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पूर्णिया:भुला दिया गया रूपौली के स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाने वाले शहीदों को

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**आजतक किसी ने भी इन परिवार के सदस्यों के परिजनों को राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस पर शहीद स्थल पर आने का निमंत्रण तक नहीं दिया
**दलितों, अतिपिछडों, पिछडों के उत्थान, कल्याण के लिए आजादी के समय से ही आवाजें उठती आईं, परंतु सभी आवाजें व्यक्तिगत स्वार्थ में लिपटी रहीं, वोट लिया, फिर भूल गए
**कांग्रेस शासन से लेकर, भाजपा शासन तक हर किसी ने इन शहीदों के परिजनों के साथ मजाक ही किया

मंजुला देवी कोसी टाइम्स रूपौली,पूर्णिया

लता मंगेशकर  के गाए गीत ऐ मेरे वतन के लोगो जरा आंख में भर लो पानी, जरा याद करो कुर्बानी जितना सुनने में मार्मिक है, उतना ही इस देश के उन शहीदों के लिए श्रद्धांजलि भी है । परंतु उन शहीदों की कुर्बानी तथा उनके परिजनों की बेबसी के साथ मजाक ही किया गया लगता है। एक छोटा-सा उदाहरण रूपौली को ले लें तो, लगेगा कि उन शहीदों के साथ समाज के अगले पायदान पर खडे लोगों ने इन शहीदों का मजाक ही बनाया । 25 अगस्त 1942 जब बापू के आंदोलन करो या मरो से लवरेज यहां का हर व्यक्ति अपनी कुर्बानी देने के लिए सिर पर कफन बांधे था । इस दिन यहां थाना पर तिरंगा फहराने को लेकर हुए अंगे्रजी पुलिस के साथ हुए संघर्ष में दारोगा को तो जिंदा जलाया ही गया, परंतु इस दौरान यहां के चार जांबाज युवक बंगाली सहनी, पांचू बैठा, सुखदेव भगत एवं जागेश्वरसहनी अंग्रेजों की छाती पर गोलियां खाकर शहीद हो गए थे ।

जरा याद करो कुर्बानी, जरा आंख में भरलो पानी

सन 1942 की का्रंति के 77 साल बीत गए, परंतु किसी ने भी 25 अगस्त 1942 की क्रांति करो या मरो के आंदोलन के दौरान रूपौली में चारो शहीद के परिजनों की सुधि नहीं ली

इनकी कुर्बानी रंग लाई तथा 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ, सभी में काफी खुशियां थीं । जबतक देश आजाद नहीं हुआ था, तब तक इन शहीदों के परिजनों को लगा था कि देश आजाद होने पर इन्हें सम्मान की नजरों से देखा जाएगा । शहीद स्थल पर जब भी तिरंगा फहराया जाएगा, उन्हें आमंत्रित किया जाएगा, तब गर्व से सीना उंचा हो जाएगा कि उनके पूर्वजों ने अपनी छाती पर गोलियां खाकर इस देश को आजाद करवाया था । परंतु धीरे-धीरे 77 साल गुजर गए, एक-से-एक गरीबों के मसीहा कहनेवाली पार्टियों की सरकारें बनीं, परं किसी ने भी इन्हें पूछा तक नहीं । आज इन षहीदों के परिजनों की दुर्दशा देखें तो रोना आता है तथा इतना तो अवश्य कहता है कि यह आजादी उन शहीदों के परिजनों के लिए बेमानी है, गरीबों के लिए बेमानी है । आजादी तो यहां के अमीरों को ही मिली है ।

शहीद बंगाली सहनी
रूपौली मुख्यालय स्थित सहनी टोला में बंगाली सहनी के वंशज रहते हैं । यहां चलित्तर सहनी, रामरूप सहनी, बालगोविंद सहनी, राम प्रसाद सहनी आदि परिवार के सदस्य हैं । इनकी माली हालत को देखें तो आज भी ये मजदूर हैं । इन्हें बमुष्किल भरपेट अनाज मिल पाता है, ये आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं । फूस के घर में इनकी जिंदगी किसी प्रकार चल रही है। बावजूद चलित्तर सहनी बडे फक्र से कहते हैं कि उनके दादाजी ने इस देश को अपनी कुर्बानी देकर आजाद करवाया, परंतु फिर वे बडे ही दुख के साथ कहते हैं कि आजतक उनके किसी भी परिवार को हर साल शहीद स्थल पर फहरनेवाले राष्ट्रीय पर्व पर फहरनेवाले तिरंगा समारोह में आमंत्रण तक नहीं दिया गया ।

