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सकारात्मक सोच का विस्तार है साहस और सफलता

संजय कुमार सुमन

उप सम्पादक@कोसी टाइम्स

आज रविवार को फुर्सत के क्षण में सुबह अख़बार के साथ चाय की चुस्की ले रहा था कि व्हाट्स एप पर मेसेस उभरा। ‘बांसुरी को गौर से देखिए- खोखली है, छेददार है। फिर भी, फूंक मारते ही जादुई संगीत फूट पड़ता है।’ दो-चार दिन पहले भी एक  मेसेस आया जिसमे लिखा था अपने दिन का प्रारम्भ और समापन सकारात्मक विचार से कीजिये । पॉजिटिव पढ़ना या सुनना सफलता की लागत है।’ हम हारते हैं, फेल होते हैं, तो भय घेर लेता है। मेसेस को पढ़ कर दिमाग ठनका और कुछ सोचने के लिए मजबूर कर गया।हालांकि मेरे मन में कभी नकारात्मक बातें या विचार कभी नही आते  बावजूद सोचने के लिए मजबूर हो गया।हमारे बीच कई ऐसे लोग हैं जो नकारात्मक सोच या फिर बातें करते हैं।  इतना ही नही अख़बार के पन्ने भी इसी से भरे-परे रहते हैं ।अचानक मेरे मुह से निकल आया कि“अब अख़बारों पर रोटी रख कर खाएं तो कैसे खाएं,खून से सना अख़बार आता हर रोज।” दोस्तों हम सभी लोग एक भीड़ का हिस्सा होते है….जैसे दुनियां चलती है वैसे ही चलती है..हम भी उसके साथ चलते है..पर दोस्तों अगर आपको कुछ करना है तो आपकी सोच आपको अलग रखनी होगी…हर बात में आपका मत अलग होना चाहिए…जहां कहीं भी आप बैठे हो या कोई चर्चा चल रही हो वहां जब लोग बाते करते है तब आपके मन में भी कई सवाल आने चाहिए…

 हर इंसान के जीवन का लक्ष्य होना चाहिए कि वह अपने आसपास के लोगों के लिए कितना फायदेमंद है? तमाम अच्छे कर्म इर्द-गिर्द फैली नकारात्मक सोच में खो जाते हैं। हमार आसपास हर रोज खुश खबरियां उभरती हैं। लेकिन नकारात्मक खबरों को ज्यादा तवज्जो मिलती है। सो, इंसान उदास और डिप्रेस हो जाता है। हर नए दिन की शुरुआत खुशखबरी से कीजिये । सकारात्मक गतिविधियां खुशियों से झोलियां लबालब भर देती हैं। देश का आर्थिक विकास, इंसान का हौसला बुलंदी, नेताओं के नेक कार्य वगैरह लोगों में खुशी का अहसास जगाते हैं। लोग बाग महसूस करते हैं कि सकारात्मक कार्य और विचार से समाज के बड़े तबके को सुकून, आराम और राहत मिलेगी। कुदरत की हर सौगात जीवन की सकारात्मक सोच को बल देती है। सूर्य प्रतिदिन ऐन वक्त पर रोशनी लेकर उदय होता है। ज्ञानी बताते हैं कि हौसला बुलंद रखिए, जोश और जोशीले रहिए। तभी मंजिल पर पहुंचेंगे। क्योंकि सकारात्मक सोच का विस्तार है साहस और सफलता और फिर, क्या भरोसा कि अच्छी-खासी रोशनी देने वाली टार्च खराब नहीं होगी? बैट्री फूंक सकती है या कोई मशीनी खराबी बत्ती गुल कर सकती है। इसलिए हर हाल के लिए सदा तैयार रहिए। जिन्दगी हर रो एक नई जंग है।

