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सकारात्मक सोच का महत्व

संजय कुमार सुमन 

समाचार सम्पादक@कोसी टाइम्स 

हम सबके जीवन में कठिन समय आता ही है। इस धरती पर आदिकाल से लेकर आज तक ऐसा कोई भी व्यक्ति पैदा नहीं हुआ, जिसे कभी न कभी कठिन समय ने नहीं घेरा हो। परंतु केवल एक ही चीज ऐसी है, जो हमें उस कठिन समय से निकलने में मदद कर सकती है और वह है हमारी सोच। हमारी सकारात्मक सोच हमारे सामने विषम परिस्थितियों को अलग तरीके से पेश करती है। आज की कहानी हमें इस दृष्टिकोण को समझने में मदद करेगी।सकारात्मक सोच सिर्फ़ हमे ही नही बल्कि हमारे आसपास के वातावरण को भी खुशनुमा बना देती है। कुछ ही समय पहले अमेरिका में एक सर्वे हुआ था, जिसमे यह बताया गया की सकारात्मक सोच वाले लोगों की उम्र नकारात्मक सोच वाले लोगों से ज़्यादा होती है। सकारात्मक सोच वाले लोगों का जीवन हर पल सुख, शांति, समृद्धि के साथ व्यतीत होता है। सकारात्मक सोच में एक जादुई शक्ति होती है जिसके कारण ऐसे लोग अपने सपनों को आसमान की उँचाइयो तक ले जाने में भी सक्षम होते है।

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सकारात्मक सोच, चंद शब्द नहींं है, जिसे थोड़े से शब्दों में समझाया जा सके कि ये क्या है, इसका जीवन में महत्त्व क्या है? ये ज़िंदगी का एक अहम पहलू हैं अगर सभी लोग इसको अपने जीवन में अपना लें, तो जीवन में कितने भी उतार चढ़ाव आयें उससे निकले का रास्ता भी मिल ही जाता है। परिस्थितियाँ कितनी ही विपरीत क्यों न हो मंज़िल ख़ुद-ब-ख़ुद मिल जाती है। बस ज़रूरत है जीवन में सकारात्मक सोच अपनाने की।सकारात्मक सोच निश्चित ही अच्छी है, परन्तु हमारी सोच तभी पूर्ण सकारात्मक हो सकती है जब हम न केवल अपनी सोच को अपितु अपने दृष्टिकोण को भी बदलें। अर्थात्, हम कैसे देखते हैं, इसके साथ-साथ हम कहाँ से देखते हैं, वह भी महत्वपूर्ण है।मान लीजिए हम किसी ऊँची इमारत के नीचे खड़े हैं, हम स्वयं को बौना महसूस करेंगे परन्तु यदि हम हवाई जहाज में बैठकर उसके ऊपर उड़ने लगे तो वही इमारत छोटी हो जाएगी। इमारत वही है परन्तु अब वह छोटी लगने लगी है। यह केवल सोच बदलने से नहीं अपितु दृष्टिकोण बदलने से हुआ है। अधिकांशतः दृष्टिकोण बदले बिना केवल सोच बदलने का प्रयास कल्पना होती है। जब तक हम उस ऊँची इमारत के नीचे खड़े रहेंगे हम उसे छोटी नहीं देख सकते।आपमें इच्छाशक्ति है तो सफलता आपको मिलेगी। आप औरों से अलग कर सकते हैं।अवसर आपके भीतर छिपा है, लेकिन उसे पहचानना होगा। कहावत है कि कामयाबी सड़क पर पड़ी नहीं मिलती, उसे हासिल करने के लिए लक्ष्य साधना पड़ता है और अवसर को सफलता में बदलना पड़ता है। इसलिए अपनी जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य के बारे में सोचिए और पता लगाइये कि भविष्य में आप क्या बनना चाहते हैं; क्योंकि बड़ी सफलता पाने के लिए यह अद्भुत समय है।

