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सहरसा के साप्ताहिक शाखा में गुरूपूर्णिमा एंव गुरुदक्षिणा के महत्व पर चर्चा आयोजित

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सुभाष चन्द्र झा
कोसी टाइम्स@सहरसा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वारा रविवार को शंकर चौक मंदिर में साप्ताहिक शाखा आयोजित किया । जिसमें मुख्य शिक्षक ज्ञान प्रकाश दत्त के संचालन में सूर्य नमस्कार मंत्र एकात्मता स्त्रोत व हनुमान चालीसा का पाठ किया गया । इस अवसर पर नगर संघचालक ई रामेश्वर ठाकुर ने योग व प्राणायाम करवाया । सुभाष अग्रवाल ने प्रार्थना एवं सामूहिक संघ गीत गायन सुभाष चन्द्र झा ने किया। मुख्य शिक्षक श्री दत्त ने कहा कि आषाढ़ मास की पूर्णिमा का बहुत ही महत्व है ।मूलतः गुरुदक्षिणा का अर्थ शिष्य की परीक्षा के संदर्भ में भी लिया जाता है। गुरुदक्षिणा गुरु के प्रति सम्मान व समर्पण भाव है। गुरु के प्रति सही दक्षिणा यही है कि गुरु अब चाहता है कि तुम खुद गुरु बनो।

गुरुदक्षिणा उस वक्त दी जाती है या गुरु उस वक्त दक्षिणा लेता है जब शिष्य में सम्पूर्णता आ जाती है। अर्थात जब शिष्य गुरु होने लायक स्थिति में होता है। गुरु के पास का समग्र ज्ञान जब शिष्य ग्रहण कर लेता है और जब गुरु के पास कुछ भी देने के लिए शेष नहीं रह जाता तब गुरुदक्षिणा सार्थक होती है।
द्रोणाचार्य को युद्ध भूमि में जब अर्जुन ने अपने सामने प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा तो उसने युद्ध लड़ने से इंकार कर दिया। यह अर्जुन के शिष्य के रूप में द्रोणाचार्य के प्रति प्रेम व सम्मान का भाव था।
इसी प्रकार जब एकलव्य से गुरु द्रोणाचार्य ने प्रश्न किया कि तुम्हारा गुरु कौन है, तब उसने कहा- गुरुदेव आप ही मेरे गुरु हैं और आपकी ही कृपा से आपकी मूर्ति को गुरु मानकर मैंने धनुर्विद्या सीखी है। तब द्रोणाचार्य ने कहा- पुत्र तब तो तुमको मुझे दक्षिणा देना होगी।
एकलव्य ने कहा- गुरुदेव आप आदेश तो करें मैं दक्षिणा देने के लिए तैयार हूँ। तब गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य से दाहिने हाथ का अँगूठा माँगा। एकलव्य ने सहर्ष अपना अँगूठा काटकर गुरु के चरणों में रख दिया। इससे एकलव्य का अहित नहीं हुआ, बल्कि एकलव्य की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई और वह एक इतिहास पुरुष बन गया। गुरु का प्रेम दिखने में कठोर होता है, किंतु इससे शिष्य का जरा भी अहित नहीं होता।गुरु का पूरा जीवन अपने शिष्य को योग्य अधिकारी बनाने में लगता है। गुरु तो अपना कर्तव्य पूरा कर देता है, मगर दुसरा कर्तव्य शिष्य का है वह है- गुरुदक्षिणा। हिंदू धर्म में गुरुदक्षिणा का महत्व बहुत अधिक माना गया है। गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने के बाद जब अंत में शिष्य अपने घर जाता है तब उसे गुरुदक्षिणा देनी होती है। गुरुदक्षिणा का अर्थ कोई धन-दौलत से नहीं है। यह गुरु के ऊपर निर्भर है कि वह अपने शिष्य से किस प्रकार की गुरुदक्षिणा की माँग करे।
गुरु अपने शिष्य की परीक्षा के रूप में भी कई बार गुरुदक्षिणा माँग लेता है। कई बार गुरुदक्षिणा में शिष्य ने गुरु को वही दिया जो गुरु ने चाहा । अर्थात अपने समस्त अहंकार, घमंड, ज्ञान, अज्ञान, पद व शक्ति, अभिमान सभी गुरु के चरणों में अर्पित कर दें। यही सच्ची गुरु दक्षिणा होगी।इस मौके पर जिलासहसंघचालक डॉ मुरलीधर साहा ,हरिनंदन सिंह ,सुरेश सिन्हा,मनोज झा ,मनीष कुमार,चंदन कुमार ,उदाहरण भगत ,ई अनिल सिंह ,रूपेश झा ,सुरेन्द्र भगत सहित बड़ी संख्या में स्वयंसेवक मौजूद रहे ।

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