अगस्त कॉम्टे जब इसे समाज की आधारभूत इकाई कहते हैं, तब यह सर्वथा सम्यक् और सटीक प्रतीत होता है।

व्याकरणिक दृष्टि से देखें तो परिवार शब्द बना है- परि और वार से। परि उपसर्ग का अर्थ है- चारों ओर। वार शब्द बना है ‘वारः’ से। वारः स्वयं ‘वृ’ से बना है जो ‘आवृत्ति’ का सूचक है। इसी से ‘वार’ का अर्थ हुआ- ‘दिन जो रोज़ आता है।’ इसके आधार पर देखें, तो सब दिन एक साथ रहने वाले और एक-दूसरे से घिरे रहते वाले लोगों का समूह परिवार है। इसे ऐसे भी देख सकते हैं कि जो अपनी संस्कृति, सुविचार तथा मूल्य रूपी प्रकाश चारों ओर फैलाए, वह परिवार है।

परिवार को परिभाषित करते हुए श्रीराम शर्मा ने कहा- “समाज की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण इकाई परिवार होती है। पारिवारिक जीवन के विश्लेषण से समाज के स्वरूप की स्पष्ट झाँकी मिल जाती है।”
वैसे, तात्त्विक दृष्टिकोण से दुनिया भर में परिवार का कोई एक ही अर्थ लिया जाता है, ऐसा नहीं है। हाँ, ‘परिवार’ और परिवार से संबंधित संबधों के लिए प्रयुक्त शब्दों को भाषा-विज्ञान के नज़रिये से देखने पर प्रतीत होता है कि साम्य का एक सूत्र, समानता का धागा सदा है।

अंग्रेजी में परिवार के लिए ‘family’ शब्द का प्रयोग होता है। इस शब्द की उत्पत्ति लैटिन के ‘famulus’ से हुई है, जिससे शब्द बना ‘familia’ अर्थात् ‘household servant’ या ‘घरेलू-नौकर’। लेट मिडल एज में इंग्लैंड में यही ‘family’ (फैमिली) बना, जिसका अर्थ था व्यक्तियों का एक समूह जो एक छत के नीचे रहता हो, जिसमें सगे- संबंधी और नौकर शामिल थे। फैमिली के लिए रक्त संबंध का होना आवश्यक नहीं है। ठीक इसी तरह की स्थिति ‘परिवार’ के लिए है।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें, तो पूरे विश्व को एक परिवार माना गया है -“वसुधैव कुटुम्बकम”। अंग्रेजी में भी परिवार से ही बने familiar (फैमिलियर) शब्द को देखें, तो वह अर्थ देता है ‘जाना पहचाना’। हम जिस से भी जुड़े हैं, वह परिवार जैसा हो जाता है। कहते भी हैं- “He is like my family!” या “वह मेरे परिवार जैसा है।”

तो, हम देखते हैं कि परिवार के लिए एक छत के नीचे रहना, यौन-संबंध, रक्त-संबंध या साझी रसोई का होना आवश्यक नहीं है। परिवार के समाज शास्त्रीय विभाजन, यथा एकल परिवार, संयुक्त परिवार या फ़िर मातृसत्तात्मक या पितृसत्तात्मक परिवार के विभेद भी देश-काल-समाज आधारित हैं, जिनके अपने-अपने गुण-दोष हैं। बहरहाल, यहाँ, हमारा उद्देश्य है कि भाषा-विज्ञान की छतरी के नीचे परिवार और इससे सम्बद्ध शब्द क्या अर्थ-उद्बोधन करते हैं?

अगर ‘कुटुंब’ शब्द को देखें, तो यह परिवार के मुकाबले एक निश्चित परिभाषा देता है। यह ‘कुटुंब्’ धातु में अच् प्रत्यय जुड़कर बना है, जिसका अर्थ है एक ही कुल या परिवार के वे सब लोग जो एक ही घर में मिलकर रहते हों। भाषा-विज्ञान के अनुसार देखें,तो परिवार के लिए एक ही पूर्व पुरुष के वंशज होना आवश्यक नहीं है; जबकि गोत्र में यह भाव है।

आरंभिक काल में जहाँ गोवंश रखे जाते थे, वह गोत्र था। एक साधु की संतान को गोत्र माना गया।
‘अपात्यम पौत्रप्रभृति गोत्रम’ अर्थात् पोते के साथ शुरू होने वाली वंशावली (‘एक साधु की संतान)’ गोत्र कहलाया। इसलिए सभी गोत्र किसी न किसी साधु के नाम पर हैं। तो, गोत्र का भाव और उसकी परिभाषा ज़्यादा स्पष्ट है। इसमें भी एक गोत्र के वंशज ‘सगोत्र पिंडज’ और भिन्न गोत्र के वंशज ‘अगोत्र पिण्डज’ या ‘भिन्न पिण्डज’ कहलाए।

