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स्वतंत्रता दिवस पर विशेष:क्या सचमुच हम आजाद है?

संजय कुमार सुमन 
समाचार सम्पादक@कोसी टाइम्स 

दुष्यंत की ये पंक्तियां आज भी प्रासंगिक हैं। आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश में कई वर्ग ऐसे हैं जिन्हें आज भी अपनी आजादी का इंतजार है।जी हां! यह बात कटु जरूर है, लेकिन सत्य है। जहां आज हम 72 वां स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारियां कर रहे हैं, वहीं इसमें बहुत कुछ परतंत्र भी है। इतने सालों की आजादी के बाद भी हम वास्तव में नहीं हुए हैं। कहने को, सुनने को हम आजाद दिख सकते हैं, लोगों के सामने अपनी प्रशंसा दिखाने और प्रशंसा पाने के लिए ऐसा भ्रम भी रच सकते हैं। लेकिन यह पूरी तरह सत्य नहीं हैं।

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आज भी आप भारत देश के किसी भी‍ कोने में चले जाएं, कहीं न कहीं इस बात की सत्यता को जरूर परखेंगे। चाहे वो बात नेता-राजनेताओं, हमारे घर-परिवार, रिश्तेदारों की बात हो या फिर वर्किंग कल्चर की बा‍त हो। इस बात को आप नकार नहीं पाएंगे कि वास्तव में जो दिखता है, वैसा होता नहीं है…।
देश में बढ़ता भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, भुखमरी, कुपोषण तथा गरीबी के कारण आजादी शब्द के मायने खत्म होते जा रहे हैं। जहां की जनता अपने लिए भर पेट भोजन जुटाने के काबिल भी नहीं वहां आजादी की बातें भी बंधन में जकड़ती महसूस होती हैं। इन अभावों के साथ कैसे कहें कि हम आजाद हैं। आज हम कहीं नक्सलवाद से लड़ रहे हैं तो कहीं आतंकवाद से, कहीं जातिवाद से तो कहीं भ्रष्टाचार से, और तो और हमारे देश की अधिकतर महिलाएं तो सिर्फ अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही हैं।लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया पर हमले और पत्रकार की हत्या हो रहे हैं। इंसान कब हैवान बन जाए, इसका कुछ पता नहीं। दूध पीती बच्ची को भी अपनी हवस का शिकार बनाने से लोग नहीं चूक रहे हैं। हालिया मुजफ्फरपुर की घटनाएं ही महिलाओं की आजादी की पोल खोलने के लिए काफी हैं। देश की आधी आबादी को इंतजार है उस आजादी का, जो उनकी प्रतिभा को पनपने के पूर्ण अवसर दें, देश की बहन-बेटियों को इंतजार है उस आजादी का, जहां वे बेखौफ रहकर अपने सम्मान की रक्षा कर पाएं। हमारे आजाद भारत में हमारे ही परिवार का महत्त्वपूर्ण हिस्सा आज भी लड़ रही हैं उस आजादी के लिए जो स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी उनसे दूर है। हमारे यहां उन्हें समानता का अधिकार देना तो दूर एक आम नागरिक होने तक का सम्मान प्राप्त नहीं है। इसलिए बार-बार उनके अस्तित्व व आत्मसम्मान को कुचला जाता है। सच कहना और सच लिखने की सजा पत्रकारों को मिल रही है।
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कहने को तो हम देश में रहते हैं, हम दर्शाते भी ऐसा ही हैं कि हम जैसे स्वतंत्र विचारों वाले, खुली सोच वाले, खुले दिल वाले इंसान इस‍ दुनिया में और कोई नहीं है। लेकिन हकीकत पर जब हम गौर करें तो नजारा कुछ और ही होता है, कुछ और ही दिखाई पड़ता है। एक तरफ सत्ताधारी नेताओं द्वारा अपराधियों के साथ ‍किए गए गठजोड़ कई असामाजिक कार्यों को अंजाम दे रहे हैं फलस्वरूप दंगों, विस्फोटों और दुर्घटनाओं से देश त्रस्त है और बात करते हैं स्वतंत्रता की।

