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बिजली की चकाचौंध के युग में कुम्हारों का व्यवसाय पड़ा धीमा

संजय कुमार सुमन

समाचार सम्पादक@कोसी टाइम्स

एक ज़माना था जब कुम्हार का समाज में अत्यंत सम्मान था और मिटटी के बर्तन व दीये भी धडल्ले से बिका करते थे।मिटटी के बर्तनो में ही खाना बनाया जाता था जो अत्यंत स्वादिष्ट होता था। पर्यावरण के लिए भी लाभदायक होता था। किन्तु आज कुम्हारों की दशा अत्यंत दयनीय है। आधुनिकता के इस दौर में भी दीये एवं डिबिये की परम्परा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। आज भी बिहार के लोग दिवाली के शुभ अवसर पर दीये जलाना नहीं भूलते हैं। हालांकि शहरी क्षेत्र में इसकी मांग कम हुई है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग दीये एवं डिबिया का ही उपयोग करते हैं। तभी तो दिवाली को लेकर समुदाय के लोगों द्वारा चाक चलाकर दिन भर मेहनत कर दीये एवं डिबिया बनाया जा रहा है।

खो गया है व्यवसाय

इस आधुनिक युग में मनुष्य को मिट्टी के गुणों की जानकारी का घोर अभाव है। जिसके कारण आज की नई पीढ़ी मिट्टी के बर्तनों का उपयोग नहीं करना चाहते हैं। पुराने समय में लोग मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाया करते थे और मिट्टी से बने घड़े या सुराही का पानी पिया करते थें। यही कारण है की पुराने समय के लोग स्वस्थ और अधिक जीवन जीते थें। शादी विवाह, जन्म उत्सव, पूजा-पाठ आदि अनेकों प्रकार के कार्यों में मिट्टी से बने बर्तनो का उपयोग करना अति आवश्यक समझा जाता था। इससे पर्यावरण को संतुलित रखने में मदद मिलती थी। यही कारन है कि पहले कुम्हार के दुकानों में खरीदारों की भीड़ लगी रहती थीं मगर आज के समय में लोग मिट्टी के बर्तनों की जगह प्लास्टिक और पॉलथिन का उपयोग कर रहें हैं। दीपावली पर्व में मिट्टी के दिये जलाने की जगह लोग चायनीज एवं विद्युत बल्बों का उपयोग करते हैं। इसका पर्यावरण को क्षति पहुँचती है। प्लास्टिक और पॉलथिन के उपयोग से लोग कई तरह की बिमारियों के चपेट में आ रहें हैं। मिट्टी के बर्तनों की बिक्री कम होने से कुम्हारों के आगे आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। बिजली की चकाचैंध के युग में कुम्हारों का व्यवसाय कहीं खो सा गया  है। बाजार में तरह-तरह के उपलब्ध सजावट की सामग्री के कारण इस धंधे से जुड़े लोगों की आर्थिक हालत डगमगाने लगी है। सस्ता और शुभ होनें के बाद भी लोग मिट्टी के दीपों से दूर होते जा रहे हैं। लोग अपने घर आंगन में दीये और डिबियों का कम से कम उपयोग करना चाहते हैं। मिट्टी के दीपों की जगह ले रहा है बिजली से जलनेवाले कैंडल और डिबियों की जगह झालर,चैन एवं अन्य एलईडी बत्ती। कुम्हारों के यहां लगने वाली भीड़ अब इलेक्ट्रानिक दुकानों की ओर मुड़ गयी है। वर्तमान समय कुम्हार समुदाय के लोग पुश्तैनी धंधे को छोड़कर रोजी-रोटी की तलाश में पलायन कर रहे हैं।

