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बिजू का

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बिजू का

अड़ा है खड़ा है

खेतों में पड़ा है

हिमालय की तरह डटा है

बीजू का

ना धूप ना बारिश की फिकर

ना खाने और न पीने की चिंता

अड़ा है खड़ा है खेतों में पड़ा है

न सर पर पगड़ी है

ना अच्छे कपड़े पहने हैं

मुंह पर कालिख

फटे चितरें कपड़े

टूटी चप्पल

हाथ में झाड़ू

यही पहचान है

अड़ा है खड़ा है

खेतों में पड़ा है

पशु पक्षियों से

खेतों की करता रखवाला

निडर है निर्भय है

एक पैरों पर खड़ा है

आ रहा है खड़ा है

खेतों में पड़ा है

ना कुछ खोना है

ना कुछ पाना है

लोग इसे कहते हैं

बिजू का।

संजय कुमार सुमन 

चौसा,मधेपुरा 

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