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सोनभद्र हत्याकांड “प्रिंयका नहीं ये आंधी है दूसरी इंदिरा गांधी है

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दीपक कुमार त्यागी स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में हुए दस लोगों के जघन्य हत्याकांड के बाद प्रियंका गांधी की संघर्षशील कार्यशैली के चलते देश में अपनी राजनीतिक जमीन को खो चुकी कांग्रेस पार्टी को खोई हुई जमीन हासिल करने के लिए एक बहुत बड़ा मुद्दा हाथ लग गया है। जिस तरह से कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी 19 जुलाई को सोनभद्र गोलीकांड में घायल हुए लोगों से मिलने अचानक वाराणसी पहुंची थी। इसके बाद वो पीड़ित परिवारों से मिलने के लिए सोनभद्र जाने के लिए निकली थी। लेकिन उत्तर प्रदेश के शासन-प्रशासन के दिशानिर्देश पर उन्हें रास्ते में ही रोक लिया गया था। जिसके बाद प्रियंका गांधी नारायणपुर में सड़क पर ही कांग्रेसी नेताओं के साथ धरने पर बैठ गई थी। उत्तर प्रदेश पुलिस ने मामले को बिगड़ता देख तत्काल प्रियंका गांधी को हिरासत में ले लिया था और प्रियंका के साथ कुछ चुनिंदा कांग्रेसी नेताओं को लेकर पुलिस मिर्जापुर के चुनार किले के गेस्ट हाउस पहुंची। जहाँ प्रियंका गांधी कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ फिर धरने पर बैठ गई और प्रियंका ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि वो हर हाल में पीड़ितों से मिले बगैर वापस नहीं लौटेंगी और प्रिंयका गांधी अंत तक अपनी बात पर अड़िग भी रही कि वो इस गोलीकांड में मारे गए दस लोगों के परिवार के सदस्यों से मिले बिना वापस नहीं जायेंगी। जिद पर अड़ीं कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी से पीड़ित परिवार के सदस्यों ने 20 जुलाई को चुनार किला के गेस्ट हाउस में आकर मुलाकात की। चुनार किले के गेस्ट हाउस के बाहर प्रियंका गांधी के साथ कांग्रेस के नेताओं के धरने के बीच में ही गेस्ट हाउस में पीड़ित परिवार को लाया गया। जिसमें चार महिलाओं के साथ एक पुरुष भी था। इन सभी ने प्रियंका गांधी से भेंट की, प्रियंका ने इनसे सोनभद्र कांड के बारे में जानकारी लेकर परिजनों का दुःख की घड़ी में हौसला बंधाया। चुनार गेस्ट हाउस के बगीचे में पीड़ित परिवार की महिलाओं ने प्रियंका गांधी को देखते ही रोना शुरू कर दिया। इस दौरान प्रियंका गांधी भी भावुक हो गईं थी और उन्होंने पीड़ितों के परिजनों के साथ पत्रकारों से बातचीत भी की और परिवारों को पार्टी की तरफ से आर्थिक सहायता के साथ-साथ हर तरह की मदद का आश्वासन दिया।

यहाँ आपको बता दे कि उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद के घोरावल कोतवाली क्षेत्र के ग्राम पंचायत मूर्तिया के उम्भा गांव में बुद्धवार, 17 जुलाई को दो पक्षों में जमकर गोली, लाठी डंडे, कुल्हाड़ी, पत्थर चले थे। जिसमें 10 लोगों की हत्या हो गई जबकि 26 लोग घायल हो गए थे। इस हत्याकांड के बाद शुक्रवार, 19 जुलाई को पीड़ितों से मिलने के लिए दिल्ली से कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी वाराणसी आने वाले इंडिगो एयरलाइंस के विमान से सुबह 9:50 बजे वाराणसी एयरपोर्ट पहुंचीं। प्रियंका गांधी ने बाबतपुर स्थित लाल बहादुर शास्त्री एयरपोर्ट पर पहुंचते ही सर्वप्रथम कांग्रेस कार्यकर्ताओं से मुलाकात की और फिर वह एयरपोर्ट से ही सोनभद्र नरसंहार में गंभीर रुप से घायल लोगों से मिलने सीधे बीएचयू ट्रामा सेंटर रवाना हो गयी। हालांकि प्रशासन ने तत्काल प्रियंका के ट्रामा सेंटर पहुंचने से पहले ही सेंटर की सुरक्षा व्यवस्था को कड़ी करके छावनी में तब्दील कर दिया था। प्रिंयका ने वहां पहुंचकर हादसे में घायल लोगों का हालचाल लिया। उसके बाद प्रियंका गांधी सोनभद्र के लिए रवाना हो गयी थी।

