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हिन्‍दी का दुर्भाग्‍य,यह गरीबों,अनपढ़ों की भाषा बनकर रह गई

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संजय कुमार सुमन साहित्यकार

हिन्दी दिवस प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को मनाया जाता है।बहुत सी बोलियों और भाषाओं वाले हमारे देश में आजादी के बाद भाषा को लेकर एक बड़ा सवाल आ खड़ा हुआ। आखिरकार 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया। हालांकि शुरू में हिंदी और अंग्रेजी दोनो को नए राष्ट्र की भाषा चुना गया और संविधान सभा ने देवनागरी लिपि वाली हिंदी के साथ ही अंग्रेजी को भी आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया, लेकिन 1949 में आज ही के दिन संविधान सभा ने हिंदी को ही भारत की राजभाषा घोषित किया। हिंदी को देश की राजभाषा घोषित किए जाने के दिन ही हर साल हिंदी दिवस मनाने का भी फैसला किया गया, हालांकि पहला हिंदी दिवस 14 सितंबर 1953 को मनाया गया।
सनद रहे कि वर्ष 1918 में महात्मा गांधी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने को कहा था। इसे गांधी जी ने जनमानस की भाषा भी कहा था। आजादी के बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर सन् 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है।इसे हिन्‍दी का दुर्भाग्‍य ही कहा जाएगा कि इतनी समृद्ध भाषा कोष होने के बावजूद आज हिन्‍दी लिखते और बोलते वक्‍त ज्‍यादातर अंग्रेजी भाषा के शब्‍दों का इस्‍तेमाल किया जाता है और तो और हिन्‍दी के कई शब्‍द चलन से ही हट गए। ऐसे में हिन्‍दी दिवस को मनाना जरूरी है ताकि लोगों को यह याद रहे कि हिन्‍दी उनकी राजभाषा है और उसका सम्‍मन व प्रचार-प्रसार करना उनका कर्तव्‍य है।  हिन्‍दी दिवस मनाने के पीछे मंशा यही है कि लोगों को एहसास दिलाया जा सके कि जब तक वे इसका इस्‍तेमाल नहीं करेंगे तब तक इस भाषा का विकास नहीं होगा।हिन्‍दी विश्‍व में चौथी ऐसी भाषा है जिसे सबसे ज्‍यादा लोग बोलते हैं।

