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क्या है जिनेवा कन्वेंशन,जिसके कारण भारत के वीर सैनिक अभिनंदन को पाकिस्तान ने छोड़ा

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संजय कुमार सुमन

Sk.suman379@gmail.com

हाल ही में भारत ने पाकिस्तान के बालाकोट में जैश-ए-मुहम्मद के कैंप के खिलाफ कार्रवाई की थी जिसके प्रतिक्रियास्वरूप पाकिस्तानी एयरफोर्स ने भी भारतीय सैन्य स्थल पर कार्रवाई कर दी।भारतीय वायुसेना के पायलट को पाकिस्तान चाहकर भी हाथ नहीं लगा सकता। इसकी वजह है इंटरनेशनल प्रोटोकॉल। नियमों के मुताबिक, किसी देश का कोई सैनिक अगर दुश्मन देश में बंदी बना लिया जाता है, तो उस पर कुछ इंटरनेशनल प्रोटोकॉल लागू हो जाते हैं।कहा जाता है कि भारत ने पाकिस्तान से विंग कमांडर अभिनंदन की रिहाई की मांग जिनेवा कन्वेंशन, 1949 के तहत किया है।अब हर लोगों की जुबान पर जिनेवा कन्वेंशन का नाम है।जिनेवा कन्वेंशन को लेकर चर्चाओं का बाजार भी गर्म है।हर लोगों की अपने-अपने विचार,अपने-अपने तर्क हैं और अपने ज्ञान की बदौलत इसकी परिभाषा दे रहे हैं।आखिर क्या है जिनेवा कन्वेंशन।चलिए आज हम आपको बताते हैं जिनेवा कन्वेंशन के बारे में।

1864 और 1949 के बीच जिनेवा में संपन्न जिनेवा कन्वेंशन कई अंतर्राष्ट्रीय संधियों की एक ऐसी श्रृंखला है जो युद्धबंदियों (Prisoners of War-POW) और नागरिकों के अधिकारों को बरकरार रखने हेतु युद्ध में शामिल पक्षों को बाध्यकारी बनाती है।जिनेवा कन्वेंशन में चार संधियाँ और तीन अतिरिक्त प्रोटोकॉल (मसौदे) शामिल हैं, जिनका मकसद युद्ध के वक्त मानवीय मूल्यों को बनाए रखने के लिये कानून तैयार करना है।1949 के समझौते में शामिल दो अतिरिक्त प्रोटोकॉल 1977 में अनुमोदित किये गए थे।

दुनिया के सभी देश जिनेवा कन्वेंशन के हस्ताक्षरकर्त्ता हैं। हालिया घटनाक्रम भी जिनेवा कन्वेंशन के दायरे में आता है क्योंकि जिनेवा कन्वेंशन के प्रावधान शांतिकाल, घोषित युद्ध और यहाँ तक कि उन सशस्त्र संघर्षों में भी लागू होते हैं जिन्हें एक या अधिक पक्षों द्वारा युद्ध के रूप में मान्यता नहीं दी गई हो।

युद्धबंदियों हेतु प्रावधान

इंटरनेशनल कमेटी ऑफ रेड क्रास के मुताबिक जेनेवा समझौते में युद्ध के दौरान गिरफ्तार सैनिकों और घायल लोगों के साथ कैसा बर्ताव करना है इसको लेकर दिशा निर्देश दिए गए हैं।युद्धबंदी के साथ अमानवीय बर्ताव नहीं किया जाएगा और उसे किसी भी तरह से प्रताड़ित या फिर उसका शोषण नहीं किया जाएगा।जिनेवा कन्वेंशन के तहत कोई भी देश अपने युद्धबंदी को न तो अपमानित कर सकता है और न ही डरा-धमका सकता है।कोई देश युद्धबंदी से उसकी जाति, धर्म या रंग-रूप के बारे में नहीं पूछ सकता और अगर कोशिश की भी जाए तो युद्धबंदी अपने नाम, सर्विस नंबर और रैंक के अलावा कुछ भी अन्य जानकारी नहीं देगा।हिरासत में लेने वाला देश युद्धबंदी के खिलाफ संभावित युद्ध अपराध का मुकदमा चला सकता है, लेकिन उस हिंसा की कार्रवाई के लिये नहीं जो अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानूनों के तहत आती हो।किसी देश का सैनिक जैसे ही पकड़ा जाता है उस पर यह संधि लागू हो जाती है।

कन्वेंशन के अनुसार, युद्ध खत्म होने पर युद्धबंदी को तुरंत रिहा किया जाना चाहिये।युद्धबंदियों के साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जाएगा। कन्वेंशन के अनुच्छेद 3 के अनुसार, युद्धबंदियों का सही तरीके के इलाज किया जाएगा।कोई भी देश अपने युद्धबंदी के साथ ऐसा व्यवहार नहीं कर सकता जिससे कि जनमानस के बीच किसी तरह की उत्सुकता पैदा हो।जिनेवा कन्वेंशन के तहत युद्धबंदी को उचित भोजन दिया जाना चाहिये और हर तरह से उसकी देखभाल की जानी चाहिये।

