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अस्तित्व खोने की और तेजी से अग्रसर हैं प्राचीन कुएँ

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राज आर्यन गुड्डू

कोसी टाइम्स@महुआ बाजार,सहरसा

सामाजिक सरोकार से जुड़ा हुआ कुआं शहर समेत गांव में भी धीरे-धीरे विलुप्त और मृतप्राय होता जा रहा है। हालांकि ग्यारहवीं वित्त योजना में मुखिया के द्वारा अपने-अपने क्षेत्र के सभी सार्वजनिक कुओं की मरम्मत कराकर लाखों रूपये का वारा-न्यारा किया गया।
लेकिन इन कुओं का सीमेंट-सर्जरी भर ही हुई न पानी निकला और न लोगों ने इसका उपयोग कर पानी पीया।
शहर हो या गांव में कुओं की संख्या की कभी गणना नहीं हुई। लेकिन शायद ही कोई ऐसा गांव या टोला हो जहां एक कुंआ न हो।
इन कुओं का उपयोग अब कूडे़दान के रूप में होने लगा है।
अगर कहीं कुएं का घेरा कमजोर हुआ तो उसकी ईट लोग ढोकर घर ले जाते हैं। लिहाजा कई कुओं का अस्तित्व मिट चूका है या मिटने के कगार पर नजर आ रहा है।एक समय था कुओं से ही लोगों की प्यास बुझती थी।
लेकिन बदलते परिवेश व तेजी से बढ़ रहे शहरीकरण के बीच लोग हैण्डपम्प व नल का प्रयोग कर अपनी जरूरतों को पूरा कर लेते हैं।कभी पानी के लिए प्रमुख स्रोत माने जाने वाले कुएं अब शहरीकरण के भेंट चढ़ चुके हैं।अधिकांस कुआं कूड़ेदान में तब्दील हो चुके हैं या फिर विभागीय उदासीनता के कारण सूखने के कगार पर पहुँच चुके हैं।

कभी यह प्राचीन कुआं सालों भर लोगों की प्यास बुझाने के काम आता था।लेकिन आज हालत ये है कि सरकारी मशीनरी को इन श्रोतों की जड़ा भी फ़िक्र नही है।
तथा आम नागरिकों को भी इसकी परवाह नही।
लाेगाें की प्यास बुझाने वाले कुएं समय की करवट के साथ शहर समेत गांव से भी विलुप्त हाे गए।
उसकी जगह नल और बड़े-बड़े पंप हाउस ने लिया। लेकिन कुआं अाैर तालाब का अस्तित्व समाप्त हाेने के बाद जल स्तर बहुत ही नीचे खिसकने लगा।
जिसके बाद पानी संकट से लाेगाें की मुश्किलें बढ़ने के साथ प्रशासनिक स्तर पर बेचैनी बढ़ जाती है।
लेकिन शहरी क्षेत्र समेत गांव में भी कुछ जगहाें पर जाे इक्का-दुक्का कुआं बचा हुआ भी है।लेकिन उसे बचाने के लिए काेई आगे नहीं आ रहा।पूर्वजों से लेकर अभी तक कुआं धार्मिक महत्ता का केंद्र है। किसी भी मांगलिक कार्य में कुआं के पास जा कर रश्म पूरा किया जाता है।
पुरोहित बिनोद जी महाराज ने बताया कि धार्मिक दृष्टिकाेण से व सभी मांगलिक कार्याें में कुआं का बहुत ही बड़ा महत्व माना गया है।महुआ बाजार के बजरंगबलि मंदिर परिसर स्थित कुआं चालू हालत में है। उन्हाेंने बताया कि आज भी एक से डेढ़ किलाे मिटर से इलाके के लाेग मांगलिक कार्याें में रश्म पूरा करने मंदिर स्थित कुआं पर आते है।विलुप्त हाे रहे कुआं काे बचाने के लिए पहल हाेनी चाहिए।
कुओं के विलुप्त होने से बड़ी परेशानी भूमि की नापी में अमीनों को भी होती है।अमीन दिनेश यादव बताते हैं कि पहले हम नक्शे में कुओं को मुस्तकील-निश्चित मानकर नाप शुरू करते थे और नाम पक्का होता था।लेकिन अब तो नक्शे का कुआं कहीं मिलता ही नहीं।जिस कारण जमीन मापी में भी कुछ हद तक परेशानी आती है।कुओं की इस बदहाली का मुख्य कारण है जब चापाकल आसानी से उपलब्ध हो गया तो कुओं की उपेक्षा होने लगी।
उपयोग नही होने से कुआं गंदा और खराब होकर बंद हो गया। खेतों में भी पंपसेट-बोरिंग आ गया तो वहां भी कुओं का उपयोग नहीं हो सका जिस कारण कुँओं का अस्तित्व मिटने के कगार पर है।

 

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