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सफल जीवन में गुरु का अनमोल योगदान

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दीपक कुमार त्यागी स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

भारत के स्वर्णिम इतिहास में गुरु-शिष्य परम्परा के लिए अपना सर्वस्व दाव पर लगा देने वाले बहुत सारे गुरु व शिष्य रहे हैं। भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य की महान परम्परा के अन्तर्गत गुरु (शिक्षक) अपने शिष्य को शिक्षा देता है या किसी अन्य विद्या में निपुण करता है बाद में वही शिष्य गुरु के रूप में दूसरों को शिक्षा देता है। यही क्रम लगातार चलता रहता है। यह परम्परा सनातन धर्म की सभी धाराओं में मिलती है। गुरु-शिष्य की यह परम्परा ज्ञान के किसी भी क्षेत्र में हो सकती है।
भारतीय संस्कृति में गुरु का बहुत अधिक महत्व है। ‘गु’ शब्द का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और ‘रु’ शब्द का अर्थ है प्रकाश ज्ञान। मतलब अज्ञान को नष्ट करने वाला जो ब्रह्म रूप प्रकाश है, वह गुरु है। हमारे देश में प्राचीन काल से ही आश्रमों में गुरु-शिष्य परम्परा का निर्वाह कुशलतापूर्वक होता रहा है। भारतीय संस्कृति में गुरु को अत्यधिक सम्मानित स्थान प्राप्त है। भारतीय इतिहास पर नज़र डाले तो उसमें गुरु की भूमिका समाज को सुधार की ओर ले जाने वाले मार्गदर्शक के रूप में होने के साथ क्रान्ति को दिशा दिखाने वाली भी रही है। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर माना गया है, जो कि निम्न श्लोक से स्पष्ट हो जाता है।

“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर: ।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः”

प्राचीन भारतीय संस्कृति में गुरु और शिष्य के संबंधों का आधार था गुरु का ज्ञान, मौलिकता और नैतिक बल, उनका शिष्यों के प्रति स्नेह भाव, तथा ज्ञान बांटने का निःस्वार्थ भाव। जो भावना उस समय के हर शिक्षक में होती थी। वहीं उस समय के शिष्य भी गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा, गुरु की क्षमता में पूर्ण विश्वास तथा गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण एवं आज्ञाकारी होते थे, उसके अनुसार अनुशासन को शिष्य का सबसे बड़ा महत्वपूर्ण गुण माना गया है।

आज के आधुनिक समय में किसी भी कामयाब व्यक्ति के जीवन पर नजर डाले, तो यह स्पष्ट नजर आता है कि उसको सफलता की बुलंदियों पर पहुचाने में उसके शिक्षक का अनमोल योगदान रहा है। जीवन में एक अच्छा शिक्षक अपने हर शिष्य को सर्वश्रेष्ठ ज्ञान उपलब्ध करवाने का प्रयास करता है, जिससे कि उसके शिष्य का भविष्य उज्जवल हो और वो सफलता के नित नये आयाम स्थापित करके जीवन को सही मार्ग पर ले जा सके। किसी भी छात्र के जीवन को सफल बनाने में शिक्षक बहुत ही अहम किरदार निभाता है। शिक्षक अपने छात्र को अच्छी शिक्षा देकर उन्हें देश का अच्छा नागरिक बनाता है। माता पिता के बाद शिक्षक की वजह से ही किसी भी छात्र का भविष्य उज्वल होता है। किसी भी व्यक्ति के जीवन में माता-पिता के बाद में केवल शिक्षक की ही सबसे अहम महत्वपूर्ण भूमिका होती है। माता-पिता के दिये गये ज्ञान के बाद बच्चों को शिक्षा प्रदान करने में सबसे अहम भूमिका उनका शिक्षक ही निभाता है, इसीलिए किसी भी छात्र के वर्तमान और भविष्य को सफल बनाने में उसके शिक्षक का योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। वैसे तो गुरु-शिष्य की महान परम्परा भारत की संस्कृति का आदिकाल से एक अहम और पवित्र हिस्सा रही है। लेकिन हमारे जीवन में माता-पिता हमारे प्रथम गुरु है, क्योंकि वो ही हमारा इस निराली दुनिया से परिचय करवाते हैं और हमको जीवन जीना सिखाते हैं। इसलिए हमेशा कहा जाता है कि जीवन के सबसे पहले गुरु हमारे माता-पिता होते हैं। भारतीय परम्परा के अनुसार,

