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बढ़ते प्रदूषण के कारण गंभीर संकट से जूझ रहे हैं मधेपुरा,भागलपुर,पूर्णिया के लोग

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संजय कुमार सुमन 
sk.suman379@gmail.com 
बढ़ते प्रदूषण के कारण पूरा विश्व परेशान है।जलवायु की बढ़ती तापमान के कारण कई देशों पर गंभीर संकट मंडरा रहे हैं।इस गंभीर संकट से मधेपुरा,भागलपुर,पूर्णिया भी अछूता नहीं है। बढ़ते प्रदूषण के कारण हजारों लोग मारे जा रहे हैं। पूरे क्षेत्र में टीबी सहित कई गंभीर बीमारी प्रदूषण के कारण हो रहे हैं बल्कि यहां तो कुछ मामले में खतरे की जद भी पार कर रही है। सरकार का पर्यावरण और प्रदूषण विभाग की यह चिंताजनक आंकड़े शहरी बाशिंदों की सेहत पर वार करने वाले पीएम 2.5 कणों की तय स्तर से ऊपर जा रही मात्रा से आगाह कर रहे हैं।दिलचस्प यह है कि बिहार में तो प्रदूषण पर नियंत्रण करने वाले विभाग के पास इतनी खतरनाक कणों को मापने की कोई व्यवस्था तक नहीं है। प्रदूषण विभाग पीएम10 का ही मापन कर पा रहा है।यह कण भी औसत स्तर से दोगुने के आसपास है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मधेपुरा,भागलपुर,पूर्णिया की खराब सड़कों पर दौड़ते वाहनों से उड़ने वाली धू,धुंध प्रदूषण का कारण है लेकिन गाड़ियों से निकलने वाले जहरीला धुआं एवं कंक्रीट के नए बसते इलाकों में उड़ती धूल कणों से वातावरण और भी जहरीला बनता जा रहा है। वाहनों एवं कचरे के धुएं से निकलने वाले सल्फर,नाइट्रोजन और कार्बन के कण हवा में घुल रहे हैं।
 कैसे पता चला 
लगातार खराब होती सड़कों और वाहनों के बढ़ने के साथ जब कैंसर एवं फेफड़ों की बीमारी के मरीज बढ़ने लगे तो केंद्र सरकार जागी और 10 माइक्रोन के कणों का मापन शुरू किया लेकिन इससे बात नहीं बनी तो और महीन कण का खतरा सामने आया। इसके बाद पीएम 2.5 का मापन शुरू किया गया।हालांकि अभी इसका मापन सिर्फ दिल्ली में हो पा रहा है। दिल्ली में निर्धारित मात्रा से 11 गुना ज्यादा पाया गया।
पर्यावरण विशेषज्ञों की माने तो पीएम10 की जानकारी तो लोगों को दी जाती है लेकिन पीएम 2.5 यानि 2.5 माइक्रॉन का मापन नहीं होने से जानकारी नहीं मिल पाती।इस मामले में प्रदूषण विभाग भी असहाय है क्योंकि उसके पास इस को मापने का कोई इंतजाम ही नहीं है। वायु प्रदूषण में धूल के कण, जहरीली गैस सीधे शरीर के स्नायु तंत्र को प्रभावित करते हैं। यह सिस्टम ब्रेन से ही कंट्रोल होता है।
क्या है पीएम 
 पीएम का अर्थ होता है पार्टिकुलेट मैटर यानी हवा में घुलनशील श्वसन योग्य कण हवा में इसकी मात्रा साइज के आधार पर तय होती है। पीएम 2.5 यानी  2.5 माइक्रोन मोटाई का महीन कण। यह धूल या गैसेस किसी भी स्रोत से हवा में आता है।इसकी मोटाई बाल की मोटाई से भी 30 गुना कम होती है। महीन कण होने से शरीर के आंतरिक हिस्से में जाने से रोका नहीं जा सकता। इसलिए यह काफी खतरनाक साबित हो रहे हैं। यह कण फेफड़ो तक पहुंच जाते हैं। फेफड़ों तक पहुंचे कण वहां से खून में आसानी से घुल कर दिल तक पहुंचते हैं और इससे हार्ट से संबंधित बीमारियां बढ़ रही है। इससे फेफड़ों के गंभीर रोग खांसी,अस्थमा का खतरा बढ़ जाता है। बच्चों में यह फेफड़ों का विकास ही रोक देता है।
सड़कों किनारे खेतों में लगे फसल पर भी धूल कण का बुरा प्रभाव पड़ता है।पेड़ पौधे सूरज की रोशनी से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया अपनाते हैं।अगर पत्तियां धूल से ढका रहेगा तो विकास प्रभावित होगा।
ऐसे बनते हैं यह कण
 अमेरिकी प्रदूषण संरक्षण एजेंसी के मुताबिक इनकी संरचना चार तरह के पदार्थ से मिलकर हो सकती है।इन्हें आंखों से डायरेक्ट देखना संभव नहीं होता है। इसे माइक्रोस्कोप से ही देख सकते हैं।
 हर तरह से है घातक 
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इससे सुरक्षा का कोई स्तर तय नही है। संगठन ने इसकी सालाना मात्रा 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर जबकि 24 घंटे के लिए यह 25तय है। भारत में से 40 से 60 तक तय किया गया है।
 सेहत के लिए है खतरनाक
 20 प्रतिशत से अधिक शहरवासी सांस की बीमारी से त्रस्त है।पीएम 10 के बढ़ने से आंखों की दिक्कत हो रही है। स्कूली बच्चों में फेफड़ों सम्बन्धित शिकायतें मिलती है। विद्यार्थियों में ध्यान केंद्रित नहीं हो पाने जैसी परेशानियां आ रही है। विश्व में 3.1 लोगों की मौत हो रही है। इस कण से औसत आयु भी 8.6माह कम हो गई है। देश के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में बिहार के पटना,भागलपुर और मुजफ्फरपुर की हालत और भी दयनीय है।
मधेपुरा,भागलपुर,पूर्णिया में बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए यहां भी पीएम 2.5 कणों से निश्चय ही लोगों की सेहत को नुकसान पहुंच रहा है।टूटी सड़कें,बढ़ते वाहन इसके लिए मुख्यरूप से जिम्मेवार हैं।हरियाली कम होती जा रही है।कंकरीट का जंगल बढ़ रहा है।निर्माण कार्यों में भी नियमों का पालन नही हो रहा है।सड़कों से उड़ती धूल व वाहनों से निकलने वाले जहरीले धुएं से लोगों को सांस लेने में परेशानी की शिकायत बढ़ रही है। इस तरफ तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। बुजुर्गों में प्रदूषण से सबसे ज्यादा दमा व अस्थमा का बीमारी बढ़ जाती है।
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देखें वीडियो 
राष्ट्रीय उच्च पथ 106 उदाकिशुनगंज से मधेपुरा व एसएच 58 भटगामा से उदाकिशुनगंज सड़क की हालत दयनीय https://youtu.be/lZUCVFeto-A

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