उपेक्षित सहनी टोला के युवकों ने अपना निर्माण करा रहे हैं शहीद बंगाली सहनी स्मारक

समाज एवं सरकार से जब सहनीटोला के लोग उपेक्षित हुए तथा इस वर्ग के लोगों के साथ भेदभाव किया जाने लगा, तब ये अपने अपने पूर्वजों का शहीद स्थल स्वयं निर्माण करने का निर्णय लिया तथा सहनी टोला के सामने ही शहीद बंगाली सहनी स्मारक का निर्माण करा रहे हैं । चूंकि ये गरीब तबका के लोग हैं, इसलिए इसका निर्माण अधूरा है, परंतु इनके हौसले बुलंद हैं । युवा संघ के कार्यकर्ता सुबोध सहनी, श्यामलाल सहनी, मुकेश सहनी आदि कहते हैं कि वे कबतक उपेक्षा बर्दास्त करते, उन्होंने अपना भाग्य स्वयं लिखने का निर्णय ले लिया ।

शहीद सुखदेव भगत
बिरौली आझोकोपा गांव में रहनेवाले शहीद सुखदेव भगत का परिवार भी आज ठीक बंगाली सहनी के परिजनों की तरह उपेक्षित है । इनके परिवार के लोगों को भी किसी ने तरहजीह नहीं दी और ना ही कभी शहीद स्थल पर सरकारी कर्मी या समाज के अगुआ ने बुलाया ही । शहीद रामेश्वर भगत के बेटे रामेश्वर भगत की मौत इलाज के अभाव में हो गई । उनके दो पुत्र जयप्रकाश जायसवाल एवं रामप्रकाश जायसवाल का कहना है कि कभी भी सरकार या समाज के लोग उन्हें तरजीह नहीं दी । और-तो-और उनका इलाज पूर्णिया सदर अस्पताल में हो रहा था, वहीं उनकी मौत पिछले साल जुलाई माह में हो गई, उनके मृत्यु प्रमाण-पत्र के लिए दो माह तक दौडना पडा, तब मिला । उनके पिता या किसी भी व्यक्ति को कोई सरकारी लाभ या कोई तरह की सहायता नहीं मिली ।

शहीद पांचू बैठा
शहीद पांचू बैठा के वंषज आझोकोपा दुर्गा मंदिर के बगल में रहते हैं, जो निहायत ही गरीबी की जिंदगी गुजार रहे हैं । इस परिवार को भी अन्य शहीदों के परिवारों की तरह उपेक्षित रखा गया है । कभी भी किसी ने इन्हें भी तरजीह नहीं दी । संयोग कहा जाए कि इस परिवार के दो सदस्यों की नौकरी शक्षक पद पर हो गई, अन्यथा ये भी भूख गरीबी- से जूझते रहते । इस सबंध में शहीद पांचू बैठा के पौत्र सह अवकाशप्राप्त शिक्षक विंदेष्वरी रजक कहते हैं कि आजतक किसी भी ने उनके किसी भी परिजन को नहीं पूछा । उनकी दादी श्रीमती बुद्धि देवी को 5 अगस्त 1972 में ताम्रपत्र दिया गया था तथा उनके देहांत तक मात्र 100 रूपए मिलते रहे। उसके बाद खबर यह फैली थी कि शहीदों के आश्रितों को सरकार पेंशन देगी, वे लोग इसके लिए हजारो रूपए कागज बनवाने में खर्च कर दिए, परंतु कुछ नहीं मिला । आज उनकी तथा उनके छोटे भाई को तो नौकरी लग जाने से थोडी माली हालत सुधरी, अनयथा उनके अन्य भाई वकील रजक, कृष्णमोहन रजक, मनोज रजक, षैलेंद्र रजक की हालत आज भी मजदूरों जैसी है ।

शहीद जागेश्वर सहनी
शहीद जागेश्वर सहनी का घर रूपौली के बगल गिद्धा गांव में बताया जाता है, परंतु आजतक किसी ने उनकी सुधि नहीं ली । गिद्धा गांव में बडे-बुजूर्ग से पूछने पर वे जागेश्वर सहनी के बारे में तो बताते हैं, परंतु कहते हैं कि उनका परिवार उनके शहीद होने के साथ ही उपेक्षित होने के कारण यहां से पलायन कहां कर गए, कोई नहीं जानता है ।

कुल मिलाकर रूपौली में शहीदों की उपेक्षा जग-जाहिर है, आजतक किसी भी समाजसेवी या किसी सरकारी व्यक्ति ने इनकी सुधि नहीं ली, सबने इन्हें उपेक्षित ही किया । दूर्भाग्य से किसी भी नेताया अधिकारी ने आजादी के जश्न में उन्हें शामिल करना उचित नहीं समझा । देखें इनकी आज भी कोई सुधि लेता है या नहीं, या फिर इन्हें इनके ही हाल पर छोड देता है ।

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