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साहित्य में आज पढ़िए शीला मंडल की रचना ‘जल ही जीवन है’

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जल ही जीवन है
जल के बिना कल नहीं
कितनो को तू जीवन देती
कितनो का तू जीवन लेती
जल है तभी कल हैं ।
मत रुठ तू मत टूट तू
तेरे बिना न रहेगा गागर
न रहेगा सागर ।।
कल कल धारा बहता झड़ना
कहाँ से कोइ लाएगा
धरती की प्यास कौन बुझायेगा ?

तेरे बच्चे तड़प तड़प के मर जायेंगे
तू जो न रह पायेगी।
न हरा होगा न हरियाली
बिरान सी धरा बंजर कहलायेगा।
न मौसम राग सुनाएगा
जल ही जीवन कैसे बन पाएगा?
बारी खेत खलियान
खाली खाली सा नजर आयेगा।
नदी तू बहना न छोड़
तोड़ न हजारो का दिल
जल ही तो जीवन है ।
जल है तो कल है
जल नही तो सब छल हैं।

जन जन करे पुकार
तू जो न हो तो जीना है बेकार ।
तेरे तट पर ही चलती है कईयों
की जिंदगानी ।
गाँव शहर बसे हैं तेरे तट पर,गूँजती है कई सन्तों की वाणी
जल ही जीवन है
सुनाती है कई कहानी
इसके बिना नही है जिंदगानी ।।

 

शीला कुमारी

मधेपुरा,बिहार

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