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स्वतंत्रता दिवस विशेष : अमर शहीदों के बलिदान से गौरवान्वित हुआ मधेपुरा, आंदोलित हो उठी थी मधेपुरा की गौरवमयी धरती

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संजय कुमार सुमन समाचार संपादक

देश को आजाद हुए 70 साल बीत गए लेकिन आज आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले तथा अपनी जान की बाजी लगाकर देश को आजाद कराने वाले जवान की सुधि लेने वाला कोई नहीं है। सन 1942 की अगस्त क्रांति और करो या मरो के नारे से उन दिनों मधेपुरा जिले की गौरवशाली धरती भी आंदोलित हो उठा था। यहां के वीर सपूतों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिगुल फूंक कर स्वतंत्रता आंदोलन की गति को तेज करने का काम किया था। आज सत्ता सुख की भूख मिटाने में लगे नेता और अधिकारी उसकी बलिदानी को भूल चुके हैं।

मधेपुरा जिला में 6 अप्रैल 1930 को नमक सत्याग्रह चलाया गया। मधेपुरा शुरू से ही दो मोर्चे पर आंदोलित रहा। एक मोर्चा मधेपुरा था तो दूसरा मोर्चा बिहपुर था। किशुनगंज,आलमनगर और चौसा के सत्याग्राहियों का मोर्चा बिहपुर भागलपुर था। बिहपुर के निकट गौरीपुर में नमक सत्याग्रह का आयोजन 20 अप्रैल 1930 को किया गया। किशुनगंज क्षेत्र के सत्याग्रह को लेकर कुरसंडी के रेबत सिंह बिहपुर की ओर प्रस्थान कर गए। सत्याग्रह में अदम्य साहस और उत्साह था। गौरीपुर में पुलिस की जबरदस्त चौकसी थी किंतु पुलिस का घेरा तोड़कर इन लोगों ने सत्याग्रह स्थल पर पहुंचकर नमक कानून को भंग किया।

मिट्टी से नमक तैयार होते ही पुलिस ने सत्याग्राहियों को लाठी और बंदूक के कुंदे उसे पीटना शुरू किया।  किशुनगंज क्षेत्र के जुझारू सत्याग्रह भागवत ठाकुर, नीरो ठाकुर, मुशहरुराम,सत्यदेव मिश्रा और भूपाल ठाकुर को गिरफ्तार कर इंडियन आर्डिनेंस एक्ट के अंतर्गत उन पर मुकदमा चलाया गया।  भागलपुर के तत्कालीन दंडाधिकारी बीएन प्रसाद ने इन सबों पर छह-छह माह की सश्रम कारावास की सजा सुनाई।

खिलाफत आन्दोलन के दौरान 1919 में राजेन्द्र प्रसाद तथा शौकत अली बंधुओं ने आमजन को कांग्रेस से जूड़ कर अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद करने का आह्वान किया। 13 फरवरी 1919 में रौलेट एक्ट के खिलाफ कोसी के गांधी रामबहादुर सिंह, पंचग‍छिया ने गिरफ्तारी देकर कारा वरण किया। इसके बाद गिरफ्तारी का तांता लग गया।

कलकत्ता अधिवेशन के बाद इसी वर्ष 1920 में बाबू श्याम सुन्दर प्रसाद की प्रेरणा से ही शिवनंदन प्रसाद मण्डल (बाद में विधि मंत्री) ने कांग्रेस में योगदान कर कोसी क्षेत्र में स्वतंत्रता संग्राम को गति प्रदान किया। इन्हीं दिनों सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ कांग्रेस ने धारदार आन्दोलन किया था।1921 में भागलपुर के प्रेमशंकर बोस ने छात्रों के साथ उत्तर बिहार के बिभिन्न स्थानों का दौरा किया और डा. राजेन्द्र प्रसाद, डा. श्रीकृष्ण सिंह, दीपनारायण सिंह आदि नेताओं का बिहार दौरा स्वतंत्रता की भावना को तेज किया।

