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आखिर सावन में महिलायें क्यों पहनती है हरे रंग की चूड़ियाँ और परिधान

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संजय कुमार सुमन

सावन का महीना हो और महिलाओं की बात न हो यह अटपटा सा लगता है। सावन में महिलाएं विशेष तौर पर साज-ऋगार करती हैं। सावन में महिलाओं के लिये हरे रंग का विशेष महत्व होता है। सावन का महीना प्रकृति की सौन्दर्य का महीना होता है। शास्त्रों में महिलाओं को भी प्रकृति का रूप माना गया है। इस मौसम में बरसात की बूंदों की प्रकृति खिल उठती है और हर तरफ हरियाली छाई रहती है।सावन महीना शुरू होते ही सुहागिन महिलाओं पर सावन का रंग चढ़ना शुरू हो गया है। सावन महीने में महिलाओं के लिए हरे रंग का विशेष महत्व होता है। लिहाजा सावन महोत्सव के जरिये महिलायें हरे रंग का परिधान और श्रृंगार करना शुभ मानती हैं। सावन का महीना आते ही चूड़ियों की बिक्री बढ़ जाती है। खासतौर पर हरे रंग की चूड़ियों की मांग सबसे ज्यादा रहती है।

सावन के महीने में हर जगह हरियाली होती है, जो महिलाओं के लिए खास होता है। कहा जाता है हरी चूड़ियां महिला के सुहाग का प्रतीक है।वहीं इस महीने में भगवान शिव को पूजा जाता हो इसलिए महिलाएं हरे रंग की चूड़ियां पहनती हैं जिससे उन्‍हें भगवान शिव का आशीर्वाद मिले। भगवान शिव प्रकृति के बीच रहते हैं और उन्हें हरे रंग का बिल्व और धतूरा भी चढ़ाया जाता है जिससे भगवान शिव खुश होते हैं। इसलिए सावन में अधिकतर महिलाएं हरे रंग की चूड़ियां पहनती हैं।

प्रकृति से जुडा पर्व 
प्रकृति की दृष्टि से भी इस त्योहार को महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्षा ऋतु के आते ही खेतों में धान सहित अन्य खरीफ फसलों की बुआई शुरू हो जाती है। सभी समुदायों में इस अवसर पर हर्षोल्लास व्याप्त रहता है। जब धरती पर चारों ओर हरियाली छा जाती है तो स्त्रियां भी हरे रंग के वस्त्र और चूड़ियांपहनकर लोकगीत गाते हुए सावन के महीने का स्वागत करती हैं। देश के विभिन्न प्रांतों में इस दिन स्त्रियां और बालिकाएं हाथों में मेहंदी रचा कर झूला झूलते हुए अपना उल्लास प्रकट करती हैं।
चूड़ी मोहे सब मन
वैसे तो चूड़ी शादीशुदा को पहनना अनिवार्य होता है ,लेकिन बदलते फैशन ने चूड़ियों के महत्व और अधिक बढ़ा दिया है। अब तो कुंवारी लड़कियां भी चुड़ियां पहनना पंसद करती है। प्राचीन समय की इस परंपरा को  आज की मार्डन नारी भी अमल करती है।

हर धर्म में जरूरी है चूड़ी
हिंदू धर्म में शादीशुदा महिलाओं को चूड़ियां पहनना जरुरी होता है और ज्यादतर महिलाएं सोने से बने कंगनों के साथ कांच की चूड़ियां पहनती है। वहीं मुस्लिम महिलाओं के लिए शादी के बाद और पहले दोनों  समय चूड़ी पहनना जरूरी होता है कहा जाता है कि खाली हाथ किसी को पानी देना गलत होता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार महिला के चूड़ी पहनने का संबंध उसके पति और बच्चे से होता है। कहते है कि इससे इनका स्वास्थ्य अच्छा रहता है। कुछ धर्मों में तो चूड़ियों के संबंध में इतनी गहरी आस्था है कि महिलाएं चूड़ी बदलने में भी सावधानी बरतती है।कम से कम एक  चूड़ी अवश्य ही हो।

 

सृष्टि के आरंभ से चूड़ी का चलन
अगर अपने देश में कहा जे कि कब से चूड़ियां पहनने का चलन शुरू हुआ तो इसका जवाब देना थोड़ा मुश्किल होगा, लिकन अंदाजतन सृष्टि के प्रारंभ से ही चूड़ियों का चलन है। ऐसा इसलिए कह सकते है कि देवी-देवताओं की फोटोज में उनको चूड़ी पहने देखा जा सकता है।

 

कहीं चूड़ा तो कहीं शाखा-पौला 
हमारे देश में चाहे जिस क्षेत्र के लोग हो, चूड़ियां पहनने का उनका रिवाज है। पंजाब में शादी के समय दुल्हन लाल रंग  का चूड़ा पहनती है,वहां चूड़ी को ही चूड़ा कहा जाता है। ये चूड़ा पंजाब में सुहाग की निशानी होती है। वहां शादी में खास रूप से एक रस्म के दौरान ये चूड़ा पहनाया जाता है और एक बार पहनने के बाद इसे अगले 40 दिनों तक उतारा नहीं जाता।

