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यात्रा वृतांत:दुनिया के सबसे पुराने गणराज्यों में से एक था वैशाली

संजय कुमार सुमन 
समाचार सम्पादक@कोसी टाइम्स 
**कोल्हुआ गाँव की यात्रा से 
 लिच्छवी गांव विश्व शांति स्तुप का भ्रमण करने के बाद अभिषेक पुष्करणी से लगभग 4 किलोमीटर उत्तर कोल्हुआ गाँव की ओर कदम बढ़ाया। लिच्छवी गांव विश्व शांति स्तुप से कोल्हुआ के लिए कोई सवारी नही मिली।स्थानीय लोगों ने कहा आराम से टहलते हुए चले जाइये।पर दुरी तय करना उतना आसान नही था तो मुश्किल भी नही था।मेरे साथ चल रहे कटिहार के पत्रकार मित्र रुपेश कुमार ने कहा चलिए सर,हसते खेलते और बातचीत करते पहुंच जायेंगे।कदम बढ़ाया तेज धुप के कारण हिम्मत नही होती थी सफर की पर चलना तो था ही।दो किलोमीटर चलने के बाद एक लडका को मोटर साईकिल पर अकेले आते देख रोका और आरजू कि हमदोनो को भी बिठा ले और कोल्हुआ तक पहुंचा दे वो सहर्ष तैयार हो गया।कुछ दुरी तय करने के बाद उसकी गाड़ी अचानक बंद हो गई,फिर उसे धन्यवाद देकर पैदल ही सफर को पूरा किया।

कोल्हुआ गाँव में बलुई पत्थर से बने सिंह स्तम्भ को देखने के लिए हमने पहले पुरातत्व विभाग के बने टिकट काउंटर से 25 -25 रु. का टिकट लिया और फिर गेट से अन्दर दाखिल हुए। अन्दर हरे-हरे घास और पेड़-पौधों की हरियाली के बीच सम्राट अशोक द्वारा निर्मित अशोक स्तम्भ गडा था। परिसर में प्रवेश करते ही खुदाई में मिला इँटों से निर्मित गोलाकार स्तूप और अशोक स्तम्भ दिखायी दे जाता है। एकाश्म स्‍तम्भ का निर्माण लाल बलुआ पत्‍थर से हुआ है। इस स्‍तम्भ के ऊपर घण्टी के आकार की बनावट है (लगभग 18.3 मीटर ऊँची) जो इसको और आकर्षक बनाता है। स्थानीय लोगों में लाट के नाम से प्रचलित यह स्तम्भ लगभग 11मी. ऊँचा है।यह सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए शुरुआती स्तंभों में से एक है जिस पर उनका कोई अभिलेख नहीं है।

यहां खुदाई में ईशा पूर्व छठी शताब्दी से मुगलकाल तक के साक्ष्य मिले हैं। यहां की सुरक्षा दीवार का निर्माण तीन चरणों, शुंग, कुषाण और गुप्त काल में किए जाने के साक्ष्य मिले हैं।कोल्हुआ में भगवान बुद्ध ने कई वर्ष बिताए थे। यहीं पर उन्होंने पहली बार भिक्षुणियों को संघ में प्रवेश करने की अनुमति प्रदान की। वैशाली की राजनर्तकी आम्रपाली को बुद्ध ने यहीं पर भिक्षुणी बनाया था। कोल्हुआ में ही बुद्ध ने अपने शीघ्र संभावित परिनिर्माण की घोषणा की थी।

इसके उपरी भाग में एक उलटे कमल दल की आकृति पर एक चौकोर पत्थर रखा है।  इस पर उत्तर दिशा की ओर बैठे एक सिंह की आकृति बनी है। लगता है यह स्तम्भ सिंह सहित एक ही पत्थर का बना है,क्योंकि देखने पर इसके पत्थरों के जुड़ाव का कही कोई निशान नही मिलता है। पुरातत्त्व विद्वान कनिंघम ने इस पत्थर स्तम्भ को उखाड़ने का पूरा प्रयास किया था,पर वह इसमें असफल रहे।

