Home » Recent (Slider) » भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के जनक मोहनदास करमचंद गांधी,कृतित्व एवं व्यक्तित्व

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के जनक मोहनदास करमचंद गांधी,कृतित्व एवं व्यक्तित्व

Advertisements

संजय कुमार सुमन समाचार सम्पादक

दे दी हमें आजादी, बिना खड्‍ग बिना ढाल।

साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।

हमारा देश महान स्त्रियों और पुरुषों का देश है जिन्होंने देश के लिए ऐसे आदर्श कार्य किए हैं जिन्हें भारतवासी सदा याद रखेंगे। कई महापुरुषों ने हमारी आजादी की लड़ाई में अपना तन-मन-धन परिवार सब कुछ अर्पण कर दिया। ऐसे ही महापुरुषों में से एक थे महात्मा गांधी। महात्मा गांधी युग पुरुष थे जिनके प्रति पूरा विश्व आदर की भावना रखता था।

महात्मा गांधी को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पिता कहा जाता है। उनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था।उनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। उनके पिता का नाम करमचंद गांधी व माता का नाम पुतलीबाई था। महात्मा गांधी का विवाह मात्र तेरह वर्ष की आयु में ही कस्तूरबा के साथ हो गया था। उनके चार बेटे हरीलाल, मनीलाल, रामदास व देवदास थे।वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के राजनितिक और अध्यात्मिक नेता थे. अंग्रेजों की कुटिल नीति तथा अमानवीय व्यवहार के विरुद्ध गांधीजी ने सत्याग्रह आंदोलन आरंभ किए। असहयोग आंदोलन एवं सविनय अवज्ञा आंदोलन का नेतृत्व किया।उन्होंने हमेशा अहिंसा के पथ पर चलने के लिए प्रेरित किया। देश को आजाद कराने में उनकी बहुत महतवपूर्ण भूमिका है। उन्होंने अपने सत्याग्रह के माध्यम से ब्रिटिश शासन को खत्म करने और गरीबो का जीवन सुधारने के लिए सतत परिश्रम किया। उनकी सत्य और अंहिसा की विचारधारा को मार्टिन लूथर किंग तथा नेलसन मंडेला ने भी अपने संघर्ष के लिए ग्रहण किया। महात्मा गांधी ने अफ्रीका मे भी लगातार बीस वर्षो तक अन्याय और नस्लीय भेदभाव के खिलाफ अहिंसक रूप से संघर्ष किया। उनकी सादा जीवन पध्दति के कारण उन्हें भारत और विदेश में बहुत प्रसिद्धी मिली। वह बापू के नाम से प्रसिद्ध थे।

मई 1893 मे वह वकील के तौर पर काम करने दक्षिण अफ्रीका गये। वंहा उन्होंने नस्लीय भेदभाव का पहली बार अनुभव किया। जब उन्हे टिकट होने के बाद भी ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डिब्बे से बाहर धकेल दिया गया क्योंकि यह केवल गोरे लोगों के लिए आरक्षित था। किसी भी भारतीय व अश्वेत का प्रथम श्रेणी मे यात्रा करना प्रतिबंधित था। इस घटना ने गांधी जी पर बहुत गहरा प्रभाव डाला और उन्होंने नस्लीय भेदभाव के विरूध संघर्ष करने की ठान ली।22 मई 1894 को गांधी जी ने नाटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की और दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के लिए कठिन परिश्रम किया। बहुत ही कम समय में गांधी जी अफ्रीका में भारतीय समुदाय के नेता बन गये। उन्होंने देखा कि भारतीयों के साथ यहां अफ्रीका में इस तरह की घटनाएं आम हैं।अंग्रेज हुक्मरानों की बढ़ती ज्यादतियों का विरोध करने के लिए महात्मा गांधी ने एक अगस्त 1920 को असहयोग आंदोलन की शुरूआत की थी। आंदोलन के दौरान विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में जाना छोड़ दिया। वकीलों ने अदालत में जाने से मना कर दिया। कई कस्बों और नगरों में श्रमिक हड़ताल पर चले गए।गांधी के इस आंदोलन ने अंग्रेजी साम्राज्य को हिलाकर रख दिया था।