बता दें कि जेनेवा समझौते के तहत पाकिस्तान भारत के पायलट को नुकसान नहीं पहुंचा सकता।युद्धबंदियों के अधिकारों को बरकरार रखने के जेनेवा समझौते में कई नियम दिए गए हैं।जेनेवा समझौते में चार संधियां और तीन अतिरिक्त प्रोटोकॉल (मसौदे) शामिल हैं, जिसका मकसद युद्ध के वक्त मानवीय मूल्यों को बनाए रखने के लिए कानून तैयार करना है।मानवता को बरकरार रखने के लिए पहली संधि 1864 में हुई थी।इसके बाद दूसरी और तीसरी संधि 1906 और 1929 में हुई। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1949 में 194 देशों ने मिलकर चौथी संधि की थी।इंटरनेशनल कमेटी ऑफ रेड क्रास के मुताबिक जेनेवा समझौते में युद्ध के दौरान गिरफ्तार सैनिकों और घायल लोगों के साथ कैसा बर्ताव करना है इसको लेकर दिशा निर्देश दिए गए हैं।

इसमें साफ तौर पर ये बताया गया है कि युद्धबंदियों के क्या अधिकार हैं।साथ ही समझौते में युद्ध क्षेत्र में घायलों की उचित देखरेख और आम लोगों की सुरक्षा की बात कही गई है।जेनेवा समझौते में दिए गए अनुच्छेद 3 के मुताबिक युद्ध के दौरान घायल होने वाले युद्धबंदी का अच्छे तरीके से उपचार होना चाहिए.
युद्धबंदियों  के साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार नहीं होना चाहिए। उनके साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए।साथ ही सैनिकों को कानूनी सुविधा भी मुहैया करानी होगी।जेनेवा संधि के तहत युद्धबंदियों को डराया-धमकाया नहीं जा सकता। इसके अलावा उन्हें अपमानित नहीं किया जा सकता। इस संधि के मुताबिक युद्धबंदियों पर मुकदमा चलाया जा सकता है। इसके अलावा युद्ध के बाद युद्धबंदियों को वापस लैटाना होता है।

जेनेवा अभिसमय शब्द का प्रयोग युद्ध में सम्मिलित लोगों की समस्याओं, पीड़ा तथा युद्ध या सशस्त्र वैमनस्यताओं के क्षेत्र को सीमित करने के उद्देश्य से वर्ष 1864 और 1949 के मध्य जेनेवा (स्विट्जरलैंड) में सम्पन्न सभी संधियों के लिये किया जाता है। युद्ध में घायल लोगों की दशाओं में सुधार के लिये 1864 के जेनेवा अभिसमय में ये प्रावधान थे-घायल और बीमार सैनिकों के इलाज में संलग्न सभी संस्थाओं को ध्वस्त करने और उनके कार्मिकों को बंदी बनाने पर रोक; सभी लड़ाकुओं के लिए निष्पक्ष स्वीकृति और इलाज की व्यवस्था; घायलों की सेवा में संलग्न सभी नागरिकों को सुरक्षा तथा समझौते में निर्दिष्ट लोगों और सामानों की पहचान के लिये रेड क्रॉस संकेत की स्वीकृति। 1864 के अभिसमय को द्वितीय जेनेवा अभिसमय, 1906 के द्वारा संशोधित और विस्तृत किया गया। तृतीय जेनेवा अभिसमय, 1929-युद्ध बंदियों के साथ व्यवहार से संबंधित अभिसमय-में शत्रु देशों के द्वारा युद्ध बंदियों के साथ मानवीय व्यवहार, उनके संबंध में सूचनाएं प्रदान करने तथा तटस्थ देशों द्वारा बन्दी शिविरों के निरीक्षण की सुविधा प्रदान करने के प्रावधान सम्मिलित किये गये।