प्रिंयका गांधी के इस काफिले को उत्तर प्रदेश के प्रशासन के आलाधिकारियों के द्वारा मिर्जापुर के नारायणपुर पुलिस चौकी क्षेत्र में जबरन रोक दिया गया। जबकि प्रियंका जमीन विवाद में सोनभद्र में 10 लोगों की हत्या के बाद पीड़ित परिवारों से मिलने के लिए उनके दुःख दर्द साझा करने के लिए पीड़ितों के पास जा रही थीं। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रियंका गांधी को पीड़ित परिवारों से नहीं मिलने दिया बल्कि उनकों गिरफ्तार करके मिर्जापुर में ही रात को चुनार के किले में रोके रखा। जिस पर कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी ने अपनी गिरफ्तारी और सोनभद्र जाने से रोके जाने पर ट्वीट किया, ‘मैंने न कोई कानून तोड़ा है न कोई अपराध किया है। बल्कि सुबह से मैंने स्पष्ट किया था कि प्रशासन चाहे तो मैं अकेली उनके साथ पीड़ित परिवारों से मिलने आदिवासियों के गांव जाने को तैयार हूँ, या प्रशासन जिस तरीके से भी मुझे उनसे मिलाना चाहता है मैं तैयार हूँ। लेकिन उत्तर प्रदेश प्रशासन द्वारा मुझे पिछले 9 घंटे से गिरफ्तार करके चुनार किले में रखा हुआ है। प्रियंका गांधी दूसरे ट्वीट में कहा कि प्रशासन कह रहा है कि मुझे 50,000 की जमानत देनी है अन्यथा मुझे 14 दिन के लिए जेल की सज़ा दी जाएगी, मगर वे मुझे सोनभद्र नहीं जाने देंगे ऐसा उन्हें ऊपर से ऑर्डर है।’

प्रियंका गांधी ने एक अन्य ट्वीट में कहा, ‘मैं नरसंहार का दंश झेल रहे गरीब आदिवासियों से मिलने, उनकी व्यथा-कथा जानने आयी हूँ। जनता का सेवक होने के नाते यह मेरा धर्म है और नैतिक अधिकार भी। उनसे मिलने का मेरा निर्णय अडिग है। मगर इसके बावजूद यूपी सरकार ने यह तमाशा किया हुआ है। जनता सब देख रही है।

