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सहरसा में पानी के अभाव में चौपट हो रही हैं मखाने की खेती ,किसान हल्कान

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सुभाष चन्द्र झा
कोसी टाइम्स@सहरसा
मिथिला मे एक कहावत बहुत ही मशहूर है ,पग पग पोखर माँछ मखान ई थिक मिथिला केर पहचान । लेकिन आज यह पहचान विलुप्त होने के कगार पर है । मिथिला मे कदम कदम पर पोखर तो है लेकिन पानी सुख जाने के कारण मछली नहीं मिल रहा है उसी प्रकार पोखर सुख जाने के कारण किसानों को खेतों की सिंचाई के लिए भी या तो इन्द्र देवता पर निर्भर रहना पड़ता है या फिर दमकल या बोर्डिंग पर आश्रित रहना पड़ता है। उसी प्रकार मखाने की खेती पर बुरा असर दिखाई देता है ।

मखाने के संबंध में कहा गया है कि यह देवताओं को भी दुर्लभ है क्योंकि मखान स्वर्ग में भी नहीं मिलता है । मिथिला मे धार्मिक व पौराणिक मान्यताओं में इसे अति शुभ व पवित्र माना गया है । इसलिए मिथिला के सभी शुभ व अशुभ संस्कार में इसे शामिल किया गया है । साथ ही वैज्ञानिक एवं तकनीकी अनुसंधान से पाया गया है कि मखान अति पौष्टिक आहार माना गया है ।साथ ही मखाने से कई गंभीर बीमारियों के लिए भी दवाओं का निर्माण किया जाता है जिसके कारण पुरे देश ही विदेशों में इसका बहुत ज्यादा मांग की जाती है । मिथिला के सहरसा,मधेपुरा,सुपौल ,पूर्णिया,अररिया,किशनगंज ,कटिहार ,दरभंगा व मधुबनी में बड़े पैमाने पर खेती होती है ।लेकिन किसान अब मखाने की खेती से मुँह मोड़ रहें हैं । मखाने की खेती कर रहे किसान वेदानंद साह,संजय चौधरी तथा कैलाश मुखिया ने बताया कि पहले मखाने की खेती करना काफी लाभदायी होती थी जिसमें साल में केवल मखाने की बीज लगाना पड़ता था जिसके साथ साल भर मछली भी आमदनी का जरिया बन रहा था क्योंकि पोखरे या तालाब में सालों भर पानी लगा रहता था । लेकिन अब वर्षा ऋतु में भी कम बारिश होती है जिसके कारण मखाने की खेती करने वालों को पम्पसेट से पानी देना पड़ता है जो काफी खर्चीला काम है । जिसके कारण मखाने की खेती करने वाले किसान अब मुँह मोड़ रहें हैं। किसानों ने बताया कि पहले हजारों हेक्टेयर जल क्षेत्र में मखाने की खेती हो रही थी लेकिन अब यह कुछ एकड़ जल क्षेत्र में मखाने की खेती हो रही है । जो धीरे-धीरे विलुप्त होने के कगार पर हैं । मिथिलावासियो को यह चिन्ता सताये जा रहा है कि मखाना हमारे कर्मकांड में शामिल है हमारे परम्परा में सन्निहित हैं । लोगों ने सरकारी तंत्र को मखाने की खेती हेतु इसके संवर्धन व संरक्षण के लिए कारगर कदम उठाए जाय ।

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