असहयोग आन्दोलन मे प्रताप झा और भूपेन्द्र नारायण मण्डल के नेतृत्व में छात्रों ने विद्यालयों का बहिष्कार कर धरना दिया। विदेशी वस्त्र बहिष्कार आन्दोलन में मधेपुरा के रजनी बभनगामा का महत्वपूर्ण योगदान है। यहां महिलाओं की भागीदारी में चरखा केन्द्र खोले गये थे। मधेपुरा के चरखा केंद्र में अधिवक्ता चंचल प्रसाद सिंह, सुरेन्द्र नाथ मुखर्जी, राज किशोर चैधरी, जाफर हुसैन, चूनी लाल मुखर्जी और बिजय कृष्ण बोस अदि की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

10 जुलाई 1930 को लालगंज चौसा के शीतल गोढ़ी समेत दर्जनों सत्याग्राहियों को 17 जुलाई 1930 को इसी गांव के रामकरण जोल्हा अपने दर्जनों साथियों के साथ मधेपुरा पीकेटिंग का नेतृत्व करते गिरफ्तार कर लिया गया।  23 अगस्त 1930 को शीतल गोढ़ी, घोषई के लच्छो जोलाहा,कुंजो नागर समेत दर्जनों कार्यकर्ताओं ने इंडियन आर्डिनेंस एक्ट के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। 13 अगस्त 1942 को भूपेंद्र नारायण मंडल, बिरेन्द्र प्रसाद सिंह और देवता प्रसाद सिंह के नेतृत्व में एक बड़ा जुलूस मधेपुरा कचहरी पहुंचा। वीरेंद्र प्रसाद सिंह ने कचहरी भवन पर राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया। इस घटना से प्रोत्साहित होकर एक 14 वर्षीय हरे कृष्ण चौधरी ने कचहरी के कोषागार भवन पर राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया।

13 अगस्त को ही किशुनगंज थाने पर भी राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। 14 अगस्त को पुलिस ने मधेपुरा के कांग्रेस ऑफिस को जप्त कर उस पर पहरा बैठा दिया लेकिन 15 अगस्त 1942 को महताब लाल यादव, कमलेश्वरी प्रसाद मंडल, देवदत्त महतो, प्रेम नारायण मिश्र और उच्च विद्यालयों के छात्रों की सहायता से जब्त कांग्रेस ऑफिस पर सीधा हमला कर दिया गया। पहरेदार जुलूस देख कर भाग निकले। इसी दिन एक बड़ी आम सभा हुई जिसमें ब्रिटिश सरकार कार्यालय पर ताले लगाकर काम बंद करने का ऐलान किया और राष्ट्रीय सरकार की स्थापना का संकल्प लिया। 16 अगस्त को भटगामा चौसा के तनुक लाल यादव ने लगभग 10,000 की भीड़ के साथ किशुनगंज थाने पर धावा बोल दिया और थाने को अपने कब्जे में कर लिया।

आंदोलनकारियों ने धर्मनाथ साह दारोगा तथा अन्य पुलिसकर्मियों के सामने थाना के कागजात का होलिका दहन कर दिया। इसके बाद आंदोलनकारियों ने बिहारीगंज रेलवे स्टेशन में भी भारी तोड़फोड़ की। रेलवे लाइन एवं संचार साधनों को ध्वस्त कर दिया और कागजातों को जला दिया। दूसरे दिन किशुनगंज थाने के सारे पुलिसकर्मी थाना छोड़कर भागलपुर पलायन कर गये किंतु 4 दिनों बाद ही इन लोगों को पुनः किशुनगंज भेज दिया गया।

देश में बढ़ते भ्रष्टाचार,अत्याचार,जातिवाद को देख कर बहुत दु:ख-स्वतंत्रता सेनानी रघुनंदन झा

