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कोसी नदी की दूसरी कड़ी-यात्रा वृतांत और तटबंध का इतिहास

संजय कुमार सुमन

समाचार सम्पादक@कोसी टाइम्स

कोसी नदी की दूसरी कड़ी

बिहार में कोसी नदी की धारा बदल जाने के कारण आए प्रलय के साथ ही जानकारों ने तटबंध और बैराजों को असली खलनायक साबित करना शुरू कर दिया है। सतही तौर पर विचार करने से ऐसा लगता है कि अगर हिमालय से निकलने वाली कोसी (जिसे नेपाल में सप्तकोसी कहा जाता है) के दोनों किनारों पर तटबंध नहीं बनाए जाते तो यह नौबत नहीं आती। पहले पानी इकट्ठा हुआ और फिर बाढ़ में बदल गया। कोसी ने अचानक धारा बदल ली और 120 किलोमीटर पूरब में फैल गई। कोसी नदी हिमालय पर्वतमाला में प्रायः 7000 मीटर की ऊँचाई से अपनी यात्रा शुरू करती है जिसका ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र नेपाल तथा तिब्बत में पड़ता है। दुनिया का सबसे ऊँचा शिखर माउंट एवरेस्ट तथा कंचनजंघा जैसी पर्वतमालाएं कोसी के जलग्रहण क्षेत्र में आती हैं। नेपाल में इसे सप्तकोसी के नाम से जानते हैं जो कि सात नदियों इन्द्रावती, सुनकोसी या भोट कोसी, तांबा कोसी, लिक्षु कोसी, दूध कोसी, अरुण कोसी और तामर कोसी के सम्मिलित प्रवाह से निर्मित होती है। इनमें पहली पाँच नदियों के संयोग से सुनकोसी का निर्माण होता है और यह पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है। यह नदियाँ गौरी शंकर शिखर तथा मकालू पर्वतमाला से होकर आती हैं। छठी धारा अरुण कोसी की है जिसके जलग्रहण क्षेत्र में सागर माथा (माउन्ट एवरेस्ट) अवस्थित है। सातवीं धारा पूरब से पश्चिम की ओर बहने वाली तामर कोसी है जो कि कंचनजंघा पर्वतमाला से पानी लाती है। इस तरह सुनकोसी, अरुण कोसी तथा तामर कोसी नेपाल के धनकुट्टा जिले में त्रिवेणी नाम के स्थान पर आकर मिल जाती हैं और यहीं से इसका नाम सप्तकोसी, महाकोसी या कोसी हो जाता है। त्रिवेणी पहाड़ों के बीच स्थित है और यह स्थान चतरा से, जहाँ कोसी मैदान में प्रवेश करती है, प्रायः दस किलोमीटर उत्तर में पड़ता है।

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यह नदी नेपाल और उत्तरी भारत में बहती है। यह नदी अपनी सहायक नदियों के साथ कोसी नेपाल के पूर्वी तीसरे हिस्से व तिब्बत के कुछ हिस्से को अपवाहित करती है, जिसमें माउंट एवरेस्ट के आसपास का क्षेत्र शामिल हैं। इसकी कुछ प्रारंभिक धाराएँ नेपाल की सीमा के पार तिब्बत से निकलती है। भारत-नेपाल सीमा से लगभग 48 किमी उत्तर में कोसी में कई प्रमुख सहायक नदियाँ मिलती हैं और यह संकरे छत्र महाखड्ड से शिवालिक की पहाड़ियों से होते हुए दक्षिण दिशा में मुड़ जाती है। इसके बाद कोसी नदी उत्तर भारत के विशाल मैदान में बिहार में अवतरित होकर गंगा नदी की ओर बढ़ती है, जहाँ यह लगभग 724 किमी की यात्रा के बाद पूर्णिया के दक्षिण में गंगा से मिलती है। लगातार भारी मात्रा में मलबा बहाकर जमा करते रहने के कारण उत्तरी भारत के विशाल मैदान में कोसी की अपनी कोई स्थायी धारा नहीं है।

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कोसी का रुख़

कोसी नदी की अपनी कोई स्थायी धारा नहीं थी क्योंकि तटबंध बनाकर नदी की धारा को नियंत्रित दिशा दी गई। कोसी नदी की धारा बदल दी गई इसलिए बिहार में प्रलयंकारी बाढ़ कि स्थिति पैदा हुई है। बिहार में बाढ़ के कारण स्थिति गंभीर बनी हुई है। दरअसल इतने बड़े पैमाने पर आई बाढ़ की वजह है कोसी नदी का अपना रास्ता बदलना।

