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सुप्रसिद्ध हिन्दी कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु का कृतित्व एवं व्यक्तित्व

संजय कुमार सुमन

उप सम्पादक@कोसी टाइम्स 

फणीश्वरनाथ रेणु एक सुप्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार थे। हिन्दी कथा साहित्य के महत्त्वपूर्ण रचनाकार फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के अररिया जिले के फॉरबिसगंज के निकट औराही हिंगना ग्राम में हुआ था । प्रारंभिक शिक्षा फॉरबिसगंज तथा अररिया में पूरी करने के बाद इन्होने मैट्रिक नेपाल के विराटनगर के विराटनगर आदर्श विद्यालय से कोईराला परिवार में रहकर की । इन्होने इन्टरमीडिएट काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 1942 में की जिसके बाद वे स्वतंत्रता संग्राम में कूद पङे । बनारस में रेणु ने ‘स्टुडेंट फेडरेशन’ के कार्यकर्ता के रूप में भी कार्य किया। आगे चलकर रेणु समाजवाद से प्रभावित हुए। 1938 ई० में सोनपुर, बिहार में ‘समर स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स’ में रेणु शामिल हुए। इस स्कूल के प्रिंसिपल जयप्रकाश नारायण थे और कमला देवी चट्टोपाध्याय, मीनू मसानी, अच्युत पटवर्धन, नरेन्द्र देव, अशोक मेहता जैसे लोगों ने इस स्कूल में शिक्षण कार्य किया था। इसी स्कूल में भाग लेने के बाद रेणु समाजवाद और ‘बिहार सोशलिस्ट पार्टी’ से जुड़ गए। समाजवाद के प्रति रुझान पैदा करने वाले लोगों में रेणु रामवृक्ष बेनीपुरी का भी नाम लेते हैं।बाद में 1950 में उन्होने नेपाली क्रांतिकारी आन्दोलन में भी हिस्सा लिया जिसके परिणामस्वरुप नेपाल में जनतंत्र की स्थापना हुई । उन्होने हिन्दी में आंचलिक कथा की नींव रखी ।

रेणु

लेखन-शैली 

इनकी लेखन-शैली वर्णणात्मक थी जिसमें पात्र के प्रत्येक मनोवैज्ञानिक सोच का विवरण लुभावने तरीके से किया होता था । पात्रों का चरित्र-निर्माण काफी तेजी से होता था क्योंकि पात्र एक सामान्य-सरल मानव मन (प्रायः) के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता था । इनकी लगभग हर कहानी में पात्रों की सोच घटनाओं से प्रधान होती थी । एक आदिम रात्रि की महक इसका एक सुंदर उदाहरण है । इनकी लेखन-शैली प्रेमचंद से काफी मिलती थी और इन्हें आजादी के बाद का प्रेमचंद की संज्ञा भी दी जाती है । अपनी कृतियों में उन्होने आंचलिक पदों का बहुत प्रयोग किया है । अगर आप उनके क्षेत्र से हैं (कोशी), तो ऐसे शब्द, जो आप निहायत ही ठेठ या देहाती समझते हैं, भी देखने को मिल सकते हैं आपको इनकी रचनाओं में ।