स्वतंत्रता संग्राम में मधेपुरा का आंदोलनात्मक सफर गौरवमय रहा किंतु वतन की बलिवेदी पर उत्सगररित उत्सर्जित होने वाले वीर सपूतों की अनकही कहानी अभी भी दबी पड़ी है। यह बड़ी विडंबना रही कि गुलामी की जंजीरों से देश को मुक्त कराने के लिए जिन लोगों ने तन मन धन न्योछावर किया,जेल की यातनाएं सही, सीने पर अंग्रेजों की गोलियां झेली और हंसते-हंसते फांसी के फंदे में झूल गए।वे और उनकी यादें गुमनामी के अंधेरों में भटकने को विवश है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अतीत की कई घटनाएं सुनने वालों के रोंगटे आज भी खड़ा कर देती है।

देश को आजाद कराने में यह क्षेत्र अग्रणी रहा।स्वतंत्रता आंदोलन में तिल तिल कर जलने वाले बहुत सारे सपूत तो अब नहीं रहे परंतु जब स्वतंत्रता आंदोलन की चर्चा होती है तो वीर सपूत बाजा साह, भोला ठाकुर, केदारनाथ तिवारी, कालेश्वर मंडल, पुलकित कामत, श्रीकांत झा के नाम स्वत: लोगों की जुबान पर आ जाते हैं और स्वतंत्रता सेनानी होंगे जिन्हें गुलाम भारत में सब लोग जानते थे परंतु आजाद भारत में वे गुमनाम हो गए हैं।

मधेपुरा जिले के चौसा प्रखंड अंतर्गत रसलपुर धुरिया में 104 वर्षीय ताम्रपत्र धारी स्वतंत्रता सेनानी रघुनंदन झा एक सशक्त स्वतंत्रता सेनानी के रूप में आज भी हैं। जो गुलाम भारत एवं आजाद भारत दोनों के चश्मदीद गवाह है।

श्री झा बताते हैं कि हमें आज गुलाम भारत को ही याद करना पसंद आता है। उस वक्त लोगों में चरित्र था। लोक सिद्धांत के लिए जीते और मरते थे लेकिन आज के लोगों के पास कुछ नहीं है। उस समय भारत अंग्रेजों का ही गुलाम था परंतु आज भारत सबों का गुलाम बन गया है। सिर्फ कहने के लिए हम आजाद हैं।

वे कहते हैं कि देश आजादी के बाद कांग्रेस की तुष्टि नीति ने देश को बर्बाद कर दिया। आज के समय में देश में बढ़ते भ्रष्टाचार,अत्याचार,जातिवाद को देख कर बहुत दु:ख होता है कि आजादी की लड़ाई के बाद जो खुशहाल भारत का सपना देखा था वह फलीभूत होता नहीं दिखता। देश के युवा पीढ़ी से आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि काफी संघर्ष के बाद देश आजाद हुआ है। आजादी में जिन लोगों ने कुर्बानी दी उनकी कुर्बानी को याद कर देश को सही रास्ते पर लेने को आगे बढ़े।

श्री झा के चेहरे पर एक सशक्त क्रांतिकारी का भाव देखने को मिलता है परंतु आज देश की हालात से उनका दिल टूट चुका है। गुलाम भारत को आजाद कराने की सपना में सिर्फ बड़े-बड़े क्रांतिकारी एवं आंदोलनकारी ही सक्रिय नहीं थे बल्कि उस समय अबोध बालकों में भी देश को आजाद कराने का जोश पैदा हो गया था। यही कारण है कि मैं तीसरी कक्षा में पढ़ता था उसी समय स्वतंत्रता के आंधी में कूद पड़ा और तरह-तरह की यातनाएं अंग्रेजों के शासनकाल में झेलने के लिए विवश हो गया।

19 सितम्बर 1916 ई को जन्मे स्वतंत्रता सेनानी श्री झा कहते हैं कि 26 जनवरी 1944 को उदाकिशुनगंज थाना में झंडा फहराने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर मधेपुरा जेल भेजा गया था । एक महीना जेल में रहने के बाद भागलपुर कारागार में शिफ्ट कर दिया गया था। उनके साथ मंगल मंडल दुर्गापुर निवासी भी थे।मधेपुरा जज के सामने पेशी होने पर मुझे जुर्म कबूल करने की नसीहत दी लेकिन मैंने जुर्म कबूल नहीं कबूल। जिससे मुझे एक साल का कारावास का सजा सुना दिया गया और मधेपुरा जेल से सश्रम कारावास के लिए भागलपुर भेज दिया गया।

