Home » गीत / गजल » फारबिसगंज के रवीश रमन रचित कविता- “मज़हबी रंग”

फारबिसगंज के रवीश रमन रचित कविता- “मज़हबी रंग”

Advertisements

“मज़हबी रंग”

कभी-कभी अजीब लगता है
देख कर हो जाता हूं दंग
मजहब बताने लगा है
हमारा और तुम्हारा रंग

देखो कहते है कितनी
अकड़ और शान से हम
भगवा हो गए हो तुम
हरा रंग है हम

भूल गए बचपन के दिन
खेला करते थे संग
न था कोई हमारा मज़हब
न था कोई हमारा रंग

सोचो अपने देश की
देखो प्रकृति के रंग
कुछ नही होता दोस्त
हमारा और तुम्हारा “मज़हबी रंग”

Comments

comments

x

Check Also

आधुनिक समाज शिल्पियों की सफल कथा

आमतौर पर समाज के सतह पर होने वाले राजनीतिक परिवर्तन लोगों को सहज दिख जाते हैं लेकिन रचनात्मक कार्यों के ...