इसलिए ऐसा लगता है यह स्तम्भ जमीन की सतह से काफी नीचे तक गड़ा हुआ है।  स्तम्भ के ठीक सामने पक्के ईटों से बना एक विशाल स्तूप है,जो वानर-प्रमुख द्वारा भगवान् बुद्ध को मधु अर्पित करने की घटना का प्रतीक है।  यह मूलतः मौर्यकाल में बना था,परन्तु इसका विकास कुषाणकाल में हुआ और इस स्तूप के चारों ओर एक चौड़े सड़क का निर्माण किया गया,जिसे प्रदक्षिणा पथ कहा जाता है।

यहीं अशोक स्तम्भ के ठीक सटे दक्षिण किनारे पर पक्के ईटों का बना सरोवर है।  स्थानीय लोगों के अनुसार,इसे वानरों ने भगवान बुद्ध के लिए बनाया था।  इस कारण इसे बंदरों का सरोवर या मर्कट हद भी कहते है।  इसके बारे में कहा जाता है कि एक बार भगवान बुद्ध यहाँ ठहरे थे।

उन्होंने कुछ दिनों का उपवास रखा था और जिस दिन उनको उपवास ख़त्म करना था,उसी दिन कुछ बन्दर निकल कर आये और उनके भिक्षापात्र को उठा कर ले गये फिर कुछ ही देर में उसमे लीची एवं मधु भरकर उनके सामने रख दिया।  बौद्ध-साहित्य में यह एक बहुत ही बड़ी घटना मानी जाती है।

 भारत 1950 में एक गणराज्य बना।  ऐसे में आज के दिन इस बात को याद करना भी रोमांच से भर देता है कि आज के भारत में करीब 2700 साल पहले विश्व के सबसे पहले गणराज्यों में से एक गणराज्य वैशाली में मौजूद था।भ्रमण के दौरान श्रीलंका और जापान के कई सेलानी मिले। इच्छा हुई यादगार के रूप में फोटो हो जाय । मेरे हाथ में कमल का फुल देख कर काफी खुश हो गई और एक फुल मांग ली। पाकर काफी खुश हुई। बदले में वो मुझे भारतीय नोट दस रूपये देने लगी। मना करने पर पास खड़ी एक गरीब महिला जो पार्क में मजदूरी करती थी उसे दे दिया। इसके बाद एक फोटो के लिए जब उसे बोला तो वो सहर्ष तैयार हुई । फिर क्या था मित्र रुपेश ने कई फोटो खींच ली। फोटो लेने के बाद वो खुश होकर थैंक्स बोली । फिर हमलोगों आगे बढ़े।

बिहार की राजधानी पटना से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर वैशाली स्थित है । यह भगवान बुद्ध के पहले से ही लिच्छवी गणराज्य की राजधानी थी जिसे दुनिया के प्राचीनतम गणराज्य होने का गौरव प्राप्त है।  इस गणराज्य का काल खंड सात से छह शताब्दी ईशा पूर्व का है।

वैशाली के बसाढ़ में राजा विशाल के गढ़ के अवशेष हैं । यह लगभग 480 मीटर लंबा और 230 मीटर चौड़ा है।

अशोक स्तंभ

मौर्य और गुप्त राजवंश में जब पाटलीपुत्र (आधुनिक पटना) राजधानी के रूप में विकसित हुआ, तब वैशाली इस क्षेत्र में होने वाले व्यापार और उद्योग का प्रमुख केंद्र था। भगवान बुद्ध ने वैशाली के समीप कोल्हुआ में अपना अंतिम संबोधन दिया था। इसकी याद में महान मौर्य महान सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दि ईसा पूर्व सिंह स्तंभ का निर्माण करवाया था। महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के लगभग 100 वर्ष बाद वैशाली में दूसरे बौद्ध परिषद का आयोजन किया गया था। इस आयोजन की याद में दो बौद्ध स्तूप बनवाए गए। वैशाली के समीप ही एक विशाल बौद्ध मठ है, जिसमें महात्मा बुद्ध उपदेश दिया करते थे। भगवान बुद्ध के सबसे प्रिय शिष्य आनंद की पवित्र अस्थियां हाजीपुर (पुराना नाम- उच्चकला) के पास एक स्तूप में रखी गयी थी।महात्मा बुद्ध के अंतिम उपदेश की याद में सम्राट अशोक ने वैशाली में सिंह स्तंभ की स्थापना की थी। पर्यटकों के बीच सिंह स्तंभ बेहद लोकप्रिय है। अशोक स्तंभ को स्थानीय लोग  भीमसेन की लाठी कहकर भी पुकारते हैं। यहीं पर एक छोटा सा कुंड है जिसको रामकुंड के नाम से जाना जाता है। पुरातत्व विभाग ने इस कुण्ड की पहचान मर्कक.हद के रूप में की है। कुण्ड के एक ओर बुद्ध का मुख्य स्तूप है और दूसरी ओर कुटागारशाला है। संभवत: कभी यह भिक्षुणियों का प्रवास स्थल रहा है।