जेल कमिश्नर की बात नही सुनने के कारण मुझे कई माह तक  सेल में भी रखा गया।स्वतंत्रा सेनानी श्री झा बताते हैं कि 15 अगस्त 1972 को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ताम्रपत्र पत्र भेंट किया। स्वतंत्रता सेनानी श्री झा ने कहा कि सरकार की वर्तमान व्यवस्था से हम संतुष्ट नहीं हैं। वोट की राजनीतिक सरकार कर रही है।सभी लोगों को जाति में विभाजित कर आपस में लड़ पा रही है। सरकार को जातिवाद से मतलब है और स्वतंत्रता सेनानी के साथ अन्याय कर रही है।

देखें वीडियो,किस बात पर मिली इन्हें जेल से सेल 

https://youtu.be/wjVM9IzmtVI

17 अगस्त को करीब 25 हजार जनता की उपस्थिति में यह निर्णय हुआ कि सरकारी कार्यालयों और खजानों पर कांग्रेस का ताला लगा दिया जाए।इसी दिन विराट जुलूस निकालने तथा कोर्ट कचहरी बंद करने के जुर्म में मधेपुरा के दारोगा अर्जुन प्रसाद सिंह ने महताब लाल यादव, भूपेंद्र नारायण मंडल, सरयुग प्रसाद, कार्तिक प्रसाद सिंह, कुंजबिहारी लाल, देवदत्त मंडल, महावीर सिंह, कमलेश्वरी प्रसाद मंडल,नुनु प्रसाद सिंह, देवता सिंह, कुदरत मियां और 10 हजार अन्य लोगों पर भारतीय दंड विधान की धारा 143, 144,448 और 353 के तहत मामला दर्ज किया।

महताब लाल यादव, भूपेंद्र नारायण मंडल, कुंजबिहारी लाल, देवदत्त मंडल,देवता सिंह, कुदरत मियां,अयोध्या को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया जबकि शेष को भगोरा साबित कर दिया गया।मधेपुरा अनुमंडल के सभी सरकारी कार्यालयों पर सत्याग्राहियों का कब्जा हो गया था। मधेपुरा का मुंसिफ 18 अगस्त को कचहरी नहीं करा सका। मुरलीगंज थाना और डाक घर भी बंद कर दिए गए।

सोनबर्षा थाना पूर्ण:जला कर भस्म कर दिया गया। संपूर्ण मधेपुरा सब डिवीजन में जनता राज का केंद्र रहा ।मुरलीगंज,बनगाव ,मधेपुरा में जनता राज के सबसे ज्यादा सक्रिय क्षेत्र रहे।मुरलीगंज में दरोगा रहे लेकिन थाने पर 19 अगस्त से 13 सितंबर तक जनता राज रहा। थाना कार्यालय में ताला लगा रहा और थाना परिसर में कांग्रेस का अड्डा बना रहा। किशुनगंज में भी 19 अगस्त थाने का प्रबंध कांग्रेस हाथों में आ गया था। हाई स्कूल के हेडमास्टर ने अपने छात्रों के सहयोग से घूम-घूम कर पंचायत रक्षा दल संगठित कर रहे थे।

19 अगस्त को मधेपुरा में कार्यकर्ताओं ने देखा मधेपुरा की सभी सरकारी संस्थाएं कांग्रेस हुकूमत मातहित कबूल कर रही थी और हुकूमत को मजबूर करने का तौर तरीके अख्तियार करने लगे। मधेपुरा दफ्तर को संभालने के लिए कार्तिक प्रसाद सिंह, कुदर तुल्ला, देवदत्त महतो और उनकी सहायता के लिए 50 स्वयंसेवकों और स्कूल छात्रों को रखकर सब के सब देहात को चल पड़े। उसने सब जगह जाकर ग्राम रक्षा दल और ग्राम पंचायत को कायम किया।

