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पार्टी के अन्दर घुटन महसूस हो रही है-पूर्व सांसद पूर्णिया उदय सिंह

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उदय सिंह उर्फ़ पप्पू सिंह 

आपकी बात,कोसी टाइम्स@पूर्व सांसद पूर्णिया 

यह मेरी पार्टी को क्या हो गया कि डर के मारे आत्मसमर्पण हीं कर डाला। 40 सीटों में से मात्र 17 सीटों पर लड़ने का फैसला अत्यन्त ही दुखद और चिन्ताजनक हैै और ऐसा प्रतीत होता है कि पार्टी नेतृत्व को आदरणीय नरेन्द्र मोदी जी के लोकप्रियता पर शंका होने लगी है। जमीनी हकीकत से दूर, गांवो की बदहाली से दूर और कार्यकर्ताओं की भावनाओं से दूर जिस व्यक्ति के भरोसे हम बिहार में आगामी लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं उसका परिणाम निश्चित रूप से दुःखद होगा। अपने घर में रह रहे पुराने मित्रों को बाहर का दरवाजा दिखलाकर विरोधी बना लिया और बाहर रह रहे प्रखर विरोधियों को घर में लाकर सिंहासन पर बैठा दिया। इससे जहाॅ एक ओर हमारी पार्टी की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगता है वहीं हमारी नीति और नीयत दोनो पर संदेह होने लगता है। हम सभी कार्यकर्ताओं ने पूरी लगन के साथ पिछले पाॅच वर्षों में पार्टी का आधार बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास किया परन्तु एक ही गलत निर्णय से यह परिश्रम पानी में चला गया। कहने के लिए तो हम बिहार सरकार के हिस्सा हैं परन्तु हकीकत यह है कि इस गाड़ी का चालक कोई और है और हम मात्र गाड़ी के सफाई करने वाले कर्मचारी हैं। हमारे कार्यकर्ताओं को तो यह भी अनुभव नहीं हो रहा है कि वह विरोधी दल के कार्यकर्ता हैं या फिर सरकारी दल के कार्यकर्ता है, किसी कार्यकर्ता का कोई उचित कार्य किसी भी स्तर पर नहीं हो रहा है। यही भूल हमने पहले भी की थी और फिर दूहरा रहे हैं, पता नहीं निर्णय लेने वालों की क्या मंशा है? जहाॅ तक पूर्णिया और मेरे लोकसभा चुनाव लड़ने का प्रश्न है, मैंने तो पूर्व से ही घोषित कर दिया है कि मैं पूर्णिया से ही चुनाव लड़ूंगा। रोजाना किसी न किसी माध्यम से भिन्न-भिन्न प्रकार के समीकरण प्रकाशित किये जाते हैं जिससे क्षेत्र के सभी लोगों की परेशानी और कष्ट बढ़ जाता है। जब मेरी पार्टी ने 17 सीटों पर ही लड़ने की आत्मघाती निर्णय ले ही लिया है तो कम से कम इन सीटों की औपचारिक घोषणा तो कर दें ताकि यह संशय की स्थिति समाप्त हो सके। अब तो यह स्थिति उत्पन्न हो गई है कि किसी को कुछ नहीं पता यहां तक कि सभी बड़े नेता जबाब देने से परहेज कर रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि जिन 17 सीटों पर हमलोग लड़ना चाहते हैं उन सीटों का चयन कोई और ही करके हमे दे दे और हमलोग बोलने लायक भी न रह जाय। मुझे पहली बार इतने वर्षों में पार्टी के अन्दर घुटन महसूस हो रही है और यदि मेरे दल ने आने वाले कुछ दिनो में स्थिति स्पष्ट नही की तो ऐसा न हो कि हमारे जैसे लोग खुली हवा की तलाश में दरवाजे से बाहर निकल जायें।

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