वैशाली के ही कोल्हुआ में भी एक अशोक स्तंभ है।  स्थानीय लोगों में लाट के नाम से जाने जाने वाला यह स्तंभ बलुआ पत्थर का बना है जो कि करीब 11 मीटर ऊंचा चमकदार स्तंभ है।  यह सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए शुरुआती स्तंभों में से एक है जिस पर उनका कोई अभिलेख नहीं है।

राजा विशाल का गढ़
महाभारत काल के राजा ईक्ष्वाकु वंशज राजा विशाल के नाम पर वैशाली का नाम रखा गया हुआ है। राजा विशाल का गढ  एक छोटा टीला के रुप में दिखाई देता है जिसकी परिधि एक किलोमीटर है। इसके चारों तरफ दो मीटर ऊंची दीवार है जिसके चारों तरफ 43 मीटर चौड़ी खाई है। कहा जाता है कि यह प्राचीनतम संसद है। इस संसद में 7,777 संघीय सदस्य  इकट्ठा होकर समस्याओं को सुनते  और उस पर बहस भी किया करते थे। यह स्थान आज भी पर्यटकों को भारत के लोकतांत्रिक प्रथा की याद दिलाता है।

स्वतंत्रता आन्दोलन के समय वैशाली

पूर्वी भारत में मुस्लिम शासकों के आगमन के पूर्व वैशाली मिथिला के कर्नाट वंश के शासकों के अधीन रहा लेकिन जल्द ही यहाँ बख्तियार खलजी़ का शासन हो गया।तुर्क-अफगान काल में बंगाल के एक शासक हाजी इलियास शाह ने 1345 ई से 1358  ई तक यहां शासन किया। बाबर ने भी अपने बंगाल अभियान के दौरान गंडक तट के पार अपनी सैन्य टुकड़ी को भेजा था। 1572  ई॰ से 1574  ई॰ के दौरान बंगाल विद्रोह को कुचलने के क्रम में अकबर की सेना ने दो बार हाजीपुर किले पर घेरा डाला था। 18 वीं सदी के दौरान अफगानों द्वारा तिरहुत कहलानेवाले इस प्रदेश पर कब्जा किया। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय वैशाली के शहीदों की अग्रणी भूमिका रही है। आजादी की लड़ाई के दौरान 1920, 1925 तथा 1934 में महात्मा गाँधी का वैशाली में आगमन हुआ था। वैशाली की नगरवधू आचार्य चतुरसेन के द्वारा लिखी गयी एक रचना है जिसका फिल्मांतरण भी हुआ एवं जिसमे अजातशत्रु की भूमिका श्री सुनीलदत्त के द्वारा निभायी गयी है। यहां खुदाई में ईशा पूर्व छठी शताब्दी से मुगलकाल तक के साक्ष्य मिले हैं। वैशाली के इन तमाम स्थानों को देखते और इसके इतिहास को समझते, पता ही नही चला समय कैसे इतनी जल्दी पार हो गया।  ऊपर आसमान में भी पंछी अपने घोसलों की ओर उड़ान भर रहे थे और अब हमें भी वापस हाजीपुर  पहुँचने की जल्दी थी।

वैशाली में बौद्ध रेलिक स्तूप भी है. यह स्तूप भगवान बुद्ध के पार्थिव अवशेषों पर बने आठ मौलिक स्तूपों में से एक है.
 वैशाली में बौद्ध रेलिक स्तूप भी है। यह स्तूप भगवान बुद्ध के पार्थिव अवशेषों पर बने आठ मौलिक स्तूपों में से एक है।
देखें वीडियो
https://youtu.be/ZQzYYxifQ5M
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