20 अगस्त को एक बैठक ने निश्चय हुआ कि उदकिशुनगंज थाना के सभी सरकारी कर्मचारियों को बाहर कर दिया जाए। 24 अगस्त की सुबह में थाना के कर्मचारियों ने अपने-अपने सजो सामान के साथ 30 बैल गाड़ियों पर लादकर चल दिए।कुलानंद सिंह उनके रक्षार्थ अरार घाट तक गये और उन सबको नाव पर चढ़ा कर लौट आये। किशुनगंज थाना भी जनता के अधिकार में था।उस पर फिर से नियंत्रण करने के लिए सशस्त्र पुलिस का दल भेजा गया। किशुनगंज पहुंचते ही पुलिस ने क्रांतिकारियों के नेता वैद्यनाथ को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए तत्काल एक सैनिक टुकड़ी को बहाल की गई।25 अगस्त 1942 की रात्रि में सैनिक टुकड़ी ने बाजा साह को वैद्यनाथ समझ कर पुलिस ने बाजा साह को गोली से छलनी कर दिया और वे घटनास्थल पर ही मर गये। इस घटना की जानकारी मिलने पर जनसभा में भारी उत्तेजना फैली और बिहारीगंज में भीड़ बेकाबू हो गई। भीड़ ने रेलवे स्टेशन एवं रेलवे लाइन को तोड़फोड़ की। 29 अगस्त को चैनपुर गांव के भोला ठाकुर, नरियार गांव के केदार नाथ तिवारी,बलहा गांव के कालेश्वर मंडल, बनगांव के पुलकित कांत,हरिकांत झा अंग्रेजों की गोली से शहीद हो गए।

मधेपुरा अनुमंडल पर पुलिस प्रशासन का नियंत्रण नहीं रहा। अगस्त 1942 की रिपोर्ट में आरक्षी अधीक्षक ने भी स्वीकार किया कि मधेपुरा अनुमंडल की स्थिति पूर्णत: काबू के बाहर है। प्रत्येक दिन शाम सवेरे सत्याग्रहियों के जुलूस अनवरत निकलते रहे। संपूर्ण इलाके में जनता की सरकार की स्थापना हो गई थी।

शिवनंदन प्रसाद मंडल मधेपुरा अनुमंडल के कांग्रेस प्रभारी पदाधिकारी थे। इनका कार्य मधेपुरा इलाके में केंद्रित था। मधेपुरा के पश्चिम अन्य चार शिविर कार्यरत थे। सैफाबाद कचहरी में केंद्रीय शिविर स्थापित था। इसके प्रभारी पंडित छेदीलाल झा द्विजवंर थे तथा सहरसा शिविर के प्रभारी चित्र नारायण शर्मा,पचगछिया शिविर के बाबू राम बहादुर सिंह और चंद्रायन के प्रभारी गुणानंद झा थे। आदेश सैफाबाद में रेडियो सेट भी लगा था। जिसके माध्यम से अन्य शिविरों में खबर भेजी जाती थी। रेडियो में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समाचार मधेपुरा वासियों को मिलता रहता था। समाचार में आजाद आजाद हिंद रेडियो द्वारा प्रसारित खबरों को प्रमुखता दी जाती थी।

24 अगस्त को मधेपुरा में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की सभा हुई। इसमें उपस्थित जनसमूह से किसी तरह की हिंसा नहीं करने को कहा गया। साथ ही सरकारी पदाधिकारियों को अपने अपने पद से इस्तीफा देने को कहा गया। किशुनगंज थाना जनता के अधिकार में था उसके अधिकारी और कर्मचारी दूसरे दिन भागलपुर चले गए। 31 अगस्त को 2:00 बजे ब्रिटिश सैनिक मधेपुरा पहुंचा। सैनिकों ने खादी भंडार पर से राष्ट्रीय ध्वज उतार लिया। सैनिकों ने थाना में अपना शिविर रखा फिर यह दास्ता 1 सितंबर को सहरसा लौट गया।