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक 1921 में 396 हड़तालें हुई जिनमें छह लाख श्रमिक शामिल थे और इससे 70 लाख कार्यदिवसों का नुकसान हुआ। शहरों से लेकर गांव देहात में इस आंदोलन का असर दिखाई देने लगा और सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद असहयोग आंदोलन से पहली बार अंग्रेजी राज की नींव हिल गई।भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए बिहार में चंपारण आंदोलन महात्मा गांधी की पहली सक्रिय भागीदारी थी। जब गांधी जी 1915 में भारत लौटे, तो उस समय देश अत्याचारी अंग्रेजों के शासन के अधीन था। अंग्रेजों ने किसानों को उनकी उपजाऊ भूमि पर नील और अन्य नकदी फसलों को उगाने के लिए मजबूर किया और फिर इन फसलों को बहुत सस्ती कीमत पर बेच दिया। मौसम की बदहाल स्थिति और अधिक करों की वजह से किसानों को अत्यधिक गरीबी का सामना करना पड़ा जिसके कारण किसानों की स्थिति अधिक दयनीय हो गई।

चंपारण में किसानों की दयनीय स्थिति के बारे में सुनकर, गांधी जी ने तुरंत अप्रैल 1917 में इस जिले का दौरा करने का निर्णय लिया। गाँधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के दृष्टिकोण को अपनाया और प्रदर्शन शुरू किया और अंग्रेज जमींदारों के खिलाफ हड़ताल करके उन्हें झुकने पर मजबूर कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, अंग्रेजों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसमें उन्होंने किसानों को नियंत्रण और क्षतिपूर्ति प्रदान की और राजस्व और संग्रह में वृद्धि को रद्द कर दिया था। इस आंदोलन की सफलता से गांधी जी को महात्मा की उपाधि प्राप्त हुई।खेड़ा आंदोलन गुजरात के खेड़ा जिले में किसानों का अंग्रेज सरकार की कर-वसूली के विरुद्ध एक आन्दोलन था। 1918 में खेड़ा गांव बाढ़ और अकाल पड़ने के कारण काफी प्रभावित हुआ जिसके परिणामस्वरूप तैयार हो चुकी फसलें नष्ट हो गईं। किसानों ने अंग्रेज सरकार से करों के भुगतान में छूट देने का अनुरोध किया लेकिन अंग्रेज अधिकारियों ने इनकार कर दिया। गांधी जी और वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में, किसानों ने अंग्रेज सरकार के खिलाफ एक क्रूसयुद्ध की शुरुआत की और करों का भुगतान न करने का वचन लिया। इसके परिणामस्वरूप, अंग्रेज सरकार ने किसानों को उनकी भूमि जब्त करने की धमकी दी लेकिन किसान अपनी बात पर अडिग रहे। पांच महीने तक लगातार चलने वाले इस संघर्ष के बाद, मई 1918 में अंग्रेज सरकार ने, जब तक कि जल-प्रलय समाप्त नहीं हो गया, गरीब किसानों से कर की वसूली बंद कर दी और किसानों की जब्त की गई संपत्ति को भी वापस कर दिया।प्रथम विश्व युद्ध के बाद, खलीफा और तुर्क साम्राज्य पर कई अपमानजनक आरोप लगाए गए। मुस्लिम अपने खलीफा की सुरक्षा के लिए काफी भयभीत हो गए और तुर्की में खलीफा की दयनीय स्थिति को  सुधारने और अंग्रेज सरकार के खिलाफ लड़ने के लिए गांधी जी के नेतृत्व में खिलाफत आंदोलन शुरू किया। गाँधी जी ने 1919 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपने राजनीतिक समर्थन के लिए मुस्लिम समुदाय से संपर्क किया और बदले में मुस्लिम समुदाय को खिलाफत आंदोलन शुरू करने में सहयोग किया।

महात्मा गाँधी अखिल भारतीय मुस्लिम सम्मेलन के एक उल्लेखनीय प्रवक्ता बने और दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश साम्राज्य से प्राप्त हुए पदकों को वापस कर दिया। इस आंदोलन की सफलता ने महात्मा गाँधी को कुछ ही समय में राष्ट्रीय नेता बना दिया।1920 में असहयोग आंदोलन के शुरू करने के पीछे जलियावालां बाग हत्याकांड एकमात्र कारण था। इस हत्याकांड ने गांधी जी की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया उनको यह महसूस हुआ कि अंग्रेज भारतीयों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने में सफल हो रहे हैं फिर यही वह समय था जब उन्होंने एक असहयोग आंदोलन शुरू करने का फैसला लिया था। कांग्रेस और उनकी अजेय भावना के समर्थन के साथ, वह उन लोगों को विश्वास दिलाने में सफल रहे जो यह जानते थे कि शांतिपूर्ण तरीके से असहयोग आंदोलन का पालन करना ही स्वतंत्रता प्राप्त करने की कुंजी है। इसके बाद, गांधी ने स्वराज की अवधारणा तैयार की और तब से यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का मुख्य हिस्सा बन गए। इस आंदोलन ने रफ्तार पकड़ ली और शीघ्र ही लोगों ने अंग्रेजों द्वारा संचालित संस्थानो जैसे स्कूलों, कॉलेजों और सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार करना शुरू कर दिया। इस आंदोलन को शीघ्र ही स्वयं गांधी जी द्वारा समाप्त कर दिया गया था। इसके बाद चौरी-चौरा की घटना हुई जिसमें 23 पुलिस अधिकारी मारे गए थे।

