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गाजर घास:सम्पूर्ण पर्यावरण के लिये हानिकारक,मनुष्य और पशुओं के लिए बन रही है गंभीर समस्या

संजय कुमार सुमन 

समाचार सम्पादक@कोसी टाइम्स 

बिहार के साथ-साथ अन्य राज्यों में या यूँ कहें कि सम्पूर्ण भारत के विभिन्न खेतों, पार्कों, सड़क किनारे, खाली पड़े फ्लैटों में उगने वाली गाजर घास लोगों के लिए काफी घातक होती है। यह एक शाकीय पौधा है जो किसी भी वातावरण में तेजी से उगकर फसलों के साथ-साथ मनुष्य और पशुओं के लिए भी गंभीर समस्या बन जाता है।प्रकृति में अत्यंत महत्त्वपूर्ण वनस्पतियों के अलावा कुछ वनस्पतियाँ ऐसी भी हैं, जो कि धीरे-धीरे एक अभिशाप का रूप लेती जा रही हैं। बरसात का मौसम शुरू होते ही गाजर के तरह की पत्तियों वाली एक वनस्पति काफी तेजी से बढ़ने और फैलने लगती है। इसे ‘गाजर घास’,‘कांग्रेस घास’ या ‘चटक चाँदनी’ आदि नामों से जाना जाता है। आज सम्पूर्ण संसार में पाँव पसारने को कृतसंकल्प दिखाई दे रहा कम्पोजिटी कुल का यह सदस्य वनस्पतिक जगत में “पार्थेंनीयम हिस्ट्रोफोरस” के नाम से जाना जाता है। यह वर्तमान में विश्व के सात सर्वाधिक हानिकारक पौधों में से एक है तथा इसे मानव एवं पालतू जानवरों के स्वास्थ्य के साथ-साथ सम्पूर्ण पर्यावरण के लिये अत्यधिक हानिकारक माना जा रहा है।

अमेरिकन गाजर घास से भारत में मंडराया खतरा
भारत में कैसे आयी गाजर घास

वर्ष 1960 के दशक में भारत में खाद्यान्न के लाले पड़े गये थे तब तत्कालीन प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने अमेरिका से मदद मांगी थी। अमेरिका ने भारत को लाखों टन गेहूं देने की डील की थी। भारत में खाद्यान्न की कमी को पूरा करने के लिये अमेरिका से भारी मात्रा में गेहूं का आयात तो हुआ मगर गेहूं के साथ पारथ्रेनियम के बीज भी भारत को सौगात के रूप में मिल गये। जिसका भारत आज भी खामियाजा भुगत रहा है।अर्जेन्टीना, ब्राजील, मैक्सिकों,वेस्टइंडीज, दक्षिणी एवं अमरीका में बहुतायत से पाए जाने वाले इस पौधे का कृषि मंत्रालय और भारतीय वन संरक्षण संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार भारत में पहले कोई अस्तित्व नहीं था। ऐसा माना जाता है कि इस घास के बीज अमरीकी संकर गेहूँ पी.एल.480 के साथ भारत आए। इसे सर्वप्रथम पूना में देखा गया। इस पौधे का देश में सभी जगह तेजी से विकास हो रहा है। आज यह भारत के लगभग पांच लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैल चुका है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा एवं महाराष्ट्र जैसे महत्त्वपूर्ण कृषि उत्पादक राज्यों के हजारों एकड़ क्षेत्र में यह घास फैल चुकी है। इसे अब राजस्थान, केरल एवं कश्मीर में भी देखा जा सकता है। अहमदाबाद, दिल्ली, पूना, मद्रास, चंडीगढ़ एवं बंगलुरु जैसे शहरों में इसकी भयंकर वृद्धि और इसके प्रभावों की समस्या सामने आ चुकी है।