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प्रत्येक व्यक्ति आज कुछ अपने कुछ विशिष्ट संस्कारों और धारणाओं के अधीन है। इनके चलते उसकी सोच इतनी दृढ़ सी हो गयी है कि अचानक किसी परिवर्तन की बात पर वह भड़कता है, आसानी से राजी नहीं होता, या चाह कर भी खुद को बदल नहीं पाता। मेरे विचार से किसी को परिवर्तित होने के लिए कहना उसे उसकी पूर्वस्थापित सोच और अहं के विरुद्ध लगता है। …’परिवर्तन’ के स्थान पर यदि ‘शोधन’, ‘परिष्करण’, ‘निखारना’ (रिफाइनमेंट) आदि के लिए कहा जाये तो व्यक्ति के अहंकार पर कोई चोट नहीं होती। ..सत्य भी तो यही है कि हम यदि व्यक्तित्व और सोच आदि में ‘निखार’ लाने की कोशिश करें तो इस क्रम में जरूरी परिवर्तन भी अपनेआप हो ही जाते हैं। व्यक्ति, समाज या सोच की असली उन्नति के लिए ‘परिवर्तन’ की नहीं, बल्कि ‘रिफाइनमेंट’ या ‘निखारने’ की आवश्यकता है। ‘परिवर्तन’ शब्द में आलोचना का पुट है जबकि ‘रिफाइनमेंट’ या ‘बेटरमेंट/इम्प्रूवमेंट’ (और ज्यादा अच्छा बनो) शब्द जोश पैदा करते हैं। जरा सोचकर देखिये कि स्वयं की या अपने किसी करीबी की सोच को बदलने के लिए इनमें से कौन से शब्द मनोवैज्ञानिक तौर पर अधिक कारगर हैं?अगर सोच में परिर्वतन आ जाए तो जीवन जीने का आनंद और महत्व ही कुछ और होगा। सोच में परिर्वतन लाने से पहले व्यक्ति में ज्ञान या कोई घटना होना अती आवश्यक है। ज्ञान या घटना ना होने के कारण सोच में परिर्वतन लाना असम्भव है।

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हमारे पास दो तरह के बीज होते है सकारात्मक विचार एंव नकारात्मक विचार है, जो आगे चलकर हमारे दृष्टिकोण एंव व्यवहार रुपी पेड़ का निर्धारण करता है। हम जैसा सोचते है वैसा बन जाते है इसलिए कहा जाता है कि जैसे हमारे विचार होते है वैसा ही हमारा आचरण होता है।यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपने दिमाग रुपी जमीन में कौनसा बीज बौते है। थोड़ी सी चेतना एंव सावधानी से हम कांटेदार पेड़ को महकते फूलों के पेड़ में बदल सकते है।मैं आपको एक कहानी के  माध्यम से समझाने का प्रयास करता हूँ-

एक गाँव में गोलियथ नाम का एक ऱाक्षस था। उससे हर व्यक्ति डरता था एंव परेशान था। एक दिन डेविड नाम का भेंङ चराने वाला लङका उसी गाँव में आया जहाँ लोग राक्षस के आतंक से भयभीत थे।

डेविड ने लोगों से कहा कि आप लोग इस राक्षस से लङते क्यों नही हो?

तब लोगों ने कहा – “वो इतना बङा है कि उसे मारा नही जा सकता”

डेविड ने कहा – “आप सही कह रहे है कि वह राक्षस बहुत बड़ा है लेकिन बात ये नही है कि बङा होने की वजह से उसे मारा नही जा सकता, बल्कि हकीकत तो ये है कि वह इतना बङा है कि उस पर लगाया निशाना चूक ही नही सकता।“

फिर डेविड ने उस राक्षस को गुलेल से मार दिया। राक्षस वही था, लेकिन डेविड की सोच अलग थी।

जिस तरह काले रंग का चश्मा पहनने पर हमें सब कुछ काला और लाल रंग का चश्मा पहनने पर हमें सब कुछ लाल ही दिखाई देता है उसी प्रकार नेगेटिव सोच से हमें अपने चारों ओर निराशा, दुःख और असंतोष ही दिखाई देगा और पॉजिटिव सोच से हमें आशा, खुशियाँ एंव संतोष ही नजर आएगा।