फ़रवरी 1922 में किसानों के एक समूह ने संयुक्त प्रांत के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा पुरवा में एक पुलिस स्टेशन पर आक्रमण कर उसमें आग लगा दी। हिंसा की इस घटना के बाद गाँधी जी ने यह आंदोलन तत्काल वापस ले लिया।नमक सत्याग्रह महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए प्रमुख आंदोलन में से एक था। इसे दांडी मार्च के नाम से भी जाना जाता है। नमक पर ब्रिटिश राज के एकाधिकार के खिलाफ 12 मार्च, 1930 में बापू ने अहमदाबाद के पास स्थित साबरमती आश्रम से दांडी गांव तक 24 दिनों का पैदल मार्च निकाला था। उस दौर में अंग्रेजों ने ने चाय, कपड़ा, यहां तक कि नमक जैसी चीजों पर अपना एकाधिकार स्थापित कर रखा था। उस समय बापू ने दांडी में नमक बनाकर अंग्रेजी कानून को तोड़ा था।पूना समझौते के बाद गांधी जी ने खुद को पूरी तरह से हरिजनों की सेवा में समर्पित कर दिया।लॉर्ड इरविन की सरकार ने 1930 में लंदन में एक गोल मेज सम्मेलन की मांग की और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसका हिस्सा बनने से इनकार कर दिया। यह सुनिश्चित करने के लिए कि कांग्रेस दूसरे दौर के सम्मेलन में भाग ले रही है, लॉर्ड इरविन ने 1931 में गांधी के साथ समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। इसे गांधी-इरविन समझौता कहा जाता था। इस समझौते में सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने और सभी दमनकारी कानूनों को रद्द करने की बात कही गई।

जेल से छूटने के बाद उन्होंने 1932 ई. में ‘अखिल भारतीय छुआछूत विरोधी लीग’ की स्थापना की। साथ ही 8 मई 1933 से छुआछूत विरोधी आंदोलन की शुरुआत की। उनका यह आंदोलन समाज से अस्यपृश्यता मिटाने के लिए था। उन्होंने हरिजन नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन भी किया था। हरिजन आंदोलन में मदद के लिए गांधी जी ने 21 दिन का उपवास किया था। दलितों के लिए हरिजन शब्द गांधी जी ने ही दिया था। हरिजन से उनका तात्पर्य था ईश्वर का आदमी।

भारत छोड़ो आंदोलन द्वितीय विश्वयुद्ध के समय 9 अगस्त 1942 को आरंभ किया गया था। क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद बापू ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ़ अपना तीसरा बड़ा आंदोलन छेड़ने का फैसला लिया। 8 अगस्त 1942 की शाम को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बंबई सत्र में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा दिया गया था। हालांकि गांधी जी को तत्काल गिरफ्तार कर लिया गया था, लेकिन देश भर के युवा कार्यकर्ता हड़तालों और तोड़फोड़ के जरिए आंदोलन चलाते रहे।गांधी जी के आग्रह करने के कारण भारतीय कांग्रेस समिति ने भारत की ओर से बड़े पैमाने पर अंग्रेजों से भारत छोड़ने के तकाज़े और गाँधी जी ने “करो या मरो” का नारा दिया। इसके परिणामस्वरूप, अंग्रेज अधिकारियों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सभी सदस्यों को तुरंत गिरफ्तार कर लिया और जाँच किए बिना उन्हें जेल में डाल दिया। लेकिन देश भर में विरोध -प्रदर्शन जारी रहा। अंग्रेज भले ही भारत छोड़ो आंदोलन को रोकने में किसी भी तरह से सफल रहे हों लेकिन जल्द ही उन्हें यह महसूस हो गया था कि भारत में शासन करने के उनके दिन समाप्त हो चुके हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के अंत तक, अंग्रेजों ने भारत को सभी अधिकार सौंपने के स्पष्ट संकेत दिए। आखिरकार, गांधी जी को यह आंदोलन समाप्त करना पड़ा जिसके परिणामस्वरूप हजारों कैदियों की रिहाई हुई।