क्या है गाजर घास

पार्थेनियम अर्थात् गाजर घास स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक हानिकारक है। यह खरपतवार कुल का पौधा है। यह अनिष्टकारी पौधा पूरे देश के लिए काफी खतरनाक है। देश के अलग-अलग हिस्सों में पार्थेनियम को गजरी, गाजर घास, चटक चांदनी, गंधी बूटी और पंधारी नामों से जाना जाता है। पार्थेनियम एक शाकीय पौधा है, जो 90 सेमी से लेकर एक मीटर तक ऊंचा होता है, इसकी पत्तियां गाजर या गुले दाऊदी की पत्तियों की तरह होती हैं, इसमें सफेद रंग के छोटे-छोटे फूल लगते हैं। फूल और बीज हर मौसम में दिखाई पड़ते हैं। इसके बीजों की सुसुप्तता आठ साल तक रहती है।

कैसे करें इसे खत्म
पार्थेनियम को नष्ट करने के लिए इसे फूल आने से पहले ही जड़ से उखाड़ कर खत्म देना चाहिए। गिने चुने पौधों को हाथ से उखाड़ देना चाहिए। अधिक क्षेत्र में होने पर हाथों में दस्ताने अवश्य पहनें, ताकि यह शरीर के सीधे संपर्क में न आए। जड़ से न उखाड़कर दरांती से काटने से पार्थेनियम तेजी से बढ़ता है, इसलिए इसे जड़ से उखाड़कर, जैविक विधि या रसायनिक उपचार करके ही खत्म किया जा सकता है। इसे समूल नष्ट करने के लिए मैक्सीकन बीटल नामक कीड़े को भी इसके झुंडों में छोड़ा जाता है, क्योंकि मैक्सीकन बीटल केवल पार्थेनियम को ही खाता है, इसलिए इससे फसलों को नुकसान पहुंचने की कोई संभावना नहीं रहती है।
क्या होता है नुकसान
पार्थेनियम के कारण मनुष्य में चर्म रोग हो जाते हैं। इसके कारण गर्दन, चेहरे और बांहों की चमड़ी सख्त होकर फट जाती है, उसमें घाव भी बन जाते हैं। पौधों के संपर्क में आने से खाज, खुजली पैदा होती है, इसके फूल, बीज और पौधे पर मौजूद रोएं से दमा, रिन्ही टायटीश और हेफीवर जैसी बीमारियां पैदा होती हैं। यह मनुष्य के नर्वस सिस्टम को प्रभावित कर उसे डिप्रेशन का शिकार भी बना देता है।स्वास्थ्य विभाग के डाक्टर भी पारथ्रेनियम से होने वाली श्वास सम्बन्धी बीमारियों को न सिर्फ खतरनाक मानते हैं बल्कि पारथ्रेनियम के पौधों से दूर रहने की सलाह भी देते हैं। बताया जाता है कि यह ऐसे पौधे हैं जिन्हें मवेशी भी खाने से परहेज करते हैं। अगर गाय या भैंस इसे खा लेती हैं तो उनके थनों में सूजन आ जाती है और पशुओं के मरने का भी खतरा होता है। काफी वक्त पहले कांग्रेस की सत्ता में रहते वक्त मैक्सिको से आए गेहूं के बीज के साथ आए गाजर घास के बीज किसानों के लिए आज तक मुसीबत बने हैं।

गाजर घास के तेजी से फैलने के क्या-क्या कारण हैं

गाजर घास का पौधा कई विशिष्ट गुणों से युक्त होता है। इन्हीं विशिष्ट गुणों के कारण इसका फैलाव निर्बाध गति से हो रहा है। गाजर घास के एक पौधे से लगलग 25,000 बीज बनते हैं।इन बीजों में सुसुप्तावस्था नहीं पाई जाती है अर्थात ये सभी बीज तुरंत अंकुरण की क्षमता रखते हैं। गाजर घास के बीज हवा व जल के माध्यम से फैलते हैं। एक वर्ष में गाजर घास की तीन से चार पीढ़ियाँ होती हैं। गाजर घास सभी प्रकार की मिट्टियों में अच्छी वृद्धि करता है। यह विपरीत वातावरणीय परिस्थितियों, अधिक अम्लता या क्षारीयता वाली भूमि आदि में उग सकता है। इसके अलावा गाजर घास के पौधे पार्थेनिन, काउमेरिक एसिड, कैफिक एसिड आदि घातक एलिलोरसायनों का स्त्रवण करते हैं जो कि अपने आस-पास किसी अन्य पौधे को उगने नहीं देते हैं व गाजर घास से कोई भी पौधा या फसल प्रतियोगिता नहीं कर पाती है। इन्हीं कारणों से गाजर घास का फैलाव अन्य पौधों की तुलना में तेजी से हो रहा है।

