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यात्रा वृतांत:वैशाली की ऐतिहासिक धरोहर,केवल बिहार को नहीं बल्कि पूरे विश्व को नाज़ है

संजय कुमार सुमन 

समाचार सम्पादक@कोसी टाइम्स 

वैशाली लिच्छवी से लौट कर 

वैशाली! जन का प्रतिपालक, गण का आदि विधाता,
जिसे ढूँढता देश आज, उस प्रजातंत्र की माता।

रुको, एक क्षण पथिक! यहाँ मिट्टी को शीश नवाओ,
राज सिद्धियों की समाधि पर फूल चढ़ाते जाओ।

डूबा है दिनमान, इसी खॅंडहर में डूबी राका,
छिपी हुई है यहीं कहीं धूलों में राजपताका।

ढूँढो उसे, जगाओ उनको जिनकी ध्वजा गिरी है;
जिनके सो जाने से सिर पर काली घटा घिरी है।

प्रख्यात कवि रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियां वैशाली पर लिखी गई है जो शत-प्रतिशत सही है। बिहार का कितना विकास हुआ है वो तो मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ही बेहतर जानते होंगे। लेकिन बिहार के बदहाली के लिए जिम्मेदार भी राजनेता ही हैं। कुदरत ने बिहार को ऐसे-ऐसे अनमोल धरोहरों से नवाज़ा है जिसका उपयोग ठीक से किया जाता तो शायद विशेष राज्य का दर्जा मांगने की नौबत ही न आती। बिहार के बदहाली पर फिर कभी चर्चा करेंगे फिलहाल मैं आपको बिहार के एक ऐसे जिले के विषय में बताने जा रहा हूँ, जो विश्वविख्यात है। जिसकी ऐतिहासिक धरोहर पर न केवल बिहार को बल्कि पूरे देश को नाज़ है।

जी हां मैं बात कर रहा हूं वैशाली की। आपको जानकर हैरत होगा कि वैशाली में ही विश्व का पहला गणतंत्र कायम हुआ था। लिच्छीवियों के संघ ;अष्टकुलद्ध द्वारा गणतांत्रिक शासन व्यवस्था की शुरूआत वैशाली से की गई थी। लगभग छठी शताब्दि ईसा पूर्व में यहाँ का शासक जनता के प्रतिनिधियों द्वारा चुना जाने लगा और गणतंत्र की स्थापना हुई। अत: दुनियाँ  को सर्वप्रथम गणतंत्र का ज्ञान कराने वाला स्थान वैशाली ही है। आज वैश्विक स्तर पर जिस लोकतंत्र  को अपनाया जा रहा है वह यहाँ के लिच्छवी शासकों की ही देन है।

इतिहास को पढने के बाद मन में बड़ी इच्छा पनपती रही वैशाली की धरती को नमन करने की। कई बार चाह कर भी ना जा सके। बीच में कोई ना कोई समस्या अवश्य ही आ जाती थी। बिहार में पत्रकारों के साथ हो रही मारपीट,हत्या,प्रताड़ना को लेकर हाजीपुर और वैशाली जाने का मौका मिला।सोचा क्यों ना विश्व शांति स्तुप और लोकतंत्र की धरती को नमन कर लिया जाय। साथ में फलका कटिहार के मित्र रुपेश कुमार से मन्त्रणा कर चल दिया।हाजीपुर पहुंचने पर सोचा पड़ाव किसी होटल में डाल दूँ पर मेरे अभिन्न मित्र साहित्यकार डा संजय विजीत्वर के आगे मेरा कुछ नही चला। अंततः उन्ही के यहाँ पड़ाव डालना पड़ा। हाजीपुर से 45 किलोमीटर की दुरी कम ही थी लेकिन जब भगवान महावीर की जन्म स्थली की ओर रुख किया तो छोटी सवारी ही मिली।जाने की ख़ुशी से मैं फुला नही समा रहा था चुकी वर्षों से सोचा हुआ आज हकीकत में बदलने वाला जो था। वैशाली उतरने के बाद पैदल ही निकल पड़ा।वैशाली में मैंने क्या देखा इस पर विस्तृत जानकारी देना उचित समझता हूँ ताकि कोसी टाइम्स के पाठक भी इससे रु-ब-रु हो सके। 