खत्म हो रही है परम्परा

आधुनिक समय में लोग स्वदेशी सामान के जगह विदेशी या चायनीज सामानो का उपयोग अधिक करते हैं। जिस प्रकार दीपावली पर्व में दिये को देखा जाए, तो कुम्हार द्वारा बनाए गए दिये की जगह लोग चायनीज दिये का प्रयोग अधिक मात्रा में करते हैं और सामान्यता देखा जाए तो कुम्हार के दिये से कम मूल्य में चायनीज दिये बाजार में मिल जाते हैं।  चायनीज वस्तु कीमत के साथ-साथ लोगों में आकर्षण का केंद्र भी बना रहता है। फलस्वरूप यह देखा जाता है कि कुम्हार के दिये की जगह चायनीज ज्यादा बिक्री होते हैं। जिस कारण कुम्हारों में अपनी मिटटी की कला के प्रति थोड़ी उदासीनता देखने को मिलती है।जिससे कुम्हारों का रोजगार समाप्त होता जा रहा है। कुम्हारों को मिट्टी के बर्तन,दिये,घड़ा एवं अन्य वस्तुओं को बनाने में जितना मेहनत लगता है। उसके अनुसार वस्तु का लागत मूल्य नहीं मिल पाता है। मूल्य नहीं मिलने के कारण ही बाजार में कुम्हार द्वारा बनाई गई मिट्टी के बर्तन बनाने में बहुत कम रूचि दिखाई देती है।पर्व त्योहार के होते आधुनिकीकरण से परम्पराएं टूट रही है। युगों से बनी आ रही मिट्टी के दीपों की परम्परा एवं महत्व समाप्त होने से इतना तो तय है कि पूर्वजों से मिली संपत्ति एवं संस्कृति साथ छूटती जा रही है। ऐसे में कुम्हारों की पहचान तो समाप्त हो जायेगी और उनकी जिदंगी उन्ही के चाक पर खत्म हो जायेगी।

नहीं रही कोई उम्मीद

चौसा के महेश पंडित,अर्जुन पंडित,कलासन के राम पंडित सुलक्षण देवी बताती है कि चाक चला कर मिट्टी सने हाथों से चाक को घुमा-घुमा कर अपनी जिदंगी की गाड़ी को आगे बढ़ा रहे हैं। यही उनकी आजीविका है। दीवाली का इंतजार इन कुम्हारों को काफी पहले से हुआ करता था लेकिन अब ये हतोत्साहित हो चुके है। कई उम्मीद एवं आशाएं लिये ये महीनों पूर्व तैयारी में जुट जाते थे लेकिन बीते पांच छह वर्षों से इन्हें ऐसा लग रहा है कि आधुनिकता के दौर में वे काफी पीछे छूट गये है। अब इनकी जिदंगी की गाड़ी किसी खास स्टेशन या सिग्नल पर रूक सी गयी है।

नहीं मिलती है सरकारी सहायता

दीवाली में दूसरों के घरों को रौशन करने वाला कुम्हार समुदाय के लोगों को सरकारी सहायता नहीं मिल पाती है। बावजूद इसके दो जून की रोटी एव परम्परा को कायम रचाने के लिये ये लोग पुश्तैनी धंधा को बचा कर रखें हुये है। कुम्हारों की माने तो इस महंगाई के दौर में भी बाजार में इसकी उचित कीमत नहीं मिल पाती है। इन्हे यदि सरकारी सहायता दी जाय तो इनके जीवन स्तर में सुधार हो सकता है।भारतीय संस्कृति ,साहित्य, धर्म एवम सामजिक क्षेत्र में कुम्हारों की कला कृतियों का मत्वपूर्ण स्थान रहा है। कुम्हार द्वारा निर्मित दीप, प्याला, घड़ा ,खिलौने आदि का उपयोग जन्म से मृत्यु तक किया जाता है। दीप,कलश के बिना जनमोत्स्व वैवाहिक कार्यक्रम एवम अन्य धार्मिक आयोजन अधूरा है। कुम्हार के द्वारा हस्त निर्मित बर्तनो उपयोग समाज में मनुष्य आजीवन करते रहतें हैं। दीप से लेकर अन्य मिट्टी के बर्तनो का विक्रय कर कुम्हार आजीविका चलाने का इतिहास गवाह है।कुम्हार दीवाली का बेसब्री से इंतजार करते थे ,पर आज के बदलती परिस्थितियों में कुम्हार द्वारा निर्मित दीप सहित अन्य मिट्टी के बने वस्तु का उपयोग नहीं करना चाहती। आधुनिक युग में प्लास्टिक के तरह-तरह के डिजाइनों वाले छोटे -छोटे बरतनों का उपयोग का होड़ मचा हुआ है। जिससे पर्यावरण प्रदूषित होती है। कुम्हारों द्वारा निर्मित मिट्टी के बर्तनो के विक्रय नहीं होने से उनकी यह वृति लुप्त हो गई है।कुम्हार चिंतित हो अन्य धंधे में लिप्त हो रहें हैं साथ ही रोज़गार की तलाश में पलायन कर रहे है। कुम्हार की इस वृति को जीवंत रखने के लिए उन्हें ना तो किसी भी प्रकार का सहयोग मिलता है और ना ही प्रोत्साहन। कुम्हार द्वारा निर्मित बर्तन का उपयोग भरपूर करना समाज का बहुत बड़ा दायित्व है।

 

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