हमारे जीवन में किसी भी काम को लेकर लोग कहते है… हां में कर सकता हूँ  या फिर में नहीं कर सकता हूँ । जो व्यक्ति हमे कहे कि वो काम कर सकता है… असल में जरुरी नही कि उसे वह काम आता हो… बल्कि वह हमेशा सकारात्मक सोच रखता है जिसके कारण वो हमेशा सारे काम कर लेता है मानव ऐसा ही होता हैं। उसके अंदर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही रुप होते है जिसमे से अगर वह  सकारात्मक रवैया अपनाता है तो अपनी मंज़िल को पा लेता है वहीं नकारात्मक रुख से खुद को बर्बाद कर लेता हैं । हमें  भी अपने अंदर  सकारात्मक सोच को लाना है जिससे हम अपनी ज़िन्दगी को बेहतर बना सकें आज हम कुछ ऐसी ही आदतों की बात करेगें  जिसके माध्यम से हम अपने जीवन को सकारात्मक दिशा दे सकते है। यह बिल्कुल सच हैं कि जैसा हम अपने बारे में सोचते हैं वैसा ही हम बन जाते हैं। अगर आप सोचते हो कि आप successful हो सकते हो तो आप एक दिन जरूर successful बनोगे और अगर आप सोचते हो कि आप successful नहीं हो सकते तो आप कभी successful नहीं हो पाओगे क्योंकि आपकी journey आपकी सोच (Thinking) से ही शुरू होती हैं।अब सीधी सी बात हैं कि positive सोच के साथ किये जाने वाले काम का result भी positive ही होगा और negative सोच के साथ किये जाने वाले काम का result हमेशा negative ही होगा। इसलिये ये बहुत ही जरूरी हैं कि हम अपनी thinking को बदले तभी हमारी मंजिल भी बदलेगी।मैं तो बस इतना ही कह पाउँगा…

मंजिल मिलेगी, भटक कर ही सही

गुमराह तो वो हैं,जो घर से निकले ही नहीं

हमारे पास दो तरह के बीज होते है सकारात्मक विचार एंव नकारात्मक विचार है, जो आगे चलकर हमारे दृष्टिकोण एंव व्यवहार रुपी पेड़ का निर्धारण करता है। हम जैसा सोचते है वैसा बन जाते है इसलिए कहा जाता है कि जैसे हमारे विचार होते है वैसा ही हमारा आचरण होता है।यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपने दिमाग रुपी जमीन में कौन सा बीज बोते है। थोड़ी सी चेतना एंव सावधानी से हम कांटेदार पेड़ को महकते फूलों के पेड़ में बदल सकते है।मैं आपको एक कहानी के माध्यम से समझाने का प्रयास करता हूँ ।

एक गाँव में गोलियथ नाम का एक ऱाक्षस था। उससे हर व्यक्ति डरता था एंव परेशान था। एक दिन डेविड नाम का भेंङ चराने वाला लङका उसी गाँव में आया जहाँ लोग राक्षस के आतंक से भयभीत थे। डेविड ने लोगों से कहा कि आप लोग इस राक्षस से लङते क्यों नही हो?

तब लोगों ने कहा – “वो इतना बङा है कि उसे मारा नही जा सकता”

डेविड ने कहा – “आप सही कह रहे है कि वह राक्षस बहुत बड़ा है। लेकिन बात ये नही है कि बङा होने की वजह से उसे मारा नही जा सकता, बल्कि हकीकत तो ये है कि वह इतना बङा है कि उस पर लगाया निशाना चूक ही नही सकता।“

फिर डेविड ने उस राक्षस को गुलेल से मार दिया। राक्षस वही था, लेकिन डेविड की सोच अलग थी।

जिस तरह काले रंग का चश्मा पहनने पर हमें सब कुछ काला और लाल रंग का चश्मा पहनने पर हमें सब कुछ लाल ही दिखाई देता है उसी प्रकार नेगेटिव सोच से हमें अपने चारों ओर निराशा, दुःख और असंतोष ही दिखाई देगा और पॉजिटिव सोच से हमें आशा, खुशियाँ एंव संतोष ही नजर आएगा।

यह हम पर निर्भर करता है कि सकारात्मक चश्मे से इस दुनिया को देखते है या नकारात्मक चश्मे से। अगर हमने पॉजिटिव चश्मा पहना है तो हमें हर व्यक्ति अच्छा लगेगा और हम प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई खूबी ढूँढ ही लेंगे लेकिन अगर हमने नकारात्मक चश्मा पहना है तो हम बुराइयाँ खोजने वाले कीड़े बन जाएंगे।

सकारात्मकता की शुरुआत आशा और विश्वास से होती है। किसी जगह पर चारों ओर अँधेरा है और कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा और वहां पर अगर हम एक छोटा सा दीपक जला देंगे तो उस दीपक में इतनी शक्ति है कि वह छोटा सा दीपक चारों ओर फैले अँधेरे को एक पल में दूर कर देगा| इसी तरह आशा की एक किरण सारे नकारात्मक विचारों को एक पल में मिटा सकती है।यदि हम स्वयं की शक्ति से स्वयं को सर्वोत्तम बनाना चाहते हैं और सकारात्मक परिवर्तन प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें सकारात्मक सोच की शक्ति से अधिक को प्राप्ति की आवश्यकता है।नकारात्मक विचार के लोगों के लिए मैं तो बस यही कहूँगा..