रेणु का पहला प्रकाशित उपन्यास जिसने उन्हें रातों-रात हिन्दी साहित्य-जगत में प्रतिष्ठित कर दिया – ‘मैला आँचल’ है ।   सन् 1954 में ‘मैला आँचल’ के प्रकाशन के साथ ही इस पहली कृति से उन्हें जैसी ख्याति प्राप्त हुई वह हिन्दी साहित्य के इतिहास में अभूतपूर्व है  परन्तु इस उपन्यास के प्रकाशन के पूर्व भी रेणु काफी कुछ लिख चुके थे और एक लंबा संघर्षमय जीवन जी चुके थे । उनकी पहली कहानी ‘बटबाबा’ थी जो सन् 1945 में ‘विश्वामित्र’ मासिक (कलकत्ता) में छपी थी। अगले वर्ष इसी पत्रिका में उनकी दो और कहानियाँ – ‘रसूल मिसतिरी’ और ‘बीमारों की दुनिया में’ छपी थीं ।   कहानियों के अलावा उनका कथा-रिपोर्ताज ‘बिदापत-नाच’ जिसमें उन्होंने उत्तरी बिहार में प्रसिद्ध इस नाच के ऊपर मनभावन चर्चा की थी, साप्ताहिक ‘विश्वामित्र’ के 1 अगस्त 1945 के अंक में प्रकाशित हुआ था । ‘नये सवेरे की  आशा’ तथा ‘हड्डियों के पुल’ – ये दो अन्य कथा-रिपोर्ताज भी ‘मैला आँचल’ के पूर्व 1950 ई. में क्रमश: मासिक ‘जनवाणी’ (वाराणसी) के जनवरी तथा ‘जनता’ के 17 सितम्बर के अंक में प्रकाशित हुए थे । इनके अलावा भी कुछ अन्य रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई थीं । परन्तु इसमें संदेह नहीं कि ‘मैला आँचल’ रेणु के रचना-क्रम में वह कड़ी है जिसने उन्हें साहित्य-जगत में व्यापक पहचान व प्रतिष्ठा दिलाई ।

रेणु के लेखन में दृश्य किसी फिल्म की तरह आपके आगे से गुजरते हैं। चरित्र की एक-एक रेखा जैसे खुलती जाती है। कोई नैना जोगिन हो या कोई लाल पान की बेगम (बिरजू की मां), कोई निखट्टू कामगार पर गजब का कलाकार सिरचन हो या चिट्ठी घर-घर पहुंचाने वाला संवदिया हरगोबिंद या फिर ‘इस्स’ कहकर सकुचाता हीरामन और अपनी नाच से बिजली गिराती हीराबाई या फिर पंचलाईट ‘पेट्रोमेक्स’ के आने से खुश, चौंधियाए और डरे हुए गांव के भोले–भाले लोग हों, सबके बारे में यह बात कही जा सकती है।

यहां अगर कोसी-बांध के बनने के समय का विकासशील गांव है तो मैला आंचल का रूढ़ियों और पुरानेपन में जीता एक अनगढ समाज भी। कुल मिलाकर आजादी के बाद के गांवों का एक भरा-पूरा चेहरा। कूखनी चिड़िया (कराहने वाली चिड़िया) सिर्फ रेणु की कहानी में ही मिल सकती है, उनकी रचनाओं में खूब–खूब मिलने वाले पंडुक, महोक और दूसरी जीती-जागती चिड़ियों की तरह।

ऐसे बहुत कम लेखक होते हैं जो अपने जीते जी ही किंवदंतियों का हिस्सा हो जाते हैं। जो अपने समय के रचनाकारों के लिए प्रेरणा और जलन दोनों का कारण एक साथ ही बनते हैं। रेणु ऐसे ही थे। अज्ञेय तो खैर उनके घनिष्ठ मित्र ठहरे। उनके द्वारा उन्हें ‘धरती का धनी कथाकार’ कहा जाना उतनी बड़ी बात नहीं थी लेकिन रेणु की साहित्यक धारा से बिल्कुल अलग लिखने वालों को भी उनकी कलम की ताकत से इनकार नहीं था।

रेणु ने नई कहानी आंदोलन को खारिज किया था। इस आंदोलन को शुरू करने वाली तिकड़ी में शामिल और नगरीय सभ्यता के मशहूर कहानीकार कमलेश्वर रेणु के बारे में कहते हैं, ‘बीसवीं सदी का यह संजय रूप, रंग, गंध, नाद, आकार और बिंबों के माध्यम से महाभारत की सारी वास्तविकता… सबको बयान करता है।’ निर्मल वर्मा रेणु के समकालीन कथाकार रहे हैं। एकांत के एकालाप और निर्जन को अपने शब्दों में बहुत एहतियात से रचनेवाले इस लेखक के रेणु के बारे में जो विचार थे वे भी कम चौंकाने वाले नहीं हैं – ‘मानवीय दृष्टि से संपन्न इस कथाकार ने बिहार के एक छोटे भूखंड की हथेली पर किसानों की नियति की रेखा को जैसे उजागर कर दिया था।’

