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साहित्य:रौशन-ए-ज़िन्दगी

रौशन-ए-ज़िन्दगी

ग़ुरबत ही सही,उम्मीद-ए-अमीर हैं–
मिहनतकश हम हैं,यही हमारा ज़मीर है

होते हैं-होंगे , जहां में दौलतवाले–
शब-ए-हराम से बेहतर-हम फ़क़ीर हैं

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रौशन-ए-ज़िन्दगी ,मौज़-ए-सुकूँ
माटी में गुंथी हाथ की लकीर है

माटी की इबादत-करूँ रौनक-ए-लम्हा
पसीने की खुशबु से महकी जमीं ज़ागीर है

मुश्किल-ए-मशक़्क़त और फ़ितरत-ए-बे ग़म
नूर-ए-हँसी चेहरे पर,कुछ यूँ हमारी तस्वीर है

कुम्भार के लिए इमेज परिणाम

फ़र्क़ नहीं इससे क़े हम हिन्दू हैं या मुसलमाँ
फ़क़त करम-ए-कामगार हैं,ईमान हमारी तक़दीर है

हालात से रू-ब-रू– हमारी दुनियाँ खुश’रंजित’
मुतमईन हम हैं, हम ही राजा–हम ही वज़ीर हैं

रंजित तिवारी

कटिहार 

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