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महात्मा गांधी के जीवन संघर्ष की कथा

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कुंज बिहारी शास्त्री साहित्यकार 

महात्मा गांधी का जन्म भारतीय इतिहास में उस समय हुआ जब सिपाही विद्रोह नाम से मशहूर अपने प्रथम स्वाधीनता आंदोलन 1857 की पराजय के धक्के खा खाकर धीरे-धीरे उभर रहा था ।पोरबन्दर जो काठियावाड़ राजधानी थी ।पोरबंदर समुद्र तटवर्ती एक छोटा सा सुंदर शहर है ।करमचंद गांधी के घर में 2 अक्टूबर 1869  को मोहनदास (बापू )का जन्म हुआ ।गांधी परिवार पिढियो से जिस भवन में रहते थे ,उस पवित्र घर मे सत्य और  अहिंसा के जी उपासक बापू के जन्म से और बढ़ गई।ग़ांधी जी के  परदादा हरजीवन गांधी ने ही सन 1777 मैं उसे खरीदा था ।गांधी परिवार संयुक्त परिवार में विश्वास रखते थे ।अपितु संयुक्त परिवार बढ़ता गया, भवन का आकार -प्रकार भी बढ़ता गया ।जो तीन मंजिल इमारत का रूप ले लिया था ,जब गांधी जी का जन्म हुआ ।गांधी परिवार के लोग पोरबंदर के राज दरबार में पीढ़ी दर पीढ़ी सेवा करते आ रहे थे ।बापू के दादा उत्तमचंद गांधी उस रियासत के दीवान बने ।उनके बाद उनके पुत्र करमचंद गांधी दीवान बने ।करमचंद गांधी उच्च आदर्शों के मेधावी व्यक्ति माने जाते थे ।उनकी माताजी पुतली बा भक्ति एवं धार्मिक प्रवृत्ति के आदर्श महिला थी ।उन्होंने तीन पुत्रो और एक पुत्री को जन्म दिया। उनमें सबसे छोटे मोहनदास थे। मोहनदास अपने माता-पिता के लाडले थे ।

बापू छः साल की उम्र में पोरबंदर के एक प्राइमरी स्कूल में शिक्षा ग्रहण करने जाने लगे ।1876 में करमचंद गांधी राजकोट रियासत के प्रधानमंत्री के रूप में राजकोट गए तथा परिवार समेत राजकोट में रहने लगे ।।सही मायने में यहीं से मोहन दास बापू का शिक्षा दीक्षा प्रारंभ हुआ ।1879 में वह शहर के मुख्य ताल्लुक स्कूल में रह कर तीसरे और चौथे दर्जे की पढ़ाई पूरी की ।मोहनदास के बाल मन पर राजा हरिश्चंद्र नाटक ने अपना छाप छोरा ।अपने वचन के लिए समर्पित उस राजा के पवित्र जीवन ने उसे गदगद कर दिया ।13 साल की अवस्था में पोरबंदर के एक व्यापारी गोकुलदास माकन जी की पुत्री कस्तूरबा से शादी हुई ।बाल विवाह में बंधी इस जोड़ी ने तुरंत ही अपना दांपत्य जीवन की शुरुआत की। बापू के पिता जी प्यार से मोना कहा करते थे ।मोहनदास की एक अच्छी आदत में यह शामिल था कि कम से कम दोस्त बनाया जाए ।स्कूल में उनके घनिष्ठ दोस्त मिल लोहना और शेख मेहताब के साथ थी। अपने दोस्तों के संपर्क में रहकर कुछ बुरी आदत धूम्रपान करना, व मांस खाना  सिखा दिया था ।गांधी परिवार पक्के शाकाहारी थे। वह मांसाहार के नाम से ही कांप उठते थे ।संगति ने उसे भटका दिया था ।

मोहनदास अपनी सभी बुराई को पिता के समक्ष प्रकट किया, जिससे उनकी बुरी आदत से छुटकारा मिल गया। प्रकृति को कुछ और मंजूर थी !जब मोहनदास 17 साल के थे और छठे दर्जे में थे तो करमचंद गांधी की मृत्यु हो गई ।गांधी परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर पड़ने लगी। परिवार का जिम्मेदारी जेष्ठ पुत्र लक्ष्मी दास ने उठाई । लक्ष्मीदास को मोहनदास पितृ तुल्य वात्सल्य था। और मोहन दास की पढ़ाई जारी रखने के लिए कहा। 1887 में मुंबई विश्वविद्यालय के मैट्रिक परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। अंग्रेजी में कमजोर होने के कारण श्यामल दास कॉलेज को छोड़कर घर आ गए ।यहीं से श्री मावजी दवे के परामर्श पर लक्ष्मीदास ने मोहन दास को बैरिस्टरी करने के लिए इंग्लैंड भेजने का निर्णय लिया ।जब मोहनदास ने लंदन जाने का निश्चय किया तो कई बाधाएं मडराने लगी ।जिसे अपनी साहस के बाल पर दूर करते गए ।परिवार के पुराने गहनों को बेचकर आर्थिक संकट को दूर किया गया ।माताजी पुतली- बा को डर था कि पश्चात देश में रहकर उनका बेटा परंपरागत अपने महान आचार -विचार को छोड़ बैठेंगे । मोहनदास ने अपने प्रवास के दौरान मदिरा ,मांस ,मैथुन से दूर रहने का वादा कर लंदन पहुंचे और बैरिस्टरी में उत्तीर्ण हुए। ततपश्चात घर लौट आए ।