पुलिस दमन गिरफ्तारी और आतंक का सिलसिला जारी था। जहां भी कांग्रेसी कार्यकर्ता पकड़ लिया जाता उसे बुरी तरह घायल कर दिया जाता। कुछ कांग्रेसी नेता और कार्यकर्ता फरार हो गए। स्थानीय देशद्रोहियों की सहायता से कुछ नेताओं का सुराग पुलिस को मिला और पुलिस ने सिंहेश्वर क्षेत्र के सरोपट्टी ग्राम में अंबिका सिंह एवं तीन अन्य सत्याग्रह गिरफ्तार कर मधेपुरा लाए गए।

मुरलीगंज क्रांतिकारियों का एक घर था। अतः उन पर अंकुश लगाने हेतु एक सैनिक दल को मुरलीगंज में पदस्थापित कर दिया गया था। यह दल पड़ोस के गांव में लोगों को सताया करता था। इस सशस्त्र दल में युगल किशोर प्रसाद के घर तलाशी ली। सैनिकों को विश्वास था कि क्रांतिकारी यदु झा यहीं पर छिपे हैं किंतु इस तलाशी में उनका पता नहीं चला। किशुनगंज में अभी भी स्थिति काबू से बाहर थी।अत: आंदोलन को कुचलने के लिए सैनिक दल किशुनगंज आया।

सैनिकों को देखते ही जनसमूह भड़क उठा। सेना ने भीड़ पर गोलियां चला दी जिससे 4 व्यक्तियों की मृत्यु हो गई और अनेक लोग घायल हो गए।

अगस्त क्रांति की तेजप्रताप अग्नि से संपूर्ण कोसी अंचल धधकती रही। जिसमें ब्रिटिश सैनिकों के नींद हराम होने लगी। पुलिस कार्यवाही और आंदोलनकारियों पर कार्रवाई से आंदोलनकारियों पर कोई खास असर नहीं पड़ा और आंदोलनकारियों ने उसकी अपार अचल संपत्ति को नष्ट कर दिया। 11 सितंबर को वीर क्रांतिकारी मनहरा गांव के चुल्हाय यादव को पुलिस ने गिरफ्तार कर पीट पीट कर मार डाला।20 अक्टूवर 1942 को चौसा के विपत हलवाई, भटगामा के तनुकलाल यादव को भारतीय सुरक्षा अधिनियम 38(5) तथा भादवि की धारा 143, 448 तथा 435 के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया गया।

बहरहाल इन शहीदों के बलिदान की बदौलत भारत स्वतंत्र हुआ और मधेपुरा जिला भी गौरवान्वित हुआ किन्तु स्वतंत्रता के करीब सात दशक गुजर जाने के बावजूद आज सम्पूर्ण जिला भय,भूख एवं भ्रष्टाचार की बेड़ी में छटपटा रहा है।बावजूद इसके तथाकथित रहनुमाओं मौन हैं।

कोशी क्षेत्र के मधेपुरा जिला के ग्राम तरुणेश्वरपुर झिटकिया के रहने वाले अग्रगण्य स्वतंत्रता सेनानी शिक्षाविद राजेश्वर प्रसाद सिंह शुरू से है बहुमुखी विलक्षण प्रतिभा के धनी थे । पिता हिर्दय नारायण सिंह जो की उस क्षेत्र के वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी थे उन्हीं के छत्रछाया में पुत्र राजेश्वर प्रसाद सिंह भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आज़ादी के जंग में कूद पड़े । पिता पुत्र दोनों ही मिलकर देश की आज़ादी के लिए अपने आप को समर्पित कर दिया ।

