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सफल होने के लिए अपने तनाव को रखें दूर

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संजय कुमार सुमन

साहित्यकार  

 

एक बार मुल्ला नसीरुद्दीन के साथ दुर्घटना हुई और वे अस्पताल में थे। शरीर के हरेक अंग की कोई न कोई हड्डी टूटी थी।

उनके सारे चेहरे पर पट्टियाँ बँधी हुई थीं। केवल उनकी ऑंखें दिख रही थीं। उनके एक मित्र उन्हें मिलने आए और उनसे पूछा,”कैसे हो, मुल्ला?” उन्होंने कहा,” मैं ठीक हूँ सिवाय इसके कि जब मैं हँसता हूँ तो दर्द होता है।” तब उनके मित्र ने उनसे पुछा,”भला, इस हालत में आप हँस कैसे सकते हैं?” मुल्ला ने जवाब दिया, “अगर मैं अब न हँसु तो मैं ज़िन्दगी में कभी हँस नहीं पाउँगा।”

ये अविरत उत्साह सम्पूर्ण स्वास्थ्य में रहने का आयाम है। संस्कृत में स्वास्थ्य के लिए शब्द है ‘स्वस्ति’ माने प्रबुद्ध व्यक्ति, जो स्व में स्थित है। स्व में बने रहने की पहली निशानी है उत्साह – जो हँस कर ये कह सके कि, “आज कोई काम नहीं बना।” ये कह सकने के लिए तुम्हें ऐसी मानसिक स्थिति चाहिए जो कि तनाव-मुक्त और दबाव–सिद्ध हो।

आजकल की भाग दोड़ भरी जिन्दंगी में मानसिक तनाव एक ऐसे बीमारी है जो किसी को बक्श नहीं रही है। तनाव एक ऐसा शब्द बन गया है जो सुबह से उठते ही हर कोई महसूस करता है। भागदौड़ भरी जिंदगी में मनुष्य कई अनचाहे तनाव के भंवर में फंस के रह जाता है और सुख-सुविधा के साधन जुटाते जुटाते जीवन से सुख, शांति, स्वास्थ्य और आराम को ही गवां बैठता है। और विड़म्बना तो देखिए, चीजें पा कर भी वह अशांत मन के कारण उनका सुख नहीं उठा पाता। शांति के बिना सुख कहां।मानसिक तनाव आजकल लोगो पर इतना हावी हो चुका है की लोगो को मनोचिकित्सक का सहारा लेना पड़ रहा है। यह एक भयंकर बीमारी का रूप ले रही है जिसका इलाज काफी कठिन है।

Tension

हमारी चाहतें तो बहुत हैं लेकिन जब वे पूरी नहीं होतीं या उनको पूरा करने में आ रही चुनौतियों और समस्याओं के कारण तनाव होने लगता है। प्रत्येक व्यक्ति की तनाव की वजह अलग होती है, तो उससे छुटकारा पाने के लिए तरीके भी अलग ही होगें। जिस को जो तरीका भाए, उसे वो अपनाना चाहिए। समस्याओं को किसी के सामने प्रकट नही करते हैं, वे अपने साथ घटी अप्रिय घटनाओं के बारे में बताना बहुत मुश्किल पाते हैं, ऐसे में ये बहुत आवश्यक हो जाता है कि इससे पहले कि ये बातें आपकी सेहत पर अपना असर डालने लगें, आप अपने तनाव के स्तर को पहचान लें।हमारे साथ जो कुछ होता है, उसे तनाव नही कहा जाता, तनाव तो हमारे साथ होने वाली घटनाओं के प्रति हमारी प्रतिक्रिया है और प्रतिक्रिया एक ऐसी चीज है, जिसे हम चुन सकते हैं।