आज हर माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए अच्छे स्कूल में प्रवेश दिलाते हैं। इन स्कूलों में विदेशी भाषाओं पर तो बहुत ध्यान दिया जाता है लेकिन हिन्दी की तरफ कोई खास ध्यान नहीं दिया जाता। लोगों को लगता है कि रोजगार के लिए इसमें कोई खास मौके नहीं मिलते। हिन्दी दिवस मनाने का अर्थ है गुम हो रही हिन्दी को बचाने के लिए एक प्रयास। कोई भी व्यक्ति अगर हिन्दी के अलावा अन्य भाषा में पारंगत है तो उसे दुनिया में ज्यादा ऊंचाई पर चढ़ने की बुलंदियां नजर आने लगती हैं चाहे वह कोई भी विदेशी भाषा हो, फ्रेंच या जर्मन या अन्य।ताजा आंकड़ों के मुताबिक वर्तमान में भारत में 43.63 फीसदी लोग हिन्‍दी भाषा बोलते हैं जबकि 2001 में यह आंकड़ा 41.3 फीसदी था। तब 42 करोड़ लोग हिन्दी बोलते थे। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 2001 से 2011 के बीच हिन्दी बोलने वाले 10 करोड़ लोग बढ़ गए।साफ है कि हिन्दी देश की सबसे तेजी से बढ़ती भाषा है ।आइये हम अपनी मातृभाषा हिंदी पर चर्चा करें-
जब एक बच्चा जन्म लेता है तो उसकी जुबान पर जो शब्द आता है वह शब्द होता है माँ ।बच्चा अपनी अभिव्यक्ति का पहला शब्द ही माँ से करता है इसीलिए भाषा को माँ का दर्जा मिला हुआ है इसलिए सबसे पहले भाषा रुपी माँ को मैं प्रणाम करता हूँ ।ऐसा नही है कि केवल हिंदी में माँ को माँ कहा जाता है , विश्व के सत्तर से अधिक भाषाओ में माँ का संबोधन माँ शब्द से मिलता जुलता है इसलिए कोई भी भाषा हो उसका दर्जा माँ के बराबर होता है।हम आज ऐसी ही माँ के प्रति अपना आदर अपना संकल्प और अपनी निष्ठा जाहिर करें।हिंदी जो अधिकांश लोगो की मातृभाषा और देश की राजभाषा है उसकी उम्र आज लगभग एक हजार साल की हो गयी है।लगभग 11 सौ इसवी में संस्कृत , अरबी , फारसी , पाली . ब्रज आदि स्थानीय भाषा के गर्भ से निकली हिंदी आज विश्व की दूसरी सबसे समृद्ध भाषा है ।अंग्रेजी में शब्दों की संख्या एक लाख सत्तर हजार के करीब है तो हिंदी में भी डेढ़ लाख शब्द भंडार है। हिंदी का व्याकरण भी अंग्रेजी की तरह काफी समृद्ध और वैज्ञानिक तरीके का है  इसलिए यह भाषा विश्व व्यापी हो गयी है ।हिंदी जितना संपन्न होगी इसकी उपयोगिता उतनी ही बढ़ेगी।एक समय ऐसा था कि हिंदी माध्यम से प्रतियोगिता परीक्षा देने वालो को सनकी कहा जाता था लेकिन अब उन्हें सम्मान के साथ देखा जाता है लेकिन कभी कभी अचरज होता है कि हिंदी के साथ कैसे कैसे प्रयोग हो रहे हैं। हमें बचपन में सिखाया जाता था कि अख़बार पढो तो भाषा शुद्ध होगी  लेकिन आज कुछ अख़बार ऐसे निकल रहे हैं कि पता ही नही चलता कि वह अंग्रेजी अख़बार है या हिंदी और दलील यह दी जाती है कि आज का युवा ऐसी ही भाषा बोलता है। भाषा के प्रसार में मीडिया का योगदान सबसे अधिक है। भाषा को आसान बनाने के चक्कर में मीडिया ने हिंदी का कबाड़ा किया है ,अब होना यह चाहिए कि आज हम अख़बार पढ़कर अपनी भाषा को सुधारे लेकिन हो रहा है उलटा। आज अंग्रेजी पढने और जानने वाले युवाओ की संख्या अधिक है हिंदी पढने वालो की संख्या कम है। यह दुखद है।भाइयो, हिंदी का महत्व तो विश्व समझ चुका है और भला हो गूगल वालो का जिन्होंने देवनागरी लिपि को अपने सॉफ्टवेर में शामिल किया और हिंदी को उपयोगी और कंप्यूटर फ्रेंडली बनाया।
कहते हैं कि हर चीज की एक उम्र होती है।भाषा की भी उम्र होती है लेकिन भाषा कभी मरती नही है।उम्र के साथ उसमे परिपक्वता आती है और बदलाव भी होते हैं। हिंदी में बदलाव भी हुआ और परिपक्वता भी आई है। एक हजार साल पुरानी हिंदी लगातार समृद्ध हो रही है लेकिन हिन्दी बाजार की भाषा है, गर्व की नहीं’ या ‘हिंदी गरीबों, अनपढ़ों की भाषा बनकर रह गई है’ हमें इस सोच से निकलना होगा। हिंदी बोलकर हमें गर्व करना होगा , हिंदी गरीब ,अनपढ़ के साथ ही अभिजात्य वर्ग की भी भाषा है इसे समझना होगा। हिंदी के प्रति हीन भावना रखना देश के प्रति अन्याय होगा क्योंकि हिंदी और हिंदुस्तान पूरे विश्व में पर्याय के रूप में जाने जाते हैं , हिंदी को नौकरानी नहीं हिंदी को महारानी बनाना है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कहा था कि अपनी भाषा की उन्नति से ही विकास के बाकी रास्ते खुलते हैं इसलिए विकास के सन्दर्भ में भी हिंदी की उपयोगिता उतनी ही है।
जय हिन्द , जय हिंदी !

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