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ना जाने मेरा दिल

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ना जाने मेरा दिल

ना जाने मेरा दिल
तेरी गलियों में आने को
क्यों बेताब रहता है
राहों से गुजरते वक्त
क़दमें थम सी जाती है
और चेहरे पर


उदासी के भाव छा जाते हैं
तेरी पायल की रुन झून से
धड़कनो की रफ़्तार
तेज होने लगती है
मानो कोई मुसीबत आने वाली है
ठीक उसी तरह
जिस तरह कुसहा का तटबँध
टूटने के बाद
पानी का सैलाब
आया था


लोगों का सब कुछ बर्बाद हो गया था
लोगों का घर उजाड़ते
और लोगों को
जिंदा दफनाते
आई थी
लोगों को मिला था
केवल उजड़ता घर
और अश्रुधार
शायद वही अहसास
मुझे मिला
तुझ से नाता जोड़ कर

संजय कुमार सुमन

स्वतंत्र पत्रकार सह साहित्यकार 

मंजू सदन,चौसा{मधेपुरा}

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