डॉक्टरों का मानना ​​है कि पुरानी तनाव के दौरान, शरीर के कार्य जो जीवित रहने के लिए अनिवार्य हैं, जैसे पाचन और प्रतिरक्षा प्रणाली, बंद हो जाते हैं। “यही कारण है कि मनुष्य बीमार हो जाते हैं,” वे कहते हैं। “मनोवैज्ञानिक बीमारी की कई घटनाएं हैं, जो एक भावनात्मक या मनोवैज्ञानिक पहलू वाली बीमारी है।” इसके अलावा, तनाव अक्सर मनुष्यों को धूम्रपान करने, शराब पीने, खराब खाने, या शारीरिक रूप से निष्क्रिय होने जैसे अस्वास्थ्यकर तरीकों से प्रतिक्रिया देने के लिए प्रेरित करता है।
यह शरीर को पहनने और तनाव के आंसू के अलावा शरीर को नुकसान पहुंचाता है।
तनाव दिन के दिन का एक हिस्सा है। इस तरह हम इस पर प्रतिक्रिया करते हैं जो हमारे स्वास्थ्य और कल्याण को बनाए रखने में सभी अंतर बनाता है। जीवन में कुछ चरणों में दबाव प्रकट होते हैं और इन दबावों से तनाव होता है। आप यह समझना चाहते हैं कि आप कभी भी अपने जीवन में तनाव से छुटकारा नहीं पाएंगे, लेकिन आप उस तनाव को और अधिक स्वस्थ स्थिति में बदलने के लिए तकनीकों का मुकाबला सीख सकते हैं।

एक दिन की बात है जब एक मनोवैज्ञानिक अध्यापक छात्रो को तनाव से निपटने के लिए उपाय बताता है। वह पानी का ग्लास उठाता है। सभी छात्र यह सोचते है की वह यह पूछेगा की ग्लास आधा खाली है या आधा भरा हुआ। लेकिन अध्यापक महोदय ने इसकी जगह एक दूसरा प्रश्न उनसे पूछा ”जो पानी से भरा हुआ ग्लास मैंने पकड़ा हुआ है यह कितना भारी है?”

छात्रो ने उत्तर देना शुरू किया। कुछ ने कहा थोड़ा सा तो कुछ ने कहा शायद आधा लिटर, कुछ ने कहा शायद 1 लिटर ।

अध्यापक ने कहा मेरे नजर मे इस ग्लास का कितना भार है यह मायने नहीं रखता। बल्कि यह मायने रखता है की इस ग्लास को कितनी देर मै पकड़े रखता हूँ। अगर मै इसे एक या दो मिनट पकड़े रखता हूँ तो यह हल्का लगेगा, अगर मै इसे एक घंटे पकड़े रखूँगा तो इसके भार से मेरे हाथ मे थोड़ा सा दर्द होगा, अगर मै इसे पूरे दिन पकड़ा रखूँगा तो मेरे हाथ एकदम सुन्न पड़ जाएँगे और पानी का यही ग्लास जो शुरुआत मे हल्का लग रहा था उसका भर इतना बाद जाएगा की अब ग्लास हाथ से छूटने लगेगा। तीनों ही दशाओ मे पानी के ग्लास का भार नहीं बदलेगा लेकिन जितना ज्यादा मै इसे पकड़े रखूँगा उतना ज्यादा मुझे इसके भारीपन का एहसास होता रहेगा।

मनोवैज्ञानिक अध्यापक ने आगे बच्चो से कहा ”आपके जीवन की चिंताए (tension) और तनाव(stress) काफी हद तक इस पानी के ग्लास की तरह है। इन्हे थोड़े समय के लिए सोचो तो कुछ नहीं होता, इन्हे थोड़े ज्यादा समय के लिए सोचो तो इससे इससे थोड़ा सरदर्द का एहसास होना शुरू हो जाएगा, इन्हे पूरा दिन सोचोगे तो आपका दिमाग सुन्न और गतिहीन पड़ जाएगा ”

कोई भी घटना या परिणाम हमारे हाथो मे नहीं है लेकिन हम उसे किस तरह handle करते है ये सब हमारे हाथो मे ही है। बस जरूरत है इस बात को सही से समझने की।

आप अपनी चिंताए (tension) छोड़ दे, जितनी देर आप tension अपने पास रखोगे उतना ही इसके भार का एहसास बढ़ता जाएगा। यही चिंता बाद मे तनाव का कारण बन जाएगी और नयी परेशानिया पैदा हो जाएंगी।

अंत मे हमेशा एक बात याद रखें

चिंता (tension) और तनाव (stress) उन पक्षियो की तरह है जिन्हे आप अपने आसपास उड़ने से नहीं रोक सकते लेकिन उन्हे अपने मन मे घोसला बनाने से तो रोक ही सकते है।