आज भी भार‍त पर एक प्रश्नचिह्न लगा हुआ है! अगर सचमुच देश स्वतंत्र है, है तो फिर उस आजादी की, उस स्वतंत्रता की सही मायने में क्या परिभाषा होनी चाहिए, यह आम आदमी की सोच से परे है।
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स्वतंत्रता का अर्थ यह कतई नहीं है कि स्वच्छंद होकर मनमानी की जाए। अपनी मर्यादा को भूलकर सरेआम अनैतिक कृत्य किए जाएं। देश के सभी लोग स्वतंत्रता का सही-सही आशय समझें। नेता वर्ग और आम जनता भी अपनी सीमाएं खुद तय करें। पराए बेटा-बेटी को भी दिल से अपना मानें। क्या सही क्या गलत- यह करने से पूर्व सोचें तभी स्वतंत्रता का असली आनंद उठाया जा सकता है। और फिर तब हम गर्व से कह सकेंगे कि ‘हम भारतीय होने के साथ-साथ स्वतंत्र भी हैं।’
आज भी देश का पिछड़ा वर्ग जातिवाद का दंश झेल रहा है। सरकार व व्यवस्था से चोट खाए लोग नक्सली बन रहे हैं। आए दिन किसी न किसी मुद्दे पर सरकार विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं। नए राज्यों की मांग देश के टुकड़े कर रही है। वहीं देश के नेता सब कुछ जानकर भी अनजान बनकर चैन की नींद सो रहे हैं। ये लोग हजारों करोड़ का भ्रष्टाचार कर जनता को छल रहे हैं। तो ऐसे में क्या ये आज की जरूरत नहीं है कि दुष्यंत की पंक्तियों से सीख लेते हुए हम सबको मिलकर व्यवस्था को बदलने की एक प्रभावी पहल करनी होगी। और इस सुधार की पहल पहले किसी एक से ही होगी। पहले किसी एक को ही अपनी जिम्मेदारी व कर्तव्य को समझना होगा तभी बाकी सभी लोग इस मुहिम में शामिल हो पाएंगे और तभी हम समझ पाएंगे आजादी के सही मायने। इस बदली व्यवस्था से ही मिलेगी हमारी आजादी, हमारी स्वाधीनता।
किसी भी देश की आजादी तब तक अधूरी होती है, जब तक वहां के नागरिक आजाद न हों। आज क्यों इतने सालों बाद भी हम गरीबी में कैद हैं, क्यों जातिवाद की बेड़ियां हमें आगे बढ़ने से रोक रही हैं?, क्यों आरक्षण का जहर हमारी जड़ों को खोखला कर रहा है? क्यों धर्म जो आपस में प्रेम व भाईचारे का संदेश देता है वही, आज हमारे देश में वैमनस्य बढ़ाने का कार्य कर रहा है, क्यों हम इतने सहनशील हो गये हैं कि कायरता की सीमा कब लांघ जाते हैं, इसका एहसास भी नहीं कर पाते?

यह एक कटु सत्य है कि 1947 में जब देश आजाद हुआ तो हमारे देश की सत्ता उन हाथों में थी, जिन्‍होंने देश को भ्रष्‍टाचार में आकंठ डुबो दिया, जिनके कारण आज भी हमारे देश में गरीबी एक मुद्दा है। आज देश हित में बोलना,  देश की संसद पर हमला करने वाले और जेहाद के नाम पर मासूम लोगों की जान लेने वाले आतंकियों को सज़ा देना, भारत माता की जय बोलना, संविधान की प्रतियाँ जलाना,शहीद सैनिकों के हितों की बात करना असहिष्णुता की श्रेणी में आता है, किन्तु इशारत जहां और अफजल गुरु सरीखों को शहीद बताना,भारत तेरे टुकड़े होंगे-टुकड़े होंगे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बन गई है।

