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क्योंकि वो हारा नहीं, एक अजय विजेता है -प्रीति भारती

सब चले जा रहे हैं ,
अपनी मंज़िल की तलाश में ,
कुछ के लिए है मखमल का रस्ता ,
कुछ का है काँटों भरा |

प्रश्न है स्वाभाविक मेरा ,
क्यों अलग होता कारवां यहाँ ?
क्यों है इतनी भिन्नता हर जगह ?
और कष्ट अनेक , हर मोड़ पे ,

हीरे की खोज में ,
कालिख में लथ – पथ काया ,
जी – तोड़ परिश्रम करता है ,
तब जाकर उसका अस्तित्व निखरता है |

जान अलग है , सांस अलग है ,
समय चक्र एक पर ,
सामर्थ्य अलग है सबका ,
तभी तो भिन्न रंग दिखता है |

कुछ पाने के प्रयास में ,
काफी कुछ खो कर भी ,
खुद को पा लेना , संजोग नहीं !
कड़ी मेहनत का सबसे स्वादिष्ट भोग है |

मुसाफिर खड़ा अपने दम पर ,
स्वावलंबन का अभ्यास लिए ,
काफी दर्द समेंटे अपने अंदर ,
हर पल मुस्काता रहता है |

झुकना उसका स्वभाव नहीं ,
विवश्ता ही उसको गिराता है !
हाँथ जोड़ अगर निवेदन करता ,
उपहास न कर इस मानव का !

उपहार में कुछ देना ,
मुश्किल होता है अगर ,
उससे तीखे शब्द नहीं ,
बस थोड़ा मधुर बोल !

क्योंकि वो हारा नहीं ,
एक अजय – विजेता है ,
गिर कर उठना, उठकर संभलना,
जीना उसको आता है !

✍️ रचना-प्रीति भारती,कटिहार बिहार

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