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साहित्य”हूँ अचंभित”

हूँ अचंभित

हे विद्यानुरागी विजय!
तुम्हें कोटि-कोटि नमन!

थी चांद छूने की
चाहत तेरी भी
थी हौसलों में बंधी
तरंगें उड़ान की
थी चट्टान सी मजबूती
तेरे आत्मविश्वास में भी
थी मन की कोमलता
ऐसी कि
खिल उठे मुरझाए फूल भी
था ऐसा स्वाभिमान कि
सोचना पड़े गगन को भी।

प्रलय का प्रहार
कर ना पाया था तुम्हें
कभी प्रकंपित
पर आज असमय
तेरे जाने पर
हूँ अचंभित!
ओ स्वर्ग!
अगर है तू सचमुच
यह जान ले विजय अद्भुत
था माता-पिता का
सच्चा सपूत
करबद्ध निवेदन ओ स्वर्गदूत !
मुस्कान रहे सदा अक्षुण्ण
ओ देवदूत!

हे शिक्षानुरागी विजय!
शिक्षा के दीप जलाने
संबोधि के फूल खिलाने
आ जाना तू एकबार
तेरी राहों में बिछाकर पुष्प
करता रहूँगा इन्तज़ार।

 

प्रमोद कुमार सूरज

हिंदी शिक्षक
मोती लाल कुसुमलता उ.मा.विद्यालय चौघारा, सुपौल

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