यह हम पर निर्भर करता है कि सकारात्मक चश्मे से इस दुनिया को देखते है या नकारात्मक चश्मे से। अगर हमने पॉजिटिव चश्मा पहना है तो हमें हर व्यक्ति अच्छा लगेगा और हम प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई खूबी ढूँढ ही लेंगे लेकिन अगर हमने नकारात्मक चश्मा पहना है तो हम बुराइयाँ खोजने वाले कीड़े बन जाएंगे।

सकारात्मकता की शुरुआत आशा और विश्वास से होती है। किसी जगह पर चारों ओर अँधेरा है और कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा और वहां पर अगर हम एक छोटा सा दीपक जला देंगे तो उस दीपक में इतनी शक्ति है कि वह छोटा सा दीपक चारों ओर फैले अँधेरे को एक पल में दूर कर देगा। इसी तरह आशा की एक किरण सारे नकारात्मक विचारों को एक पल में मिटा सकती है।

सकारात्मक सोच की शक्ति, में पीएले ने दोषपूर्ण धार्मिक अवधारणाओं और आत्मनिष्ठक अर्थात् व्यक्तिपरक मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का उपयोग विश्‍वास और आशा के झूठे संस्करण को आगे बढ़ाने के लिए किया। उनका सिद्धान्त “स्व-सहायता” आन्दोलन का भाग है, जिसके द्वारा एक व्यक्ति मानवीय प्रयास, उचित मानसिक स्वरूपों और इच्छाशक्ति के साथ अपनी स्वयं की वास्तविकता को बनाए जाने का प्रयास करता है। परन्तु वास्तविकता सत्य है। लोग अपनी स्वयं की वास्तविकताओं को कल्पनाओं या सोच के द्वारा निर्मित नहीं कर सकते हैं। पीएले का सिद्धान्त दोषपूर्ण है, क्योंकि उसने इसे सत्य पर आधारित नहीं किया था।

सकारात्मक सोच की शक्ति के समर्थकों का दावा है कि उनके शोध, सिद्धान्त की वैधता का समर्थन करते हैं। यद्यपि, उनके आँकड़े व्यापक रूप से चर्चा के अधीन हैं। कुछ निष्कर्ष बताते हैं कि सकारात्मक दृष्टिकोण और प्रदर्शन के मध्य में एक सकारात्मक सम्बन्ध होता है, परन्तु यह सकारात्मक विचारों से निर्मित  होने वाले परिणाम एक दूर का स्वप्न है। शोध से पता चलता है कि जो लोग सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं, वे उन लोगों की तुलना में उच्च आत्मसम्मान और सर्वोत्तम अनुभव को प्राप्त करते हैं, जो निराशावादी दृष्टिकोण को रखते हैं। दूसरी ओर, इस विचार का समर्थन करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य नहीं पाए जाते है कि विचार परिणाम को नियन्त्रित कर सकते हैं। सकारात्मक सोच के द्वारा भविष्य को परिवर्तित के लिए कोई अन्तर्निहित शक्ति नहीं पाई जाती है।

एक बार देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि,

कठिन समय जीवन का अंग है, जिस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं। परंतु हमारा नियंत्रण स्वयं पर तो है, इसलिए कठिन समय को बदलने के बजाय अपने सोचने के तरीके को बदलिए। कठिन समय स्वतः ही समाप्त हो जायेगा।

यदि उनके इस वक्तव्य को हम अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें, तो हमें अपने जीवन में एक नयी अनुभूति की प्राप्ति होना तय है।आपके ज़िंदगी में भी कई नकारात्मक परिस्थितियाँ आयेंगी बस जरूरत है उन नकारात्मक परिस्थितियों में ख़ुद की शक्ति को पहचाने और नकारात्मक सोच को ख़त्म कर सकारात्मक सोचने की। उन परिस्थितियों से बाहर निकलने का प्रयास करने की। सफलता निश्चित आपके स्वयं मार्ग निर्मित कर देगी।

अगर आप ये सोच लें कि आप विपरीत परिस्थितियों से निकल सकते हैं, आपकी मंज़िल आपके सामने है, बस ज़रूरत होती है सिर्फ़ एक कदम बढ़ाने की, मंजिल ख़ुद-बख़ुद मिल जायेगी।अंत में मैं तो बस यही कहूँगा कि

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले

ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

 

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