वहीं पश्चिम बंगाल में चूड़ियों के रुप में शाखा और पौला पहना जाता हैं। शाखा का रंग सफेद होता है और पौला का लाल। ये दोनों शीप और लाख से बनी चूड़ियां होती हैं, जिन्हें यहां किसी सोने के कंगन से भी अधिक महत्व दिया जाता है। इसके अलावा पूर्वोत्तर में कांच की चूड़ियों को पहनने पर जोर दिया जाता है।बस प्लास्टिक की चूड़ी पहनने पर मनाही है। धर्म शास्त्रों में इसे अशुभ माना जाता है। साइंस में  कहा जाता है, इससे नकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कांच से बनी हुई चूड़ियां पहनने और उससे आने वाली आवाज से आसपास की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है। इतना ही नहीं, हिंदू धर्म में कांच की चूड़ियों को पवित्र और शुभ भी माना जाता है।

रंगों का महत्व भी
चूड़ी चाहे जिस रंग की हो कलाई की शोभा बढ़ाती है, लेकिन फिर भी इसमें कुछ खास रंगों  का महत्व है। नववधु को हरी-लाल चूड़ी पहनना चाहिए। कहते हैं हरे रंग की चूड़ी खुशहाली और सौभाग्य के साथ नई शुरुआत करती है। लाल रंग को नारी शक्ति से जोड़ा जाता है। चूड़ियों के लाल रंग में भी कई रंग होते हैं जैसे कि गहरा लाल, हल्का लाल, खूनी लाल, आदि। इन सभी रंगों का अपना महत्व है।

 

चूड़ियों से हो भरी-भरी कलाई
वैसे तो आजकल फैशन में लोग 2-3 चूड़ी पहनते है, लेकिन चूड़ियों की जितनी संख्या होगी, उतनी ही अच्छी होती है।  आमतौर पर 2-3 चूड़ियां एक कुंवारी लड़की पहने तो वो मानसिक और शारीरिक रूप से ताकतवर बनती हैं।लेकिन जब ये चूड़ियां संख्या में हों तो इसका महत्व कई बढ़ जाता है। साइंस का भी मानना है कि अगर महिलाएं दोनों हाथों में बहुत सारी चूड़ियां पहने तो ये खास प्रकार की ऊर्जा देती हैं और नारी  को बुरी नजर से बचाती है।

चूड़ी का टूटना होता  है अशुभ
चूड़ियों से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। इन्हें पहनने का कितना फायदा है ये तो आपने जाना, लेकिन यही चूड़ियां समय आने पर गलत परिणाम भी देती हैं। इसलिए इन्हें संभलकर पहनना चाहिए। ये बहुत कम लोग जानते हैं। ऐसा तब होता है जब चूड़ियां टूटती हैं या फिर उनमें दरार आ जाती है। ऐसी मान्यता है कि चूड़ियों का टूटना उस महिला या उससे जुड़े लोगों के लिए एक अशुभ संकेत लेकर आता है।

 

लेकिन साइंस का मानना है कि ये उस महिला के आसपास मौजूद साधारण से काफी अधिक मात्रा की नकारात्मक ऊर्जा का परिणाम होता है। जिसके चलते ये ऊर्जा आभूषणों में से सबसे पहले उसकी चूड़ियों पर प्रहार करती है। चूड़ियों के टूटने के साथ उनमें दरार आ जाना ही अशुभ माना जाता है।

ऐसा होने पर स्त्री को चूड़ियां उतार देनी चाहिए। साइंस के अनुसार चूड़ियों में दरार आने का मतलब नकारात्मक ऊर्जा से है। ये ऊर्जा उसकी चूड़ियों के भीतर जगह बनाती है और उन्हें धीरे-धीरे नष्ट करती है। यदि दरार आने पर भी ये चूड़ियां उतारी ना जाएं तो ये औरत के हेल्थ पर असर डालती हैं।

इस मौसम में बारसात की बूंदों प्रकृति खिल उठती है हर तरफ हरियाली छा जाती है। ऐसे में प्रकृति से एकाकार होने के लिए महिलाएं भी मेंहदी लगाती हैं। हरे वस्त्र और हरी चूड़ियां पहनती हैं।सावन के महीने में सुहागन स्त्रियों के लिए कई त्योहार आते हैं जिनमें कज्जली तीज, हरियाली तीज शामिल हैं। इन त्योहारों में हरे वस्त्र, हरी चूड़ियां और मेंहदी लगाने के नियम हैं।

इसका कारण यह है कि सावन के महीने में हरे रंग का वस्त्र धारण करने से सौभाग्य में वृद्घि होती है और पति-पत्नी के बीच स्नेह बढ़ता है।हरा रंग उर्वरा का प्रतीक माना जाता है। सावन के महीने में प्रकृति में हुए बदलाव से हार्मोन्स में भी बदलाव होते हैं जिसका प्रभाव शरीर और मन पर पड़ता जो स्त्री पुरुषों में काम भावना को बढ़ाता है।

जबकि ज्योतिषशास्त्र के अनुसार हरा रंग बुध से प्रभावित होता है। बुध एक नपुंसक ग्रह है। इसलिए बुध से प्रभावित होने के कारण हरा रंग काम भावना को नियंत्रित करने का काम करता है। सावन में मेंहदी लगाने का वैज्ञानिक कारण भी यही माना जाता है।
सावन के महीने में कई प्रकार की बीमारियां फैलने लगती हैं। आयुर्वेद में हरा रंग कई रोगों में कारगर माना गया है। यही कारण है कि सावन में महीलाएं स्वास्थ्य की रक्षा के लिए मेंहदी लगाती हैं और हरे रंग के वस्त्र और चूड़ियां पहनती हैं।

 

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