लिहाजा, युद्धरत इस देश के अधिकार क्षेत्र में आने वाले व्यक्तिगत नागरिकों की रक्षा के लिये विस्तृत प्रावधानों की व्यवस्था की गई है।
1977 में रेड क्रॉस द्वारा प्रायोजित सम्मेलन में 1949 के जेनेवा अभिसमयों के लिये दो अतिरिक्त प्रोटोकॉलों को अपनाया तथा अनुमोदित किया गया, ये दो प्रोटोकॉल हैं-अंतरराष्ट्रीय सशस्त्र विद्रोह के पीड़ितों से संबंधित प्रोटोकॉल (प्रोटोकॉल I) तथा गैर-अंतरराष्ट्रीय सशस्त्र विद्रोह के पीड़ितों से संबंधित प्रोटोकॉल (प्रोटोकॉल II)। ये प्रोटोकॉल आत्मनिर्णय आंदोलन या जन-विद्रोह में सम्मिलित छापामार सैनिकों को हेग और जेनेवा अभिसमयों के तहत प्राप्त सुरक्षा को और अधिक विस्तृत करते हैं।लड़ाकुओं  में थल सेना, नौसेना और वायु सेना के नियमित सैनिक होते हैं, साथ ही अनियमित सैन्य बालों, जिसमें नागरिक सेना,स्वयंंसेेवी दल, छापामार सैन्य दल तथा संगठित प्रतिरोधी आंदोलन भी सम्मिलित होते हैं, के सदस्य भी इस श्रेणी में सम्मिलित होते हैं, बशर्ते कि वे कुछ शतों को पूरा करते हों। कानूनी लड़ाकू युद्ध के नियमों, कार्यो तथा अधिकारों के अधीन होते हैं; पकड़े जाने पर वे युद्ध बंदियों को प्राप्त सुविधाओं का दावा कर सकते हैं, जबकि गैर-कानूनी लड़ाकू इन सुविधाओं से वंचित होते हैं।

जेनेवा संधि से जुड़ी मुख्य बातें 

🔹जेनेवा समझौते में दिए गए अनुच्छेद 3 के मुताबिक युद्ध के दौरान घायल होने वाले युद्धबंदी का अच्छे तरीके से उपचार होना चाहिए।

🔹युद्धबंदियों (POW) के साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार नहीं होना चाहिए उनके साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए साथ ही सैनिकों को कानूनी सुविधा भी मुहैया करानी होगी।

🔹इसमें साफ तौर पर ये बताया गया है कि युद्धबंदियों (POW) के क्या अधिकार हैं,साथ ही समझौते में युद्ध क्षेत्र में घायलों की उचित देखरेख और आम लोगों की सुरक्षा की बात कही गई है।

🔸 इस संधि के तहत घायल सैनिक की उचित देखरेख की जाती है।

🔸इस संधि के तहत उन्हें खाना पीना और जरूरत की सभी चीजें दी जाती है।

🔸इस संधि के मुताबिक किसी भी युद्धबंदी के साथ अमानवीय बर्ताव नहीं किया जा सकता।

🔹किसी देश का सैनिक जैसे ही पकड़ा जाता है उस पर ये संधि लागू होती है. (फिर चाहे वह स्‍त्री हो या पुरुष)

🔸संधि के मुताबिक युद्धबंदी को डराया-धमकाया नहीं जा सकता।

🔹युद्धबंदी की जाति,धर्म, जन्‍म आदि बातों के बारे में नहीं पूछा जाता।

जेनेवा संधि के प्रमुख चार चरण इस प्रकार हैं:-

प्रथम चरण 1864 जिनेवा कन्वेंशन

  • पहला जेनेवा कन्वेंशन सम्मेलन 22 अगस्त 1864 को हुआ था
  • इसमें चार प्रमुख संधि व तीन प्रोटोकॉल का उल्लेख किया गया है।
  • इसमें युद्ध के दौरान घायल और बीमार सैनिकों को सुरक्षा प्रदान करना था।
  • इसके अलावा इसमें चिकित्सा कर्मियों धार्मिक लोगों व चिकित्सा परिवहन की सुरक्षा की भी व्यवस्था की गई।

दूसरा चरण 1906 का जेनेवा कन्वेंशन

  • इसमें समुद्री युद्ध और उससे जुड़े प्रावधानों को शामिल किया गया
  • इसमें समुद्र में घायल, बीमार और जलपोत वाले सैन्य कर्मियों की रक्षा और उनके अधिकारों की बात की गई

तीसरा चरण 1929 का जेनेवा कन्वेंशन

  • यह युद्ध के कैदियों यानी युद्ध बंदियों पर लागू हुआ है जिन्हें प्रिजनर ऑफ वाॅर कहा गया है।
  • इस कन्वेंशन में कैद की स्थिति  और उनके स्थान की सटीक रूप से परिभाषित किया गया है।
  • इसमें युद्ध बंदियों के श्रम,वित्तीय संसाधनों का ज़िक्र और राहत और न्यायिक कार्रवाई के संबंध में व्यवस्था की गई है।
  • इसमें युद्ध बंदियों को बिना देरी के रिहा करने का भी प्रावधान किया गया है।

चौथा चरण 1949 का जेनेवा कन्वेंशन

  • इसमें युद्ध वाले क्षेत्र के साथ-साथ वहां के नागरिकों का संरक्षण का भी प्रावधान किया गया।
  • इसमें युद्ध के आसपास के क्षेत्रों में भी नागरिकों के अधिकारों के संरक्षण का प्रावधान किया गया है ताकि किसी भी नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन ना किया जा सके।

चौथा जेनेवा कन्वेंशन के नियम व कानून 21 अक्टूबर 1950 से लागू किए गए।

वर्तमान में जेनेवा कन्वेंशन को मानने वाले देशों की सदस्य संख्या 194 है

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