उम्र बिता दी औरों के वजूद में,नुक्स निकालते निकालते
इतना ही खुद को तराशा होता,तो फ़रिश्ते बन जाते…

शोध से पता चलता है कि जो लोग सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं, वे उन लोगों की तुलना में उच्च आत्मसम्मान और सर्वोत्तम अनुभव को प्राप्त करते हैं, जो निराशावादी दृष्टिकोण को रखते हैं। दूसरी ओर, इस विचार का समर्थन करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य नहीं पाए जाते है कि विचार परिणाम को नियन्त्रित कर सकते हैं। सकारात्मक सोच के द्वारा भविष्य को परिवर्तित के लिए कोई अन्तर्निहित शक्ति नहीं पाई जाती है।

positive-thinkingनकारात्मकता को नकारात्मकता समाप्त नहीं कर सकती, नकारात्मकता को तो केवल सकारात्मकता ही समाप्त कर सकती है। इसीलिए जब भी कोई छोटा सा नकारात्मक विचार मन में आये उसे उसी पल सकारात्मक विचार में बदल देना चाहिए।

उदाहरण के लिए अगर किसी विद्यार्थी को परीक्षा से 20 दिन पहले अचानक ही यह विचार आता है कि वह इस बार परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो पाएगा तो उसके पास दो विकल्प है – या तो वह इस विचार को बार-बार दोहराए और धीरे-धीरे नकारात्मक पौधे को एक पेड़ बना दे या फिर उसी पल इस नेगेटिव विचार को पॉजिटिव विचार में बदल दे और सोचे कि कोई बात नहीं अभी भी परीक्षा में 20 दिन यानि 480 घंटे बाकि है और उसमें से वह 240 घंटे पूरे दृढ़ विश्वास के साथ मेहनत करेगा तो उसे उत्तीर्ण होने से कोई रोक नहीं सकता। अगर वह नेगेटिव विचार को सकारात्मक विचार में उसी पल बदल दे और अपने पॉजिटिव संकल्प को याद रखे तो निश्चित ही वह उत्तीर्ण होगा।सकारात्मक सोचना या न सोचना हमारे मन के नियंत्रण में है और हमारा मन हमारे नियन्त्रण में है। अगर हम अपने मन से नियंत्रण हटा लेंगे तो मन अपनी मर्जी करेगा और हमें पता भी नहीं चलेगा की कब हमारे मन में नकारात्मक पेड़ उग गए है।

दोस्तों आज मेरी इस पोस्ट का सबसे बड़ा मतलब ये कि आप जब एक अलग सोच रखने जाओंगे तो दुनियां वालो से आपको कई परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। पर दोस्तों अपने आस-पास के लोगो पर अपनी सोच मत लादो। चाहे आपके माता-पिता भी उस सोच को अगर गलत मानते है तो आप उनका विरोध मत करो। ना ही उनकी सोच को कमजोर समझो क्योंकि आपके माता-पिता आपसे कहीं ज्यादा अनुभवी है।
दोस्तों हमारी विचारधारा या हमारी मन की अलग सोच का इस्तेमाल खुद ही करे। जैसे-जैसे आपकी विचारधारा आपकी सोच अलग होती जाएंगी तो दुनियां अपने आप ये फील कर लेगी कि आपकी सोच दुनियां से अलग है।
कभी भी अपने आप को सही साबित करने के लिए कभी भी किसी से बहस ना करे। क्योंकि जब हमारी सोच हम दुनियां से अलग करेंगे तो शायद हमारी तरह दुसरे भी अपनी सोच दुनियां से अलग रखना ही चाहेंगे। मैने देखा है कि लोग ज्यादातर अपने आप को सही साबित करने के लिए अपनी बहुत किमती एनर्जी को वेस्ट कर देते है। जिसका खामियाज़ा उन्हे ही भोगना होता है।

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