एक अचरज वाली बात यह है कि ये सब के सब लेखक संभ्रांत थे। सभी आधुनिक वेश-भूषाधारी और आधुनिकता के पक्षधर।ऐसे में एक धोती-कुर्ताधारी और गांव में रहनेवाले लेखक की इस तरह से की जानेवाली तारीफ कम चौंकाने वाली नहीं है।एकाएक उनका उभरना मठों में बैठे लेखकों के लिए परेशान करनेवाला था। प्रसिद्धि जितनी जल्दी मिली, इल्जाम भी उतनी आसानी से हवा में गूंजने लगे। कहा गया कि ‘मैला आंचल’ चोरी की रचना है… इस पर बांग्ला लेखक ‘सतीनाथ चौधरी’ के ‘धोढाई चरितमानस’ की छाया है। आरोप कुछ दूसरी शक्लों में भी थे जैसे कि रेणु में अपना तो कुछ है ही नहीं या प्रेमचंद के गांवों को उन्होंने अपनी प्रसिद्धि के रास्ते के लिए अपनाभर लिया। मैला आंचल पर रेणु को कई तरह से घेरा गया। इस दौरान कई दूसरे लेखकों का भी उल्लेख हुआ। जैसे सांस्कृतिक गरिमा के लिए शोलोखोव का तो स्थानीयता के प्रभाव के लिए बांग्ला लेखक ताराशंकर बंदोपाध्याय का। एक-एक कर मैला आंचल की खूब बखिया उधेड़ी गईं। जाहिर है रेणु आहत भी हुए होंगे। आत्मा को तकलीफ भी पहुंचती ही होगी पर उन्होंने विरोध जताना उचित नहीं समझा।

 फ़िल्म ‘तीसरी क़सम’ का पोस्टर

आरोपों की आंधी जैसे चली थी वैसे ही अचानक थम भी गई। जैसे धूल की आंधी के बाद का आकाश सबसे चमकीला होता है, रेणु और रेणु की लेखनी अब और ज्यादा चमक के साथ दिखने लगी। रेणु नामक इस लेखक की आंधी में प्रांत और भाषा की दीवारें जैसे ढह पड़ीं थी।रेणु की लेखनी में यह प्रभाव यूं ही नहीं आया था। इसके लिए उन्होंने लंबी साधना की थी और अथाह अध्ययन किया था।जो पढ़ा उसे पचाया और गुना अपने भीतर। फिर उसी से कुछ अद्भुत और दुर्लभ रचा।

जब हम पढ़ी-सुनी चीजों को वैसे का वैसा ही रच जाते हैं तो वह नकल होती है। जब हम सारे संचित को किसी खास परिदृश्य में रखकर सोचते हैं। उसे मिलाकर नया बनाते हैं तो वह कुछ अलग सा होता है। गांव वही थे, गांववाले भी बहुत हद तक वही, पर रेणु के अनुभव यहां अपने थे। यहां अगर प्रेमचंद की रचनाओं में दिखनेवाला मोह भंग था तो साथ ही विरासत को थामे रहने की उदासी में भी लोकधुनों और लोकगीतों को गुनगुनाने, राह खोजनेवाली जीवटता भी थी।