“एक शिक्षक वो जलता हुआ दीपक है, जो खुद जलकर दूसरों की जिंदगियों में उजाला भर देता है”।

एक अच्छा शिक्षक अपना पूरा जीवन अपने छात्रों को अच्छा ज्ञान और सही रास्ता दिखने में लगा देता है। शिक्षक हमेशा हमें सफल होने का रास्ता दिखाते हैं और हमारे चरित्र का सर्वांगीण विकास करके उसका सही ढंग से निर्माण करते हैं। वे हमें जिंदगी में एक जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनने में हमारी मदद करते हैं। वो ही हमें जीवन जीने का असली सलीका सिखाते हैं और वो ही हमें अपने जीवन पथ पर ताउम्र सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। जिस तरह से शिक्षक हमें शिक्षा और ज्ञान के जरिए बेहतर इंसान बनने के लिए मेहनत करता है। उस शिक्षक की मेहनत व अनमोल योगदान को सम्मान देने व पहचानने का ही दिन है “शिक्षक दिवस”। इस दिन छात्रों को यह महसूस होना चाहिए कि यही वह दिन है जब हम अपने शिक्षकों के सामने वचन ले कि उनकी कोशिशों को हम जीवन में कभी व्यर्थ नहीं जाने देंगे। छात्रों को यह भी वचन देना होगा कि शिक्षकों ने जो भी हमें सकारात्मक मूल्य सिखाए हैं, हम उनका अपने जीवन में सदैव पालन करेंगे और उनके दिखाये रास्ते पर चलकर देश, परिवार व अपने शिक्षकों का नाम हमेशा रोशन करेंगे।

शिक्षक दिवस मनाने का इतिहास 

शिक्षक दिवस भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति और द्वितीय राष्ट्रपति रहे डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के जन्मदिवस 5 सितंबर के अवसर पर वर्ष 1962, से “शिक्षक दिवस” के रुप में मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि एक बार डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के कुछ छात्रों और दोस्तों ने उनका जन्म दिवस मनाने की उनसे इच्छा ज़ाहिर कि इसके जवाब में डॉक्टर राधाकृष्णन ने कहा कि मेरा जन्मदिन अलग से बनाने की बजाय इसे टीचर्स डे (शिक्षक दिवस) के रूप में मनाया जाए तो मुझे बहुत गर्व होगा। इसके बाद से ही पूरे भारत में 5 सितंबर का दिन टीचर्स डे या शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। इस दिन हम महान शिक्षाविद डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को याद करते हैं और सभी शिक्षकों का सम्मान पूर्वक आभार व्यक्त करते हैं। इस दिन को सभी स्कूलों व संस्थानों के बच्चे और युवा छात्र उत्सव के रूप में मनाते है।

शिक्षक के सामने आने वाली चुनौतियां 

एक शिक्षक के सामने अपने छात्र को शिक्षा प्रदान करते समय बहुत सारी चुनौतियों का सामना करना होता है। क्योंकि उनके छात्र अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि, अलग सांस्कृतिक, अलग-अलग तरह की आर्थिक और धार्मिक पृष्ठभूमि से आने वाले होते है। इस तरह के छात्रों को एक साथ संबोधित करना या संभालना बहुत कठिन काम है। इतना ही नहीं, सबसे बड़ी चुनौती होती है हर छात्र में सीखने और समझने की क्षमता, जो कि हर बच्चे में अलग-अलग होती है। ऐसे में शिक्षक को सभी छात्रों को एक साथ लेकर चलते हुए, अपने तय समय पर कोर्स के मापदंडों के दायरे में रहते हुए शैक्षणिक पाठ्यक्रम को पूरा करने की बड़ी चुनौती होती है। एक शिक्षक फिर चाहे वह पुरुष हो या महिला, पर अपने घर परिवार की भी बहुत जिम्मेदारियां होती है और उन पर भी गृहस्थ जीवन का उतना ही दबाव होता है, जितना हम पर व हमारे माता-पिता पर हमारे घरों में होता है। इस सब के बाद भी एक शिक्षक को हर सुबह कक्षा शुरू होने से पहले उत्साहित और ताजगी से भरे नजर आना होता है। एक शिक्षक को अपनी व्यक्तिगत और पेशेवर चुनौतियों का सामना करते हुए शिक्षक के दायित्व को हंसते हुए निभाना होता है। वो कभी भी कक्षा में रहते समय अपने जीवन की समस्याओं का छात्रों की शिक्षण प्रक्रिया पर कोई असर नहीं होने देता। यह स्कूल में रहते हुए बच्चे नहीं महसूस कर पाते, लेकिन जब वो समय के साथ परिपक्व होते हैं तो खुद-ब-खुद ही इसका महत्व समझ जाते हैं कि विपरीत हालातों में भी मुस्कराना कोई अपने शिक्षकों से सीखें।