वैसे तो इनका जन्म सुपौल जिले के ग्राम बरुवारी में हुआ मगर स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सन 1937 में छात्रों के दल का नेतृत्व करते हुए महिषी, सोनबर्षा, मधेपुरा, धमदाहा पूर्णिया व कई अन्य जिलों में क्रन्तिकारी कार्य करते रहे । स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गाँधी महात्मा अरविंद तथा डॉ राजेंद्र प्रसाद के विचारों से प्रभावित रहे l राजनितिक जीवन के प्रारम्भ से ही वे अहिंसक समाजवादी एवं धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के पोषक रहे ।

क्रूर ब्रिटिश शासन द्वारा शोषण उत्पीड़न मानसिक दबाव डालने के कारण उनके मन में क्रांति पैदा हुई साथ ही रंगभेद की नीति के कारण परतंत्रा के प्रति नफरत पैदा हुई ब्रिटिश शासन के जुल्मो शितम के खिलाफ उन्होंने अपने आवाज़ बुलंद करने की ठान ली एवं भारत छोड़ो आंदोलन में करो या मरो के संकल्प के साथ कूद पड़े । इसके बाद जनांदोलन और ही बड़ा रूप लेने लगा ।

जगह जगह सामूहिक जुलुस इनके नेतृत्व में निकाला गया । अपने क्रन्तिकारी साथिओं के सहयोग से कलाली बंद करवाया डाकघर बंद करवाया, रेल लाइन की पटरिओं को हटवाया एवं धमदाहा थाना के अतंर्गत सभी जनता को 24 अगस्त 1942 आने हेतु आग्रह किया एवं धमदाहा थाना रेड उनका सफल रहा मगर 25 अगस्त को 1942 को अंग्रेजी पुलिस ने धमदाहा थाना के आहाते से इनके पांच क्रन्तिकारी साथिओं को गोली मारकर शहीद कर दिया । इस दौरान उन्हें 2 बार जेल भी जाना पड़ा ।धमदाहा थाना रेड केस में गिरफ्तार कर इन्हे पूर्णिया और फिर भागलपुर कैम्प जेल भेज दिया गया ।इनके ऊपर कानून की धारा 144, धारा 302 आदि विभिन्न धाराएं लगाकर बेड़िओ में जकड़ कर कैद कर दिया गया l इसके बावजूद भी जेल में इन्होने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ नारेबाजी व आमरण अनसन करते रहे l आंदोलन में इनकी सक्रियता को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने इन्हे करीब पांच वर्षों तक जेल में रख कई तरह की यातनायें दी फिर भी राजेश्वर बाबू ने इंकलाब जिंदाबाद और वंदे मातरम का नारा बोलते रहे ।

राजेश्वर बाबू सामाजिक सरोकार से जुड़े हुए व्यक्तित्व थे l एक शिक्षाविद के रूप में समाज के हर तबके को शिक्षित करने के लिए सदैव तत्पर रहे l हिंदी से बैचलर डिग्री व साहित्यरत्न, सी. टी प्राप्त कर कई विद्यालयों और विश्विद्यालय में सम्बंधित व कार्यरत रहे एवं शुरुवाती दिनों से ही समाज में शिक्षा का अलख जगाने के लिए समर्पित रहे ।

मधेपुरा उच्च विद्यालय, शिक्षण प्रशिक्षण विद्यालय मधेपुरा के प्राचार्य के रूप में कार्यरत होकर हज़ारो शिक्षकों को प्रशिक्षण देकर राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित किए । स्वतंत्रता संग्राम में उल्लेखनीय भूमिका निभाने हेतु आज़ादी के पच्चीसवें वर्ष राष्ट्र की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी द्वारा ताम्र पत्र से सम्मानित किए गए एवं भारत सरकार द्वारा इनके नामों को शिलालेख पे अंकित किया गया जो वर्तमान में मुरलीगंज ब्लॉक में स्थापित है । यह इस क्षेत्र के लिए गौरव का विषय है  उनकी व्यक्तित्व व कृतित्व के कारण उन्हें युगों युगों तक उन्हें नमन व स्मरण किया जायेगा ।उनकी 30 वीं पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि कोटि नमन ।

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