सर्वप्रथम श्रीलंका मन्दिर मिला,प्रवेश किया पता चला यहाँ श्रीलंका के बुद्दिषित लोगों को रहने का स्थान है।कई विदेशी सेनानियों को देखा।धीरे-धीरे आगे बढ़ा कई गाड़ी बच्चों की देखी जो शैक्षणिक परिभ्रमण के लिए जा रही थी।  शांति स्तुप जाने वाली सडक पर सैकड़ों बच्चों में ख़ुशी से झूमते देखा,शायद देखने की ख़ुशी हो।सडक के किनारे दुकान सजे थे जिसमें स्थल से सम्बन्धित सामग्री,पुस्तक के अलावे अन्य सामग्री भी बेचीं जा रही रही थी कुछ बच्चे खरीद भी रहे थे।मेरा भी मन से बच्चों की तरह जोश में था।सडक से गुजरने के क्रम में देखा कि विश्व गणतंत्र की जननी वैशाली अपने इतिहास के उज्जवल धरोहर को अपनी आगोश में छिपाए आज भी सिसक रही है। विकास के नाम पर यहां के लोगों को दंश के सिवा कुछ नहीं मिला। हर मामले में पिछड़ा यह इलाका आज भी सर्वांगिण विकास की बाट जोह रहा है। वैशाली पहुंच कर यह कल्पना करना भी कठिन जान पड़ता है कि ढाई हजार वर्ष पूर्व पहले यह नगरी संपन्न और प्रभावशाली गणराज्य की राजधानी थी। 23 अप्रैल 1956 को तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के वैशाली में कहे गए शब्द यहां के आम लोगों की जिंदगी को देखकर ही कहे गए थे। भारत सरकार एवं बिहार सरकार के मंत्रियों द्वारा कितनी घोषणाएं की गयी अब यहां के लोग भूल गए हैं।

शांति स्तुप  में प्रवेश के लिए यहाँ कोई निर्धारित नही थी,नि:शुल्क था। हमने भी प्रवेश किया।  हर एक लम्हे को अपनी यादों में समेटते और बीच-बीच में वैशाली के बारे में एक दुसरे से बातें कर, अपनी जानकारियों का दायरा बढ़ाते हुए हमसभी अपने इस सफ़र पर लगातार आगे बढ़ रहे थे ।इस तरह, वैशाली के बारे में चर्चा करते हुए आखिर वो घडी भी आ गयी जिसका हमसभी को इन्तजार था। हम लोग इसकी धरती पर पहली बार कदम रखने जा रहे थे, और हमारी आँखों के सामने दिख रहा था राजा विशाल का गढ़। सडक के दोनों किनारे पार्क।  मन देखकर कर प्रसुफुल्लित और आनंद से भर गया। उपर से वर्षा की बूंदा बूंदी। सोचा बारिश होगी तो शायद घूम ना पाउँगा पर ईश्वर की मेहरबानी थी कि केवल बूंदा बूंदी ही रही। घुमने का आन्नद आया।

इसका इतिहास काफी रोचक और व्यापक है। मानव सभ्यता के उदयकाल में यहीं आर्यों और अनार्यों ने आपसी सहयोग का सिद्धांत बनाया था। यहीं वैष्णव और शैव विचारधाराओं का मेल हुआ था एवं समुंद्र-मंथन की मंत्रणा भी यहीं की गयी थी। ऋग्वेद संहिता का पहला क्रम महर्षि बाभ्रव्य ने यहीं निरुपित किया था। वैदिक ऋषियों में महर्षि पुलस्त, वृहस्पति, संवर्त, दीर्घात्मा, उत्तात्य और मंकन के यहाँ आश्रम थे. यहीं वृहस्पति के पुत्र भारद्वाज ऋषि का जन्म हुआ था। वाल्मीकि रामायण के  अनुसार सिधाश्रम से जनकपुर जाते समय महर्षि विश्वामित्र और लक्ष्मण के साथ भगवान राम भी यहाँ आये थे।भगवान महावीर की जन्म स्थली होने के कारण जैन धर्म के  माननेवालों  के लिये वैशाली एक पवित्र स्थल है। भगवान बुद्ध का  तीन बार इस पवित्र स्थल पर आगमन हुआ। महात्मा बुद्ध के समय 16 महाजनपदों में वैशाली का स्थान मगध के समान महत्वपूर्ण था। बौद्ध तथा जैन धर्मों के अनुयायियों के अलावा ऐतिहासिक पर्यटन में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के लिए भी वैशाली महत्वयपूर्ण है।