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यकीनन इस प्रकार तर्कों को प्रस्तुत किया जाता है कि आम आदमी उन्हें सही समझने की भूल कर बैठता है। बौद्धिक आतंकवाद का यह धीमा जहर पिछले 72  सालों से भारतीय समाज को दिया जा रहा है और हम समझ नहीं पा रहे।दरअसल, जीवन पथ में आगे बढ़ने के लिए बौद्धिक क्षमता की आवश्यकता होती है। इतिहास गवाह है युद्ध सैन्य बल की अपेक्षा बुद्धि बल से जीते जाते हैं।किसी भी देश की उन्नति अथवा अवनति में कूटनीति एवं राजनीति अहम भूमिका अदा करते हैं। पुराने जमाने में सभ्यता इतनी विकसित नहीं थी, तो एक दूसरे पर विजय प्राप्त करने के लिए बाहुबल एवं सैन्य बल का प्रयोग होता था। विजय रक्त रंजित होती थी।जैसे-जैसे मानव सभ्यता का विकास होता गया। मानव व्यवहार सभ्य होता गया, जिस मानव ने बुद्धि के बल पर सम्पूर्ण सृष्टि पर राज किया आज वह उसी बुद्धि का प्रयोग एक दूसरे पर कर रहा है।

www.kositimes.comदेश अनाज निर्यात करता है लेकिन देश के किसानों की क़ीमत नहीं समझ पाया है। आज भी देश के किसान कर्ज में डूबे हैं और आये दिन आत्महत्या करते हैं।सरकारों के हर साल सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाने पड़ते हैं। सड़क हादसों से लोग सबक नहीं लेते। देश के लोग लाल बत्ती पर रुकना पसंद नहीं करते, मौका देखते ही लांघ जाते हैं। इसी दौरान वे दुर्घटना का शिकार भी हो जाते हैं।लोग ये तो जानते हैं कि घर साफ रखना चाहिए। लेकिन ये नहीं समझ पाते कि कूड़ा कूड़ेदान में फेंकना चाहिए सड़कों पर नहीं। ये समझाने के लिए भी सरकार को सफाई अभियान चलाना पड़ रहा है। विज्ञापन दिखाने पड़ते हैं। पर लोग हैं कि समझते ही नहीं।यह फेहरिस्त लंबी है। गिनते गिनते पूरा दिन निकल सकता है। ज़रूरत इस बात की है कि हम आज़ादी को सिर्फ एक दिन न मनाकर हर दिन मनाएं। देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएं। तभी आज़ादी का मतलब सार्थक होगा।

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जब तक हम इन सब जंजीरों को तोड़ने मे सफल नहीं हो जाते हैं तब तक हम स्वतंत्र जीवन नहीं जी सकते हैं ,मायनों मे स्वतन्त्रता तब होगी जब पत्रकार सच को बिन डरे सामने ला सके, गरीब दवंग की शिकायत थाने मे करने से ना डरे।
जिस दिन इस देश का हर व्यक्ति अपनी जिम्मेवारी को समझने लगेगा और वह सम्पूर्ण देश को अपना घर समझने लगेगा और सम्पूर्ण देशवासियों को अपना परिवार का हिस्सा, सच मायनों मे हम उस दिन आजाद होंगे ।
भारत के नागरिक होने के नाते स्वतंत्रता का न तो स्वयं दुरुपयोग करें और न दूसरों को करने दें। एकता की भावना से रहें और अलगाव, आंतरिक कलह से बचें।


हमारे लिए स्वतंत्रता दिवस का बड़ा महत्व है। हमें अच्छे कार्य करना है और देश को आगे बढ़ाना है।अपने देश की प्रगति के लिए जिम्मेदारी के साथ आगे कदम बढ़ाना, अपने देश को इन सब चीजों की सख्त जरूरत है।
जिस दिन हम सब अपनी जिम्मेदारी समझकर इन सब चीजों को करने की कोशिश करेंगें, भ्रष्टाचार खुद-ब-खुद जड़-समूल नष्ट हो जायेगा, और तब हमें असली आजादी मिलेगी।तब फिर से कोई नेता हमें धर्म के नाम पर नहीं बाँट पायेगा, तब फिर से वोट पैसों से नहीं खरीदे जा सकेंगे, तब हम सब सच्चे दिल से कह सकेंगे कि हम सच्चे भारतीय हैं, भारतीयता ही हमारा धर्म है।

आज के शुभ अवसर पर मैं भी बहुत खुश हूँ, लेकिन क्या करूँ, सच्चाई को लिखना पड़ रहा है, क्योंकि सच को नकारा नहीं जा सकता।खैर, आप सबको जो करना है करिए, आप सब समझदार हैं, हर एक सच्चाई से वाकिफ हैं, और हाँ, स्वतन्त्र भी हैं।

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