यही से जीवन कि संघर्ष की शुरुआत होती है। सन 1893 में जब गांधीजी करवेपन और मायूसी से जूझ रहे थे ।अचानक उन्हें एक वरदान मिला ।पोरबन्दर के एक मेमन मुसलमान व्यापारी दादा अब्दुल्ला सेठ को जिनका दक्षिण अफ्रीका में बहुत बड़ा कारोबार था ,एक मुकदमे में एक भारतीय वकील की जरूरत थी ।गांधीजी के समक्ष यह प्रस्ताव रखा गया। गांधीजी खुशी-खुशी इसे स्वीकार कर लिए और दक्षिण अफ्रीका के लिए निकल पड़े ।दक्षिण अफ्रीका उस समय यूरोप से आए अल्पसंख्यक गोरों के अधीन था ।उनके शासन में दक्षिण अफ्रीका के स्वदेशी लोगों और प्रवासी भारतीयों के प्रति रंगभेद का नंगा नाच चल रहा था ।गांधी जी को भी इसका असर देखना पड़ा। उन्हें पीटरमारिटजवर्ग स्टेशन पर रेल गाड़ी से धकेल दिया गया, जब वे अपने गोरे सहयात्री के आपेक्ष करने के बावजूद अपने प्रथम दर्जे के टिकट के आधार पर प्रथम दर्जे में ही यात्रा करने की अरे हुए थे। इस घटना ने गांधी के मन में परिवर्तन लाने के लिए दृढ़ निश्चय का संचार हुआ। गांधी जी के सरल मन में आम जनों की दुखी जीवन को परिवर्तन लाने का विचार देश और दुनिया के लिए एक पहचान छोड़ दिया।अक्टूबर1901से भारत में स्थाई रूप से रहने लगे ।गांधीजी अन्यायपूर्ण कानूनों के प्रति लड़ने के लिए भारतीयों को संगठित किया
 उनके शस्त्र सिर्फ सत्य-अहिंसा थे।इस तरह अन्याय से लड़ने के लिए “सत्याग्रह” का रूप धारण किया जो दक्षिण अफ्रीका के भारतीयों को न्याय दिलाने में सफल रहा ।दूसरों को दुखी देखकर खुद भी उसी रंग में रंगने वाले बाबू 1921 में तमिलनाडु के गरीब गांव वालों को घुटनों तक धोती पहने और ऊपर एक कपड़ा ओढ़े देखा तो वो खुद भी इसी रंग में रंग गए ।31 मार्च 1915 को कोलकाता के एक सभा में उन्होंने ऐसे युवाओं को संबोधित करते हुए कहा था हिंसा भारत की संस्कृति के हिस्सा नहीं है। वही चंपारण सत्याग्रह से गांधी जी कितने ही रास्तों पर देश को ले गए –मजूर महाजन की लड़ाई, खेरा का किसान संघर्ष, असहयोग आंदोलन, साइमन बायकाट, नमक सत्याग्रह जैसे पूरा देश ही खोलने लगा ।बापू के निर्णय का क्रांतिकारियों ने स्वागत किया। परिणाम स्वरूप सत्ता अहिंसा की छड़ी से भारत अंग्रेज मुक्त हुए ।
बापू का जीवन ही उनका परिचय है ।इन्होंने सभी दिशाओं में ,सभी विषयों में ,अपना विचार -मार्गदर्शन भारत वासियों को दिया है ,जिसे अपनाकर राष्ट्र को नई ऊंचाई तक ले जाने में सक्षम  हैं ।बापू के जीवन से प्रेरित होकर उनके बताए मार्ग पर लोगों को चलने पर विवश करती है। उनका सिद्धांत मानववादी है ।जो हमेशा स्मरणीय रहेंगे ।मरते वक्त भी अपने मुख पर गांधीजी जिस राम नाम को रखना चाहते थे वह उनके पास कहां से आया? अपनी आत्मकथा में वे लिखते हैं कि बचपन में उनकी दाई रंभा ने उन्हें अंधेरे से लगने वाले डर का सामना करने के लिए राम नाम का मंत्र दिया था  बचपन में सीखा वह मंत्र जीवन भर उनके साथ रहा— मरते दम तक ।गांधीजी ने इस बारे में कहा बचपन में मिली यह सीख हृदय में बस गई। इस राम नाम ने जीवन के अंधकार में समयो में सूर्य के प्रकाश सा काम किया है ।मेरे लिए राम नाम ने जो काम किया वही काम एक ईसाई के लिए यीशु का नाम कर सकता है ,वैसा ही असर किसी मुसलमान पर  अल्लाह के नाम का हो सकता है पर सिर्फ नाम रखना पर्याप्त नहीं है हमारे रोम-रोम मेंबस जाना चाहिए।
नाम:-कुंज बिहारी शास्त्री
पिता का नाम:-अखिलेश मिस्त्री
ग्राम+पोस्ट+थाना:-चौसा
जिला:-मधेपुरा
बिहार 852213
शैक्षणिक योग्यता:-स्नातकोत्तर
 व्यवसाय:-सरकारी सेवा 
सम्प्रति:-प्रदेश मीडिया प्रभारी, बिहार
             N J A ,BIHAR
जन्मतिथि:-03/07/1990

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