वैशाली की भूमि न केवल ऐतिहासिक रूप से समृद्ध है वरन कला और संस्कृलति के दृष्टिकोण से भी काफी धनी है। वैशाली जिला के चेचर ;श्वेतपुरद्ध से प्राप्त मूर्तियाँ तथा सिक्के पुरातात्विक महत्व के हैं। वैशाली, करीब 600 ईसवीं पूर्व में शक्तिशाली लिच्छवी गणराज्य की राजधानी थी ।यहीं लोकतंत्र की स्थापना हुयी थी, इसलिए इसे लोकतंत्र की जननी  (Mother of Democracy) भी कहा जाता है। इस नगर को जैनधर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर की जन्मस्थली होने का गौरव प्राप्त है, वहीँ इसका भगवान बुद्ध और बौद्धधर्म से भी पुराना संबंध रहा है।

भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के अनेक वर्ष यहीं व्यतीत किये और अंत में अपने निर्वाण की घोषणा भी इसी वैशाली में की ।इनके जीवन से संबंधित आठ अनोखी घटनाओं में से एक बन्दर द्वारा इन्हें मधु भेंट करना यहीं घटित हुई। साथ ही, यह द्वितीय बौद्ध संगीति के आयोजन का भी साक्षी रहा है।

भागवत महापुराण के अनुसार राजा विशाल, विशाल वंश के एक महान प्रतापी राजा थे। इन्होंने ही विशालापुरी नामक नगर की स्थापना की,इसलिए इन्हीं के नाम पर इस नगर का नाम विशाला, फिर विशालापुरी और अंत में वैशाली हो गया। राजा विशाल का यह गढ़ वास्तव में प्राचीन ईटों से बना एक विशाल टीला है,जो करीब 60 एकड़ में फैला है। यहाँ के स्थानीय लोगों से बात करने के क्रम में पता चला कि यही वह स्थान है जो पुराने समय में वैशाली का पार्लियामेंट हुआ करता था। यहीं 7777 जनप्रतिनिधि एक साथ बैठ कर राज्य की समस्याओं का समाधान निकाला करते थे।

यहाँ के पुराने ईटों पर चलते हुए ऐसा लग रहा था मानों बिखरे पड़े ये अवशेष जनहित से जुड़ी उन दिनों के ऐतिहासिक निर्णयों की वो दास्ताँ बयां कर रहे है,जो सदियों पहले यहाँ लिए जाते थे। यहाँ अभी तक जो भी खुदाइया हुयी है,उससे कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अवशेष निकले है,जिन्हें कोलकाता,पटना और वैशाली के म्यूजियम में रखा गया है।

बौद्ध स्तूप

बौद्ध स्तूपों  का पता 1958 की खुदाई के बाद चला। भगवान बुद्ध के राख पाए जाने के कारण यह स्थान  बौद्ध अनुयायियों के लिए काफी महत्वपूर्ण है। भगवान  बुद्ध के पार्थिव अवशेष पर बने आठ मौलिक स्तूपों में से यह एक है। बौद्ध मान्यता के अनुसार भगवान बुद्ध के महा परिनिर्वाण के पश्चात कुशीनगर के मल्लों द्वारा उनके शरीर का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया तथा अस्थि अवशेष को आठ भागों में बांटा गया। जिसमें से एक भाग वैशाली के लिच्छवियों को भी मिला था। शेष सात भाग मगध नरेश अजातशत्रु कपिलवस्तु के शाक्यए अलकप्प के बुलीए रामग्राम के कोलिय बेटद्वीप के एक ब्राह्मण तथा पावा एवं कुशीनगर के मल्लों को प्राप्त हुए थे।वैशाली में बौद्ध रेलिक स्तूप भी है। यह स्तूप भगवान बुद्ध के पार्थिव अवशेषों पर बने आठ मौलिक स्तूपों में से एक है।बौद्ध मान्यता के अनुसार बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अस्थि अवशेषों को आठ भागों में बांटा गया जिसमें से एक भाग वैशाली के लिच्छवियों को भी मिला था।यह पांचवीं सदी ईशा पूर्व का करीब 8 मीटर व्यास वाला मिट्टी का स्तूप है।