तटबंध का इतिहास

ब्रिटिश सरकार ने तटबंध नहीं बनाने का फ़ैसला इसलिए किया था क्योंकि अगर तटबंध टूटेगा तो क्षति होगी और उसकी भरपाई करना ज़्यादा मुश्किल साबित होगा।जब सप्तकोशी नदीकी बाढ बिहार राज्यमेँ तवाही मचाना सुरू किया तब से अंग्रेज शासकों ने ही कोशी तटबन्ध निर्माण कर बाढ नियन्त्रण की अध्ययन सुरु किया था। “1779सपास मेजर जे. रेनल ने, सन् 1863 मा जेम्स फरगुसन और उसकी बाद एफए सिलिङफिल्ड ने कोसी बाढकी अध्ययन की। जब 1869-70 बाढ बिहारकी पूर्णिया मे ताण्डव रचा तब अंग्रेज कोसी तटबन्ध बनाकर बाढ़  नियन्त्रण की निष्कर्ष मे पहुँचे थे।” लेकिन आज़ादी के बाद भारत सरकार ने नेपाल के साथ समझौता कर के 1954 में तटबंध बनाने का फ़ैसला किया।तटबंध बनाकर नदी की धारा को नियंत्रित दिशा दी गई। बृटिसने नेपालकी उदयपुर जिलाकी बराह क्षेत्रमें बाँध निर्माण की प्रस्ताव लाया। नेपालकी राणा प्रधानमन्त्री बीरसम्शेर बराह क्षेत्रसे 5-6 किलोमीटर निचे चतरा में बाँध निर्माणके लिए राजी हुए। बृटिस राज खतम होनेके बाद में स्वतन्त्र भारत सरकार इस प्रस्तावको और घनीभूत रूपमें उठाया। विभिन्न चरणकी छलफल और अध्ययन हो के बीपी कोइराला प्रधानमन्त्री होते वक्त कोशी और गण्डक नदीमें बाँध निर्माणकी सम्झौते हुए। नेपाल भारत सीमावर्ती हनुमाननगरमें सन् 1965 को कोशी बाँध निर्माण सम्पन्न हुआ।

तटबंध की स्थिति को लेकर डा. ओमप्रकाश भारती ने लिखा है- “स्थानीय मौखिक साक्ष्य और कतिपय स्रोतों के अनुसार यह तटबंध् मिथिला के शासक हरिसिंह देव के आदेश पर उसके मंत्री वीरेश्वर ने मिथिला राज्य की भूमि को कोसी के उत्पात से बचाने के लिए बँधवाया था।” इसलिए इस बाँध् का नाम वीरबाँध् पड़ा। सुपौल ज़िला का महत्त्वपूर्ण शहर वीरपुर वीरेश्वर के द्वारा ही बसाया गया था। हरिसिंहदेव के राज्य की पूर्वी सीमा कोसी नदी थी, जिसके पूर्व में गौर के शासक नासीरूद्दीन बुगरा का शासन था। अब तर्क यह बनता है कि यदि वीरबाँध गौड़ के शासकों में से कोई बँधवाता तो यह तटबंध् कोसी नदी के पूर्वी किनारे पर बना होता, जबकि तमाम साक्ष्यों से यह प्रमाणित होता है कि वीरबाँध् कोसी के तत्कालीन प्रवाह के पश्चिमी किनारे पर बना था।

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तटबंध का महत्त्व

छत्र महाखड्ड के आर-पार बरका क्षेत्र में स्थित बाँध बाढ़ पर नियंत्रण रखता है।बाढ़ के मैदानों में सिंचाई की सुविधा प्रदान करता है।पनबिजली उपलब्ध कराता है ।मछली पालन केंद्रों को आधार प्रदान करता है।कोसी बेसिन की बलुआ मिट्टी में व्यापक पैमाने पर मक्का की खेती की जाती है।लंबे समय से कोसी नदी अपनी विनाशकारी बाढ़ों के लिए कुख्यात रही है, क्योंकि इसका पानी चौबीस घंटो में नौ मीटर तक बढ़ जाता है। उत्तरी बिहार के विशाल क्षेत्र तक निवास या कृषि के लिए असुरक्षित हो जाते हैं पर तटबंध की मद्द से इसे बचाया गया है।

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