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साहित्य में आज पढ़िए सलिल सरोज को ,ये धुँध छँट जाए तो फिर चेहरा देखना….

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ये धुँध छँट जाए तो फिर चेहरा देखना
धूप सेंकता हुआ कोई चाँद सुनहरा देखना

उनसे मिल आईं तो हवा ये बतियाती हैं
गर्म चाय की प्याली में ढ़लता कोहरा देखना

निकलो तुम जो कभी अलसाये सवेरों में
ओंस से अपने बदन धोते हुए पेड़ हरा देखना

रखना गर ख्वाहिश कभी तो ऊँची ही रखना
हुश्न ही नहीं,हुश्न का हुनर भी गहरा देखना

जो आँख खुल जाए कभी आधी रातों में
बेटी के सिरहाने में परियों का पहरा देखना

ये तमाशा रोज यहाँ होता है,तुम भी देखना
लाउडस्पीकरों की बस्ती में हर कोई बहरा देखना

लगता है कि कोई नई जिंदगी तामील होगी
घर के मुँडेरों पर कोई कबूतर ठहरा देखना

सरहद के उस पार भी इंसान ही बसते हैं
हो यकीन तो कभी खुशी से हाथ लहरा देखना

 

 

सलिल सरोज

मुखर्जी नगर,नई दिल्ली

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