विश्व शांति स्तूप

राजा विशाल के इस गढ़ को देखने के बाद हम सभी आगे बढ़े और पहुंचे वर्ल्ड पीस पैगोडा यानि विश्व शांति स्तूप।जापान के विश्व शांति के प्रवर्तक और निप्पोनजी म्योहेजी के अध्यक्ष परम पूज्य निचिदात्सु फुजीई गुरु जी के 66 वें जन्म दिवस समारोह के अवसर पर बिहार के महामहिम राज्यपाल डाँ ए. आर. कीदवई द्वारा 20 अक्टूबर 1886 को विश्व शांति स्तूप का शिलान्यास किया गया। विश्व शांति स्तूप का उदघाटन भारत के महामहिम राष्ट्रपति डाँ शंकर दयाल शर्मा के कर कमलो द्वारा 23 अक्टूबर 1996 को किया गया। बौद्ध समुदाय द्वारा बनवाया गया विश्व शांति स्तूप  गोल घुमावदार गुम्बद अलंकृत सीढियां और उनके दोनों ओर स्वर्ण रंग के बड़े सिंह जैसे पहरेदार शांति स्तूप की रखवाली कर रहे
प्रतीत होते हैं। सीढियों के सामने ही ध्यानमग्न बुद्ध की स्वर्ण प्रतिमा दिखायी देती है। शांति स्तूप के चारों ओर बुद्ध की भिन्न-भिन्न मुद्राओं की अत्यन्त सुन्दर मूर्तियां ओजस्विता की चमक से भरी दिखाई देती हैं। इसे विश्‍व शांति स्‍तुप के नाम से भी जाना जाता है, वास्‍तव में यह वैशाली का अनूठा घटक है। इसका निर्माण, जापानी बौद्ध के निपोप्‍जंन मयोहोजी सम्‍प्रदाय ने करवाया था। यह स्‍तुप, शांति का प्रतीक है। यहां के फूजी गुरूवार जी ने अपना पूरा जीवन यहां, विश्‍व शांति के लिए समर्पित कर दिया है। शांति का संदेश देने के लिए उन्‍होने वैशाली में एक पैगोडा की स्‍थापना की। यह शांति के मंदिर के लिए एक उपयुक्‍त स्‍थान है। इस स्‍तुप का व्‍यास 65 फीट का है और इसके स्‍तुप का आकार 125 फुट लंबा है। स्‍तुप में भगवान बुद्ध के अवशेष, सोने के गहने और कांच का काफी सामान रखा है।

इसका उदेश्य प्रेम एवं शांति का उपदेश देना और पृथ्वी पर पवित्र भूमि का सृजन करना था। इन्ही के निर्देशन में जापानी संस्था ‘निप्पोनजी म्योहोजी’ और ‘राजगीर बुद्ध विहार सोसायटी’ ने मिलकर यहाँ विश्व शांति स्तूप का निर्माण किया।यहाँ की सबसे खास बात यह है कि इसके नींव एवं कंगूरे को सोने से पालिश कर इसमें गौतम बुद्ध के अवशेषो को सुशोभित किया गया है । इस गोल स्तूप में लगे विभिन्न अवस्थाओं में भगवान बुद्ध की भव्य और सुन्दर प्रतिमाओं को देख अन्दर से हमारे मन में भी एक असीम सी शांति महसूस हो रही थी। उस वक़्त ऐसा लगा मानों हमारे पास अचानक एक पॉजिटिव सी एनर्जी आ गयी हो और इसी शक्ति से अभिभूत हम आगे बढ़े। बौद्ध मान्यताओं के अनुसार बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद कुशीनगर के मल्लों द्वारा उनके शरीर का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया तथा अस्थि अवशेषों को 8 भागों में बांटा गया,इसमें से एक भाग वैशाली के लिच्छवियों को भी मिला था।

