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पत्रकार और समाज:एक सिक्का के दो पहलू

संजय ‘विजित्वर’

पत्रकारिता को पूजा ,यज्ञ, धारा,दर्पण इत्यादि शब्दों से परिभाषित करते हैं और पत्रकार पुजारी, यज्ञकर्ता, सचेतक , प्रहरी, शब्द-योद्धा इत्यादि नामों से सम्बोधित होते रहे हैं ।सच माने तो पत्रकार एक ऐसा यज्ञकर्ता है जो समाज में अपने शब्दों को अभिमंत्रित कर तन ,मन की आहूति देते रहा है ।समय-समय पर सक्षम होने पर धन की भी आहूति देने से नहीं कतराता है ।यह बिल्कुल सत्य है कि किसी भी उद्देश्य की पूर्ति व्यक्ति ,परिवार,समाज तथा देश को लेकर होता है और इस क्रम में पत्रकार और समाज के बीच निकट का सम्बन्ध होना स्वाभाविक है । अर्थात् दोनों एक सिक्का के दो पहलू हैं।पत्रकार की संवेदनशीलता ,लगनशीलता तथा व्यवहारिकता समाज की दशा एवं दिशा को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पत्रकार समाज में नव-आयाम स्थापित करने के लिए हरसंभव प्रयास करता है ।समाज की प्रत्येक सच्चाई को उजागर करने के लिए दृढ-संकल्पित होता है ।समाज की विसंगतियों को दूर करने के लिए उपाय ढूँढता है । किसी की निरंकुशता को सहन नहीं करता वरन् शब्द-चाबुक से सचेत करता है ।किसी भी परिस्थिति में सर्वजन-हिताय की सोच को मुखर बनाना चाहता है ।अर्थात् समाज को आदर्श रूप देने में दिन -रात चिन्तनशील रहता है ।

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आज पत्रकारिता के स्वरुप में चाहे जितना भी बदलाव हुआ हो ,मगर एक पत्रकार की सोच सदैव किसी समस्या के समाधान की ओर होती है ।सृजनात्मकता पत्रकार के लिए धरोहर है ।वह कभी भी,किसी भी परिस्थिति में विध्वंश नहीं चाहता ।पत्रकार समाज को सजाने तथा सँवारने में प्रयत्नशील रहता है ।पत्रकार की भावना तथा बुद्धि ऐक्य बनाने की होती है ।वास्तव में पत्रकार समाज का एक ऐसा हितैषी होता है जो दिन -रात यानी चौबीस घण्टा ‘ऑन डियूटी’ होता है ।समाज का परम कर्तव्य बनता है कि वह अपने हितैषी(पत्रकार) का पूरे मनोयोग से सम्मान करे ।उसके साथ कभी भी ,किसी भी परिस्थिति में दुर्व्यवहार न करे ,यातनाएँ न दे ।

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पत्रकारों के कार्यों में बाधा न पहुँचाएँ ,क्योंकि जब पत्रकार के साथ अमानवीय व्यवहार होगा ,बाधा पहुँचायी जाएगी तब आदर्श समाज की कल्पना अकारथ समझी जाएगी ।समाज की गतिशीलता पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लग जाएगा ।समाज के इस चौथे स्तम्भ को जितना प्रताड़ित किया जाएगा उतना ही नकारात्मक शक्तियाँ मुखर होंगी और समाज में उथल -पुथल मच जाएगा।आज की सामाजिक विसंगतियाँ विकराल बनती जा रही हैं और पत्रकारों की चुनौती भी काफी बढ गई है ।इस आर्थिक परिवेश में पत्रकारिता का कार्य आसान नहीं है ।

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अपनी अस्मिता को बचाये रखने में पत्रकार को नित्य नई चुनौती से सामना करना पड़ता है ।आर्थिक रूप से कमजोर प्रबन्धन के पत्रकारों की स्थिति तो अत्यंत दयनीय है ।सच माने तो उनका जीवन भगवान भरोसे टिका रहता है फिर भी कर्मवीर शब्द-योद्धा अथक चलता रहता है ।ऐसे में समाज का उदासीन तथा उग्र रवैया अच्छा नहीं माना जाएगा ।आखिर पत्रकार के जीवन की सुरक्षा कैसे होगी ? क्या पत्रकार इस समाज से आदर ,सम्मान तथा आर्थिक सहयोग का हकदार नहीं है ?सीधी -सी बात है कि जब पत्रकार समाज का हितैषी होता है तब समाज को भी उसके प्रति हितैषी बनकर व्यवहार करना चाहिए ।पत्रकारों पर अत्याचार होना समाज के लिए कदापि शुभ संकेत नहीं है ।इसपर समाज को सोचना होगा ।शासन -प्रशासन को भी पत्रकार के हितार्थ ठोस कदम उठाना चाहिए ताकि वह स्वतंत्र लेखनी को नव आयाम दे सके तथा आदर्शवाद की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान कर सके ।इनदिनों कई पत्रकारों के साथ अमानवीय घटनाएँ सामने आई हैं जो घोर निन्दनीय तथा चिन्तनीय है ।इसपर त्वरित रूप से शासन -प्रशासन को सोचना चाहिए तथा उचित उपाय ढूँढना चाहिए ताकि लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की अहमियत बनी रहे ।

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