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प्रीति भारती की कविता-एक दीया बन पाऊं

दीपक बनकर
जिस भी गली से गुजरुं
अंधेरा छटे
रौशनी फैले

कहने को रौशन
घर किसी और का होगा
दिल अपना भी
कम खुश न होगा

बंजारन भटकती
गाँव शहर
ढूंढती रहस्य
अबूझ जीवन का

सफल असफल
पैमाने सघन
बनूँ सहारा पथिक
चलूँ मैं… हो मगन

गीत संघर्ष का
हो जाये मधुर
हाँथ बढाऊँ और
दीया बन जाऊँ !

@प्रीति भारती

कटिहार, बिहार

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