सोनभद्र जाने की प्रियंका गांधी की इस जिद व संघर्षशील इरादों ने कांग्रेसियों के साथ-साथ देशवासियों को भी उनकी दादी इंदिरा गांधी की कार्यशैली व बिहार के बेलछी दौरे की याद एकबार फिर दिला दी है साथ ही उनके संघर्ष की देश के सभी तबके के लोगों ने सराहना भी की है। प्रियंका गांधी जिस तरह से प्रशासन से सोनभद्र जाने पर अड़ गयी थी, उनकी इस रणनीति को देखकर लगता है कि वो इंदिरा गांधी के पदचिन्हों पर ही राजनीति में आगे बढ़ना चाहती हैं। उनकी इस ज़िद ने बिहार के बेलछी नरसंहार के बाद इंदिरा गांधी के विपरीत परिस्थितियों में बेलछी दौरे की याद ताज़ा कर दी है। आमजनों के लिए प्रियंका गांधी के इस संघर्ष भाव को देखकर लोगों ने उनकी तुलना इंदिरा गांधी से करनी शुरू कर दी। वो कहने लगे है कि आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की करारी हार के बाद जिस तरह से वर्ष 1977 में बिहार के बेलछी गांव में दर्दनाक नरसंहार हुआ था जिसमें इंदिरा गांधी खराब कानून व्यवस्था को लेकर सडक़ पर आमजनता के साथ संघर्ष करने के लिए आ गयीं थी। और उसी संघर्ष के बलबूते वर्ष 1980 में दौबारा देश की सत्ता पर काबिज हुई थी। ठीक उसी तरह सोनभद्र की इस घटना को लेकर प्रियंका जिस तरह उत्तर प्रदेश सरकार और उसकी खराब कानून व्यवस्था पर सवाल उठाने के लिए सड़क पर उतर गईं हैं वह काबिलेतारीफ हैं। उससे राहुल गांधी के अध्यक्ष पद के इस्तीफे के बाद निराशाजनक माहौल से गुजर रही कांग्रेस पार्टी को संजीवनी मिलेगी। प्रिंयका जिस तरह से वह बिना जमानत लिए पीड़ित परिवार से मिलने की जिद्द पर लगातार अड़ी रही। उसके चलते लोगों को एक बार फिर इंदिरा गांधी की याद आ गयी। लोग इस घटना की तुलना वर्ष 1977 में हुए बेलछी गांव के नरसंहार की घटना से कर रहे हैं। कुछ लोग तो कहने लगे हैं कि जिस तरह अपातकाल के बाद इंदिरा गांधी जब वर्ष 1977 का लोकसभा चुनाव हारी थी तो उसके बाद बेलछी की घटना के बाद किये गये जनसंघर्ष से ही इंदिरा गांधी की दमदार वापसी हुई थी। आपको बता दे कि बेलछी नरसंहार, बिहार का पहला जातीय नरसंहार था। ये दर्दनाक घटना 27 मई 1977 को घटित हुई थी। उस दिन बेलछी में 11 दलितों की निर्ममतापूर्वक हत्या कुर्मियों के द्वारा की गयी थी। बिहार का बेलछी गांव भी उत्तर प्रदेश के जनपद सोनभद्र के उम्भा गांव की तरह ही एक बहुत ही दर्दनाक घटना की गवाह बना था। जिसमें बंदूको और अन्य घातक हथियारों से लैस कुर्मियों के बड़े गुट ने गरीब दलितों के घर पर हमला कर दिया था। 11 दलित खेतीहर मजदूरों को घर से बाहर खींच कर जिंदा जला दिया था। इंदिरा गांधी को जब इस घटना की जानकारी मिली तो उन्हें यह मसला अंधेरे में एक उम्मीद की किरण सी दिखायी पड़ा। क्योंकि वर्ष 1977 में वह आपातकाल के चलते लोकसभा चुनाव हार चुकी थीं और अब वह राजनीति से सन्यास लेने के बारे में सोच रहीं थी। यह वह वक्त था जब देश में मोराजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बने कुछ ही समय बीता था और बेलछी का यह जघन्य कत्लेआम हो गया था। देश के आम जनमानस की नब्ज को अच्छी तरह से पकड़ने में माहिर इंदिरा गांधी ने बिना एक पल गवायें मौके की नजाकत को समझा और वो बिना किसी देर किये दिल्ली से सीधे हवाई जहाज के द्वारा पटना पहुंच गयी। फिर वहां से इंदिरा गांधी कार के जरिए बिहार शरीफ पहुंच गईं और फिर बेलछी जाने की तैयारी हुई। स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की किताब “द रेड साड़ी” में सोनिया गांधी के आधार पर लिखा है कि इंदिरा कहती हैं, ”उस वक्त बहुत तेज बारिश हो रही थी। पटना से बेलछी जाने के जाने के रास्ते पर कई जगह पानी भर गया था। कीचड़ की वजह जीप से व पैदल चलना बहुत मुश्किल हो रहा था। सभी लोगों ने कहा कि अब ट्रैक्टर से ही आगे जाना संभव है। मैं अन्य सहयोगियों के साथ ट्रैक्टर पर चढ़ी। ट्रैक्टर कुछ दूर ही चल पाया था कि चक्का कीचड़ में फंस गया। मौसम और रास्ते की हालत देख कर साथ चल रहे सहयोगियों ने कहा कि अब लौट जाना चाहिए। बेलछी जाने का कार्यक्रम स्थगित कर देना चाहिए। लेकिन मेरे सिर पर धुन सवार थी कि किसी भी तरह बेलछी पहुंचना है। पीड़ित दलित परिवार से हर हाल में मिलना है।”