चलती चक्की देखकर, दिया कबीरा रोये।

दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय।।

एक पाट है वो अपने हिसाब से चल रहा है, दूसरा अपने हिसाब से चल रहा है, बीच में पिस कौन रहा है? मैं पिस रहा हूँ। तुम कहोगे की ना ये पाट, ना वो पाट। मुझे बाहर आने दो, मुझे दोनों पाटों में कोई पाट नहीं चाहिए। मैं साबूत भला हूँ। इन दो पाटों के बीच में वो टुकड़े-टुकड़े हो जाने हैं, कहीं का नहीं बचूँगा और हमारी चक्की ही ऐसी है जिसमें दो पाट नहीं दो हज़ार पाट हैं। प्रतिपल एक नया प्रभाव हमारे जीवन में शामिल है। लगातार कोई नया मालिक हमें गुलाम बनाने को आतुर है और हम बन जाते हैं, लगातार। इसी की परिणीति है तनाव।

तनाव से मुक्त होने और हमारी उर्जा को पुनः प्राप्त करने के लिए, प्रकृति ने एक अन्तर्निहित व्यवस्था बनाई है, जो है निद्रा। किसी हद तक, निद्रा तुम्हारी थकान मिटाती है। लेकिन प्रायः शरीर प्रणाली में तनाव रह जाता है।उस प्रकार के तनावों को काबू में रखने के लिए प्राणायाम और ध्यान के तरीके हैं। ये तनाव और थकान से मुक्ति देते हैं, क्षमता बढ़ाते हैं, तुम्हारे तंत्रिका तंत्र और मन को मज़बूत बनाते हैं। ध्यान केन्द्रीकरण नहीं है। ये एक गहरा विश्राम है और जीवन को एक अधिक विशाल दृष्टि से देखना है, जिस के तीन स्वर्णिम नियम हैं – “मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैं कुछ नहीं करता हूँ और मैं कुछ नहीं हूँ।”

आपको अल्बर्ट आइंस्टीन के बारे में क्‍या लगता है? सेब के पेड़ के नीचे बैठा उसका मन यहां-वहां भटक रहा था। तभी उसके मन में यह विचार आया। जब आप वास्‍तव में अपने मन को भटकने के लिए छोड़ देते हैं, तो रचनात्‍मक रस का प्रवाह होता है। जबकि सीमित विचार और विचारों की जंजीर में फंसा मन कभी भी नए और रचनात्मक सोच का उत्पादन नहीं कर सकता हैं। हां, शुरू में यह पागल विचार की तरह लग सकता है, लेकिन सबसे अच्छा विचार पहली बार में हमेशा पागलों सा ही लगता है। भविष्य की सोच में व्यस्त रहने के कारण मन का भटकाव सबसे अधिक होता है। हम हमेशा कल क्या होने वाला है पर विचार करते हैं। भविष्य के बारे में मन का भटकना अच्‍छे विचारों को आकार और संभल कर योजना बनाने में मदद करता है। सुनिश्चित तौर पर भविष्य की घटनाओं पर विचार का हमारे जीवन पर एक बहुत ही नाटकीय प्रभाव हो सकता है।अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने की क्षमता और दबाव के अंदर रहने और आपके प्रदर्शन के बीच सीधा-सीधा संबंध है। टैलेंट स्मार्ट की एक रिसर्च के मुताबिक, बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले 90 प्रतिशत लोग तनाव के वक्त में शांत बने रहने के लिए अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने में कुशल होते हैं। इसका मतलब, सफल लोग तनावभरी परिस्थितियों में अधिक शांत रहते हैं।पॉजिटिव बनें रहने से आपका दिमाग तनाव मुक्त होकर किसी चीज पर ध्यान लगा सकता है। आपको मुश्किल वक्त में कुछ ऐसा सोचने के लिए ढूंढना होगा जो पॉजिटिव हो। कोई भी पॉजिटिव बात सोचने से आपका दिमाग फिर से ध्यान लगाने लगेगा। जब आपका मूड अच्छा होगा तो आपके साथ सब अच्छा होगा।

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