गांधी जी ने 12 मार्च 1930 को गुजरात के साबरमती आश्रम से दांडी गाँव तक किया था। दांडी पहुंचने के बाद, गांधी और उनके समर्थकों ने समुद्र के नमकीन पानी से नमक बनाकर नमक पर कर लगाने वाले कानून का उल्लंघन किया। इसके बाद, अंग्रेजों के कानून को तोड़ पाना भारत में एक व्यापक घटना बन गई। लोगों ने धारा 144 का उल्लंघन करने के लिए प्रतिबंधित राजनीतिक प्रचार पुस्तिकाओं की बिक्री शुरू कर दी। गांधीजी ने भारतीय महिलाओं से कताई शुरू करने का आग्रह किया और जल्द ही लोगों ने सरकारी कार्यालयों और विदेशी सामान बेंचने वाली दुकानों के सामने विरोध-प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। भारतीय महिलाओं ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेना शुरू कर दिया। इस आंदोलन के दौरान सरोजिनी नायडू प्रमुख रूप से आगे आईं थी। उत्तर-पश्चिम में, सबसे लोकप्रिय नेता अब्दुल गफ्फर खान थे, जिन्हें अक्सर “फ्रंटियर गांधी” कहा जाता था।आजादी की लड़ाई में गांधी जी का योदगान धीरे धीरे शिखर को चुमने लगा। अंत में अंग्रेज विवश हो गये औऱ ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली के पहल पर कैबिनेट मिशन की घोषणा कर दी गई । ब्रिटीश कैबिनेट मिशन 24 मार्च 1946 को भारत आया । अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र के रुप में दुनिया के पटल पर उदय हुआ । भारतीय स्वतंत्रता में गांधी जी का योगदान अद्वितीय है । आज भी हर भारतीय के जनमानस में गांधी जी का आजादी के लिए संघर्ष की दास्तान विद्यमान है।

30 जनवरी, 1948 वह काला दिन है जब शाम के साढ़े पांच बजे महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह दिन काला इसलिए भी है क्योंकि जहां गांधी की हत्या उनके वैचारिक विरोधी नाथूराम गोडसे ने की, वहीं गांधीवाद की कसमें खाने वालों ने अगली सुबह तक गांधीवाद की भी हत्या कर दी थी। नाथूराम गोडसे मराठी चितपावन ब्राह्मण परिवार में जन्में थे और हिन्दू राष्ट्र नाम के एक मराठी पत्र के संपादक थे। वह हिन्दू महासभा के सामान्य सदस्य भी थे। युवावस्था में गोडसे ने कुछ समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में भी बिताए थे। वैचारिक मतभेदों के कारण वह संघ से अलग हो गए थे।कोर्ट ने नाथूराम को महात्मा गांधी की हत्या के दोष में 15 नवम्बर 1949 को फांसी की सजा सुनाई।बता दें कि महात्मा गांधी का हत्यारा नाथूराम गोडसे उनके उस फैसले से काफी नाराज था, जिसमें भारत की ओर से पाकिस्तान को आर्थिक सहायता दी जानी थी। पाकिस्तान को इस सहायता के पक्ष में गांधीजी ने उपवास भी रखा था। गोडसे के दिमाग में एक बात बैठी हुई थी, जिससे उसे ऐसा लग रहा था कि सरकार द्वारा अपनाई जा रही मुस्लिमों के प्रति तुष्टीकरण की नीति भी गांधीजी की ही देन है। नाथूराम एक कट्टर हिंदू था। भारत के विभाजन के समय हुई लाखों हिंदुओं की हत्या में भी गोडसे, महात्मा गांधी को ही जिम्मेदार मानता था।

Comments

comments

Advertisements
x

Check Also

ओबीसी छात्रावास चालू करवाने हेतु छात्र जाप ने एसडीओ को सौंपा मांगपत्र

मधेपुरा   आज जन अधिकार छात्र परिषद मधेपुरा के जिला अध्यक्ष रौशन कुमार बिट्टू के नेतृत्व में जाप छात्र परिषद ...