गाजर घास के कारण किसानों की आत्महत्या 

आपका ये जानकर आश्चर्य होगा कि भारत के कर्नाटक राज्य में गाजर घास जनित रोगों से प्रभावित होकर 7 से भी अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यह विश्व में पहली घटना है जबकि किसी खरपतवार से परेशान होकर किसानों ने आत्महत्या की हो। गाजर घास के पौधे कुछ घातक एलिलो-रसायनों का स्त्राव करते हैं। ये एलिलो-रसायन आस-पास किसी अन्य पौधों को उगने नहीं देते हैं। भारतीय वन अपनी जैव-विविधता के कारण विश्व के मानचित्र में विशेष स्थान रखते हैं। भारतीय वनों में आज भी ऐसी सैकड़ों वनौषधियाँ उपलब्ध हैं जिनके दिव्य औषधीय गुणों का सही आकलन अभी तक नहीं हुआ है। भारतीय वनों में गाजर घास के अनियंत्रित फैलाव से बेशकीमती जड़ी-बूटियाँ नष्ट होती जा रही हैं।

कैसे बनाई जा सकती है खाद
अपने खेत और घर के आसपास उगी गाजर घास को खत्म नहीं कर पा रहे हैं तो  इस घास का इस्तेमाल करके आप खाद बना सकते हैं। इतना ही नहीं यदि आप अपने खेत में गाजर घास से बनी खाद डालते हैं तो आपको दूसरी कोई खाद डालने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वहीं कृषि वैज्ञानिक गाजर घास की खाद को फसलों के लिए फायदेमंद भी बता रहे हैं।कृषि वैज्ञानिक के अनुसार गाजर घास से खाद बनाने के लिए किसानों को एक गड्ढा खोदना होता है। गड्ढे की लम्बाई 12 फीट, चौड़ाई चार फीट और घहराई पांच फीट होनी चाहिए। इस गड्ढे में नौ इंच चौड़ी की दीवार बनानी होगी। इसे सीधा जोड़ेंगे। जब तीन स्टेप तीन रदृा ईंट रखने के बाद सात इंच चारों ओर जाली बनाई जाएगी। इसी तरह ईंट की जोड़ाई सीधी और जालीदार करते रहेंगे। इसके बाद सूखी गाजर घास को अलग और हरी गाजर घास को अलग रख लेंगे।

छह इंच तक हरा और सूखा वाला डंठल नीचे भर देंगे। इसके बाद 5 किलो गोबर पानी में ढीला घोलकर इसमें डाल देंगे। साथ में 2 इंच मिट्टी भी डालेंगे। भराई करने के बाद उसके उपर से मुलायम वाला डंठल डाला जाएगा। फिर पांच किलो गोबर पानी के साथ मिक्स करके तर करेंगे। इसी तरह गड्ढे को उपर तक भरना होगा। दूसरा तरीका यह है कि आपको चार गड्ढे खोदने होते हैं। सबकी एक दूसरे से दूरी डेढ़ फीट की होनी चाहिए। खाद बनाने की पहले वाली विधि की ही तरह पहले गड्ढे में घास और गोबर की भराई कर दी जाए। जब मैटेरियल अच्छी तरह सड़ जाए तो पहले वाले गड्डे से मैटेरियल निकाल दूसरे में डाल देना चाहिए। फिर दूसरे का मैटेरियल निकाल कर तीसरे और पहले इसी तरह चौथे में डाल देना चाहिए। यह प्रक्रिया पहले, दूसरे तीसरे और चौथे गड्ढे में चलेगी और फिर खाद तैयार हो जाएगी। कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ. संदीप कन्नोजिया कहते हैं, “गाजर घास से बनी 20 टन खाद एक हेक्टेयर खेत के लिए मुफीद है।

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