भगवान बुद्ध के मिले उन अस्थि-अवशेषों पर करीब 5वीं शती ई.पू. में 8.07 मी. व्यास वाला मिट्टी का एक छोटा सा स्तूप बना दिया गया,जिसका पुन: मौर्य,शुंग, व कुषाण कालों में पक्की ईटों से विस्तार किया गया,फलत: इस स्तूप का व्यास बढ़ कर 12 मी. हो गया। इस स्तूप का उत्खनन काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान, पटना द्वारा 1938 ई. में किया गया था।इस खुदाई से एक प्रस्तर-मंजूषा मिली, जिसमें भगवान बुद्ध के शरीरावशेष के अतिरिक्त एक कौड़ी,कुछ मनके,सोने की पत्ती के टुकड़े तथा तांबे की मुद्रा रखी हुयी थी। वर्त्तमान में यह मंजूषा पटना संग्रहालय में रखी गयी है।इस जगह और यहाँ के इतिहास से परिचित होने के बाद हम फिर आगे बढ़े और पहुंचे वैशाली संग्रहालय।दस रूपये का टिकट लेकर संग्रहालय में प्रवेश किया। अभिषेक पुष्करणी के उतरी किनारे पर स्थित इस म्यूजियम की स्थापना, स्थानीय वैशाली संघ द्वारा संचालित संग्रहालय के विलय के साथ 1971 ई. में हुयी थी।इसमें वैशाली के प्राचीन टीलों के उत्खनन तथा सतह से प्राप्त पुरावशेषों का संग्रह है,जो लगभग 6 शताब्दी से 12वी शती से सम्बन्धित है।यहाँ पत्थर की प्राचीन मूर्तियाँ,पशु-पक्षी की आकृतियाँ,हाथी-दांत तथा सीप से बनी वस्तुएं काफी सहेज कर रखी गयी हैं। इसके अलावा, यहाँ संग्रहित पुराने समय में प्रयोग किये जाने वाले पत्थरों के आभूषण,मुद्राएं,रजत व कांस्य के सिक्कों ने हमें काफी आकर्षित किया। म्यूजियम के अन्दर  पुराने पर सुन्दर और कलात्मक चीजों को अपने कैमरे में कैद किया। हमने जी भर कर वहां के हर एक वस्तु को देखा, जो हमें अपने अतीत से रु-ब-रु करा रही थी।म्यूजियम से बाहर आने पर कुछ बच्चों ने निवेदन किया सर ये फुल ले लो । पूछा फुल क्या करूंगा,वो कुछ नही बोला पर चेहरा लटक सा गया । मेरे मित्र रुपेश ने कहा कि सर कमल का फुल है ले लीजिये गरीब बच्चे की बात रख लीजिये। ना चाहते हुए भी फुल लेने का मन बनाया। फिर लडके से पूछा कितने रूपये लोगे तो कहा दस रूपये। उसकी ख़ुशी के लिए फुल खरीद लिया और मित्र रुपेश ने कहा सर एक फोटो याद के लिए। फुल लेकर बाहर निकलने पर कुछ छोटे-छोटे बच्चो के बीच बाँट दिया जो अपने मम्मी-पापा के साथ भ्रमण के लिए साथ आया था।

विदेशियों ने वैशाली को संवारा

यहां अब तक हुए विकास में विदेशियों का योगदान कहीं अधिक है। बौद्ध देश जापान के सहयोग से यहां भव्य शांति स्तूप का निर्माण हुआ। कई देशों की भक्त मॉनेस्ट्री वैशाली के सौंदर्य को बढ़ाने का काम किया। रैलिक स्तूप, सुंदर उद्यान जहां विदेशी सहयोग से फलीभूत हुआ। वहीं जैन संप्रदाय के लोगों ने उनकी जन्मस्थली बासोकुंड में भव्य मंदिर एवं मूर्ति का निर्माण कराया।

यहाँ से बाहर निकलने पर हमने देखा की हमारे साथ-साथ सूरज भी अपनी यात्रा पूरी करने की जल्दी में बड़ी तेजी से पश्चिम की ओर भाग रहा था।शाम होने वाली थी और हमसब भी अपने सफ़र के अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुके थे। इस आखिरी मोड़ पर अब बारी थी उस ऐतिहासिक अशोक स्तम्भ की, जिसे देखने की ललक ने ही हमें यहाँ आने पर विवश किया था।कदम आगे बढ़ें…..

क्रमश:

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