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साहित्य में आज पढ़िए ऋतु सिंह को … मुझमे अभी जीने की चाहत बाकी है

लौट आओ ऐ ताजी हवा
मुझमे अभी जीने की चाहत बाकी है।
कब तलक यूँ तड़पा जाए
ख्वाहिशों की कई आहट बाकी है ।
जहर ही जहर है
ऐ हवा
तुझमें भी और मुझमें भी
हर जगह बस जहर बाकी है
लौट आओ ऐ ताजी हवा
मुझमें अभी जीने की चाहत बाकी है ।

रूह की बंदिशे
और जिस्म का खुलापन
खुदा भी छोड़ जाए खुदाई
अब बस यही कहर बाकी है,
लौट आओ ऐ ताजी हवा
मुझमें अभी जीने की चाहत बाकी है ।

कहते हैं कि उस डाल पर
कोई फूल ना खिलेगा अब
दिखने को शेष ठठरियाँ
और बस कसक बाकी है,
लौट आओ ऐ ताजी हवा
मुझमें अभी जीने की चाहत बाकी है ।

कहता है वो मुझसे
कि तेरी राहों से गुजरे ज़माना हो गया
पर इश्क़ की ख्वाहिश
बाअदब बाकी है,
लौट भी आओ ऐ ताजी हवा
मुझमें अभी जीने की चाहत बाकी है ।

 

 

ऋतु सिंह

मुज़फ़्फ़रपुर,बिहार.

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