अब परिवार और पारिवारिक जनों के लिए विभिन्न भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों पर ग़ौर करें, तो उनमें एक अद्भुत समानता का दिग्दर्शन होता है। संस्कृत में जो ‘मातृ’ है, वह अंग्रेजी का ‘mother’ है, इस्लाम का ‘मादर’ ग्रीक का meter, लैटिन का mater, डच का moeder है । इसी तरह पिता के लिए संस्कृत में पितृ है तो गोथिक में fader है, अंग्रेजी में ‘father’ है, ग्रीक में pater है, जर्मन में vater है और अवेस्ता में तो pita ही है।

संस्कृत का ‘भ्रातृ’ यदि हिन्दी में ‘भाई’ बना तो भारोपीय परिवार की अन्य भाषाओं में भी इस मूल से ज़्यादा दूर नहीं है। भ्रातृ अवेस्ता में ‘bratar’ है, रूसी में ‘brat’ है, जर्मन में ‘bruder’, ग्रीक में ‘phrater’, गोथिक में ‘brother’, स्लाव में ‘bratu’ है।

स्वयं हिंदी में इस मूल से बने अनेक शब्द समान भावनात्मक बंधन दिखाते हैं- भ्रातृज, भ्रातृजा, भतीजा, भतीजी, भावज, भ्रातृजाया, भौजाई, भौजी आदि शब्दों को देखते ही इनके मूल और इनकी भाषिक-यात्रा का पता चल जाता है।

इसी तरह ‘भगिनी’ हिन्दी में बहिन, बहन है। अंग्रेजी में ‘sister’ है, रूसी में cectra, जर्मन में scwwester है, ग्रीक में ‘sor’ है, डच में ‘zuster’ है तो गोथिक में ‘swister’ है। इसी तरह संस्कृत का ‘श्वसुर’ हिन्दी में ‘ससुर’ बना, जो जर्मन के ‘sweher’ और लैटिन के ‘socer’ से बहुत दूर नहीं है।

संस्कृत में ‘पुत्र’ के लिए जो ‘सुनु’ है, वही सुत है। ‘सू’ का अर्थ पैदा होना है, तो सुनु का अर्थ है “वह जो पैदा हुआ हो”। ‘पवनसुत’ पवन से पैदा हुए। मज़ेदार यह है कि यही सुनु, अंग्रेजी में son हुआ, रूसी में cin, अवेस्ता में hunu है, जर्मन में sohn है, लिथुआनिया की भाषा में sunus है।

अगर ‘पुत्र’ को देखें, जो कि पितृसत्तात्मक परिवार का वाहक है, तो इसकी व्युत्पत्ति ही इसकी महत्ता को प्रमाणित करती है। सुधी पाठकों के लिए यह जानना मज़ेदार होगा कि इसका शुद्ध रूप है ‘पुत्त्र’ ! वस्तुतः, पुत् धातु में ‘त्र’ जुड़कर यह शब्द बनेगा । प्रयत्न-लाघव के कारण यह ‘पुत्र’ हो गया है। कठोपनिषद् में एक श्लोक है- “पुं नरकात् त्रायते इति पुत्रः।” इसका अर्थ है जो नरक से तारण करे, वह पुत्र है।

परिवार के आदर्श और सदस्यों से अपेक्षित मर्यादा को लेकर अलग-अलग देशकाल में अलग-अलग मान्यता रही है, पर भावनात्मक और सकारात्मक जीवन-यापन सबमें विद्यमान है। रामायण की बहुपत्नी व्यवस्था में भी आदर्श परिवार उपस्थित है, तो महाभारत के बहुपति वाले उदाहरण में भी यह मिल जाता है। तुलसीदास जी लिखते हैं-
बंदऊँ कौशल्या दिसी प्राची।
कीरति जासु सकल जग माची।।
दशरथ राऊ सहित सब रानी।
सुकृत सुमंगल मूरति मानी।।

अगर इसके बरक्स हम महाभारत के द्रौपदी के उदाहरण को देखें, तो वेदव्यास जी ने उसे भी सर्वोत्तम गरिमा से निरूपित किया है।

इस तरह हम यह देखते हैं कि परिवार एक संस्थायीकृत सामाजिक समूह का विशेषण भर नहीं है, जिसपर जनसंख्या प्रस्थापन का भार है; न ही यह विवाह संबंध, आर्थिक व्यवस्था, सामान्य आवास या वंशनाम-व्यवस्था के अवयवों से बनता है। यह तो सामूहिकता का भावबोधक संबोधन है। इन सभी गुणों के समवेत् रूप में समुद्घाटित होने में ही परिवार की सार्थकता है।

    -कमलेश कमल की कलम से

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