शिक्षक का जीवन में महत्व

वैसे तो जीवन में सीखने की कोई उम्र नहीं होती हैं और जो सिखाता हैं वो शिक्षक होता है। इसलिए व्यक्ति के जीवन में शिक्षक का बहुत महत्व होता है। किसी छात्र को शिक्षा प्रदान करने में सबसे अहम भूमिका शिक्षक ही निभाता है, इसीलिए किसी भी छात्र के वर्तमान और भविष्य को बनाने में शिक्षक का अनमोल योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। एक शिक्षक अपनी पूरी जिंदगी में ना जाने कितने अनगिनत छात्रों को पढ़ाकर उनके भविष्य को उज्जवल बनाने की कारगर कोशिश करता है। वो छात्रों को पढाई से लेकर के लोकव्यवहार का ज्ञान जीवन में किस तरह से रहना, किस तरह का सभी से बर्ताव करना, मुश्किल हालातों का कैसे सामना करना है यह सब सिखाता है।
एक अच्छा शिक्षक अपने छात्रों का मित्र बनकर व कुशल मार्गदर्शक बनकर उन्हें अच्छे और बुरे का फर्क सिखाता है। वो छात्रों का सच्चा मार्गदर्शक बनकर जीवन को सही रास्ते पर ले जाने में सहायता करता है। बचपन में बच्चे अपना समय माता-पिता के अलावा सबसे अधिक किसी के साथ व्यतीत करते है तो वो उसका शिक्षक ही होता है और यह उम्र ही बच्चों के जीवन में महत्वपूर्ण होती है। जिस तरह से गीली मिट्टी को किसी भी तरह का आकार दिया जा सकता है। उसी तरह माता-पिता के साथ मिलकर एक शिक्षक ही बच्चों को अच्छे संस्कार दे सकता है क्योंकि बचपन की यह उम्र ऐसी उम्र होती है कि जब बच्चें को हम कुछ भी सिखा सकते है। इसीलिए किसी भी शिक्षक के लिए यह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है की उसे बच्चे के वर्तमान व उज्जवल भविष्य दोनों का सही ढंग से निर्माण करना है। हर बच्चे के उज्जवल भविष्य के पीछे एक अच्छे शिक्षक का अनमोल योगदान होता है। शिक्षक एकमात्र ऐसा व्यक्ति है जो हमेशा अपने सभी छात्रों का भला ही चाहता है। उनके जीवन का एक मात्र लक्ष्य रहता है की वो अपने सभी छात्रों को अच्छा इंसान, एक आदर्श कामयाब नागरिक बना सके।

आज के परिदृश्य में गुरु-शिष्य परम्परा

देश के मौजूदा परिदृश्य में देखें तो जिस तरह से आज के व्यवसायिक दौर में शिक्षक अपने ज्ञान की बोली लगाने के बाद भी अपने छात्रों के साथ पूर्ण रूप से ईमानदारी नहीं बरतते है वो स्थिति सोचनीय है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो जिस तरह से आयेदिन गुरु-शिष्य की परंपरा कहीं न कहीं कलंकित हो रही है। आए दिन शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों एवं विद्यार्थियों द्वारा शिक्षकों के साथ दुर्व्यवहार की खबरें सुनने को मिलती रहती हैं। जो सभ्य समाज व देशहित में ठीक नहीं है। आज के हालात को देखकर हमारी प्राचीन संस्कृति की इस अमूल्य गुरु-शिष्य परंपरा पर अब प्रश्नचिह्न लगते नजर आते है। शिक्षक दिवस पर विद्यार्थियों और शिक्षकों दोनों का ही दायित्व है कि वे इस महान भारतीय परंपरा को बेहतर ढंग से समझते हुए इसका पूर्ण ईमानदारी से निर्वाह करने का संकल्प ले और एक अच्छे समाज का निर्माण करके भारत को विश्व गुरु बनाने में अपना सहयोग प्रदान करें।

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