रेणु की लेखनी को देखकर ऐसा लगता है जैसे प्रेमचंद के बनाए खाकों में रेणु ने अपनी रचनाओं से रंग भरे हों, प्रेम, सद्भावना, सहभागिता के गाढे रंग। ‘गोदान’ के बाद मैला आंचल ही वह दूसरा उपन्यास था, जिसने उसी की तर्ज पर और उसी गति से चौतरफा तारीफ पाई थी। उन्होंने अपनी रचनाओं, खासकर अपने उपन्यासों में, उस जातिविहीन समाज का सपना भी देखा था जिसे न रच पाने का खामियाजा हम आज तक देख और भुगत रहे हैं।

अधिकतम विधाओं में कुछ न कुछ लिखने वाले रेणु आत्मकथा नहीं लिख पाए। शायद इसलिए कि उन्होंने अपने उपन्यासों और कहानियों में खुद को पूरी तरह उड़ेल दिया था। हालांकि इस बारे में उनके मन में एक दुविधा भी थी और क्या खूब दुविधा थी वह, ‘अपने बारे में जब भी कुछ कहना चाहता हूं, जीबीएस (जार्ज बर्नाड शॉ) का चेहरा सामने आ जाता है। आंखों में व्यंग्य और दाढ़ी में मुस्कराहट लिए और कलम रुक जाती है। उस तरह कोई लिख ही नहीं सकता कि संभव ही नहीं है वैसा लिखा जाना।’ वैसे यह दुविधा से भी ज्यादा सम्मान है किसी दूसरी भाषा के लेखक के लिए। उसके लिखे के लिए, जो रेणु के कद को और भी बड़ा कर देता है। रेणु की कुल 26 पुस्तकें हैं। इन पुस्तकों में संकलित रचनाओं के अलावा भी काफ़ी रचनाएँ हैं जो संकलित नहीं हो पायीं, कई अप्रकाशित आधी अधूरी रचनाएँ हैं। असंकलित पत्र पहली बार ‘रेणु रचनावली’ में शामिल किये गये हैं।

निधन

दमन और शोषण के विरुद्ध आजीवन संघर्षरत रहे ‘रेणु’ ने सक्रिय राजनीति में भी हिस्सेदारी की। 1952-53 के दौरान वे बहुत लम्बे समय तक बीमार रहे। फलस्वरूप वे सक्रिय राजनीति से हट गए। उनका झुकाव साहित्य सृजन की ओर हुआ। 1954 में उनका पहला उपन्यास ‘मैला आंचल’ प्रकाशित हुआ। मैला आंचल उपन्यास को इतनी ख्याति मिली कि रातों-रात उन्हें शीर्षस्थ हिन्दी लेखकों में गिना जाने लगा। 
जीवन के सांध्यकाल में राजनीतिक आन्दोलन से उनका पुनः गहरा जुड़ाव हुआ। 1975 में लागू आपातकाल का जे.पी. के साथ उन्होंने भी कड़ा विरोध किया। सत्ता के दमनचक्र के विरोध स्वरूप उन्होंने पद्मश्री की मानद उपाधि लौटा दी। उनको न सिर्फ़ आपात स्थिति के विरोध में सक्रिय हिस्सेदारी के लिए पुलिस यातना झेलनी पड़ी बल्कि जेल भी जाना पड़ा। 23 मार्च 1977 को जब आपात स्थिति हटी तो उनका संघर्ष सफल हुआ। परन्तु वो इसके बाद अधिक दिनों तक जीवित न रह पाए। रोग से ग्रसित उनका शरीर जर्जर हो चुका था। इसी समय रेणु ने पटना में ‘लोकतंत्र रक्षी साहित्य मंच’ की स्थापना की। इस समय तक रेणु को ‘पैप्टिक अल्सर’ की गंभीर बीमारी हो गयी थी। लेकिन इस बीमारी के बाद भी रेणु ने 1977 ई. में नवगठित जनता पार्टी के लिए चुनाव में काफ़ी काम किया। 11 अप्रैल 1977 ई. को रेणु उसी ‘पैप्टिक अल्सर’ की बीमारी के कारण चल बसे

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