”मैंने कहा, जो लौटना चाहते हैं वे लौट जाएं, मैं तो बेलछी जाऊंगी ही। मैं जानती थी कि कोई नहीं लौटेगा। कीचड़-पानी के बीच हम आगे बढ़ते रहे। आगे जाने पर एक नदी आ गयी। नदी पार करने का कोई उपाय नहीं था, शाम हो चली थी। गांव वालों से नदी पार करने के बारे में पूछा तब उन्होंने बताया कि यहां के मंदिर में एक हाथी है। लेकिन हाथी पर बैठने का हौदा नहीं है। मैंने कहा, चलेगा. हाथी का नाम मोती था। उस पर कंबल और चादर बिछा कर बैठने की जगह बनायी गयी। सबसे आगे महावत बैठा। उसके बाद मैं बैठी, फिर मेरे पीछे प्रतिभा पाटिल बैंठी। प्रतिभा काफी डरी हुईं थीं। वे कांप रहीं थीं और मेरी साड़ी का पल्लू कसकर पकड़े हुए थीं। जब हाथी नदी के बीच पहुंचा तो पानी उसके पेट तक पहुंच गया। अंधेरा घिर आया था। बिजली कड़क रही थी। ये सब देख कर थोड़ी घबराहट हुई लेकिन फिर मैं बेलछी के पीड़ित परिवारों के बारे में सोचने लगी। जब बेलछी पहुंची तो रात हो चुकी थी। पीड़ित परिवरों से मिली। मेरे कपड़े भींग चुके थे। मेरे पहुंचने पर गांव के लोगों को लगा जैसे कोई देवदूत आ गया है। उन्होंने मुझे पहनने के लिए सूखी साड़ी दी। खाने के लिए मिठाइयां दीं। फिर कहने लगे हमने आपके खिलाफ वोट किया, इसके लिए हमे क्षमा कर दीजिए।”

इसके बाद इंदिरा गांधी बेलछी से पांच दिन बाद वापस दिल्ली लौंटी, तब तक यह घटना राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अखबारों में सुर्खी बन गई थी। हर तरफ लोग इंदिरा गांधी की तारीफ कर रहे थे। सोनिया गांधी ने देखा कि उनके चेहरे पर मुस्कान है और आंखों में जबरदस्त आत्मविश्वास नजर आ रहा है। इंदिरा गांधी को यकीन हो चुका था कि अब देश में उनके दिन एकबार फिर लौटने वाले हैं।

ठीक उसी प्रकार सोनभद्र हत्याकांड के बाद घटे घटनाक्रम की घटना से एक बार फिर प्रियंका गांधी की वही संघर्षशील तस्वीर देशवासियों के सामने आ रही है जो उस वक्त 13 अगस्त 1977 को बिहार के बेलछी में इंदिरा गांधी की थी। लोग कहने लगे हैं कि “प्रिंयका नहीं ये आंधी है दूसरी इंदिरा गांधी है” सोनभद्र के इस घटनाक्रम के बाद लोगों में चर्चा होने लगी है कि प्रिंयका गांधी युवा संघर्षशील है उनके दिल में आमजनमानस के दुःख दर्द के लिए जगह है और वह इंदिरा गांधी के पदचिन्हों पर चल रही है। वो ही राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद कांग्रेस को सही ढंग से संभाल सकती है वो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के लिए उपयुक्त हैं। आम लोगों को आशा है कि प्रिंयका गांधी ही वो चेहरा है जिनके संघर्षशील कुशल नेतृत्व में कांग्रेस देश में जल्द ही वापसी करेगी और मजबूत विपक्ष के दायित्व का निर्वाह करके आमजनमानस के लिए धरातल पर संघर्ष करेगी ।

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